‘कपड़े जितने छोटे होते हैं लोग उतने पैसे लुटाते हैं। हमारी आंखों का रंग भी असली नहीं है। स्टेज पर जाने से पहले नीला लेंस लगाती हूं। पिरियड में भी डांस करना पड़ता है। लोग कहते हैं हम नाचते हैं, क्योंकि हमें यही आता है, पर किसी ने कभी पूछा ही नहीं कि हमने क्या खोकर ये सीखा?’ इतना कहते हुए स्वीटी तेजी से तैयार होने लगती हैं। शाम के 7 बजने को है। उसे स्टेज पर जाना है। फिर सुबह 4 बजे तक डांस करना है। सोनपुर मेले में रात में अलग ही दुनिया बसती है। ऊपर चांद और नीचे दूसरी दुनिया की रंगीनियां। इन्हीं रंगीनियों के बीच एक कोना है थिएटर का। जहां पर्दे के पीछे की जिंदगी, मंच की रोशनी जितनी चकाचौंध भरी नहीं होती। उन्हीं कहानियों का जानने के लिए हम (भास्कर रिपोर्टर) मेला पहुंचे। डांसर के साथ समय बिताया। वह कैसे काम करती हैं, किस हाल में रहती हैं…यह सब जाना। पढ़िए और देखिए, ग्राउंड रिपोर्ट में…। पार्ट-1ः स्टेज के पीछे की सच्चाई मैं (रिपोर्टर) सुबह 9 बजे सोनपुर मेला पहुंची। दुकानदार अपनी-अपनी दुकानें खोल रहे थे। इसी दौरान पीछे के दरवाजे से एक थिएटर के अंदर पहुंची। यहां सन्नाटा पसरा था। मानों आधी रात हो। थिएटर में काम करने वाले एक बुजुर्ग से पूछा, डांसर कहां हैं? जवाब मिला, सभी लड़कियां अपने केबिन में सो रहीं हैं। 3 बजे के पहले कोई उठने वाली नहीं। रात भर नाचने से थक जाती हैं। इसलिए लेट तक सोती हैं। डांसरों का ठिकाना, 5 बाई 10 फीट का केबिन मैंने (रिपोर्टर) लड़कियों के केबिन में झांककर देखने की कोशिश की। कई केबिन अंदर से बंद थे। कुछ खुले थे तो अंदर लड़कियां सो रही थीं। इसी दौरान एक लड़की ने आवाज लगाई। अंदर कौन झांक रहा है? मैंने बताया रिपोर्टर हूं। आपसे बात करनी है। लड़की ने अपना नाम स्वीटी बताया। कहा- ‘अभी बहुत नींद आ रही है। कुछ देर इंतजार कीजिए। मैं बात करूंगी।’ उसने बगल में रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। केबिन लगभग 5 बाई 10 फीट का था। अंदर एक चौकी थी जिस पर दो लड़कियां सो रही थीं। चौकी के नीचे गर्म कपड़े और डेली यूज वाले सामान थे। किसी-किसी केबिन में तो 5 लड़कियां तक हैं। एक छोटा गैस चुल्हा, कुछ बर्तन, 3 कुर्सियां और मेकअप के सामान भी रखे गए थे। उसी केबिन में एक पेटी था, जिसमे कपड़े आदि थे। पास में रखी कुर्सी पर बैठ गई। दिन के करीब 11.00 बजे चाय बेचने वाले, फेरी वाले शेड के अंदर घूमने लगे। वे केबिन में झांककर लड़कियों से सामान लेने के लिए पूछ रहे थे। लड़कियां परेशान हो गईं तो अंदर से केबिन बंद कर लिया। रात भर नाचती हूं, थकान से आंखें नहीं खुलती दोपहर करीब 3 बजे स्वीटी नींद से उठी। बोली, ‘शाम 7.00 बजे स्टेज पर जाती हूं तो सुबह 4 बजे तक नाचना पड़ता है। आंखों पर तेज लाइट पड़ती है। थकान इतनी होती है कि आंखें नहीं खुलतीं। ऊपर से यूट्यूबर परेशान करते हैं। सभी एक ही बात पूछते हैं कि थिएटर के अंदर क्या होता है? रात 12 बजे के बाद क्या होता है? परेशान कर देते हैं।’ स्वीटी बोली, ‘मेरा तो रोज का यही काम है। मेरे लिए दिन तो दोपहर 3 बजे शुरू होता है। अभी फ्रेश होने जाऊंगी फिर नहाउंगी, तब तक 4 बज जाएगा। उसके बाद स्टेज पर जाने की तैयारी शुरू हो जाती है।’ कैसे इस लाइन में आई? पूछने पर स्वीटी बताती हैं, ‘3 साल से थिएटर में डांस करने सोनपुर आ रही हूं। एक महीने के लिए यहां आती हूं। इसके बाद वापस अपने घर दिल्ली चली जाती हूं। वहां एक मोटर कंपनी में पार्ट्स असेंबल करती हूं।’ उन्होंने कहा, ‘मेरी बुआ पहले यहां डांस करने आती थी। उसने थिएटर के बारे में बताया तो साथ आई थी। पहली बार 15 दिन की छुट्टी लेकर आई थी, लेकिन 1 महीने रुक गई। अच्छी कमाई हुई तो खुद से आने लगी। पहले डांस नहीं आता था। बाद में यहां आने के लिए सीखा।’ पिताजी की मौत के बाद घर चलाने की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई अपने सपने को लेकर स्वीटी ने कहा, ‘पिताजी कहते थे, डॉक्टर या पुलिस बनो। मुझे मॉडल बनने का शौक था। वह ठेकेदार थे। पेंटिंग का ठेका लेते थे। पैसे काफी कमाते थे, लेकिन शराब में उड़ा देते थे। घर की स्थिति बिगड़ी तो मैंने मोटर कंपनी में काम शुरू कर दिया। बीकॉम के लिए एडमिशन लिया, लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं कर सकी।’ उन्होंने कहा, ‘पिताजी की मौत के बाद घर में सबसे बड़ी होने के नाते जिम्मेदारी मुझ पर आ गई।’ यहां कितने पैसे मिलते हैं? इस पर कहा, ‘एक महीने में इतने पैसे कमा लेती हूं कि 1.50 लाख वाले दो i-phone खरीदे जा सकते हैं।’ बात करते-करते दोपहर 3.30 बज गया। स्वीटी और उसकी केबिन पार्टनर फ्रेश होने चली गई। इस दौरान हम आसपास के केबिन में गए। कोई लड़की खाना बना रही थी तो कोई दूसरे काम कर रही थी। खाने-पीने का क्या इंतजाम है? इस पर स्वीटी ने कहा, ‘थिएटर वाले खाना देते हैं। समय रहता है तो खुद अपनी पसंद का खाना बना लेती हूं, नहीं तो होटल से मंगा लेती हूं।’ इसके बाद उसने कॉल किया और आलू पराठा सब्जी का ऑर्डर किया। कुछ देर में एक लड़का खाना लेकर पहुंच गया। 7 बजे स्टेज पर जाना होता है स्वीटी के खाना खाते समय तक अंधेरा हो गया था। जैसे ही शाम के 6.00 बजे, थिएटर की चारों तरफ लाइट जलने लगी, गाने बजने लगे। स्वीटी तैयार होने लगी। बोली 1 घंटे तक ये गाने बजते हैं। 7.00 बजे तक हमें स्टेज पर जाना होता है। अब इतना तेज साउंड सुबह 4.00 बजे तक बजता रहेगा। स्वीटी मुझसे बात करते-करते अपने मेकअप का सामान निकालने लगी। एक बॉक्स खोली, जिसमें मेकअप के सारे सामान थे। मेकअप करते हुए कहा, ‘यहां नाचने वाली हर लड़की की कोई न कोई मजबूरी है। कोई शौक से ऐसे काम नहीं करता। हमें हर दिन के हिसाब से पेमेंट मिलता है।’ लेट से स्टेज पर जाने पर थिएटर वाले चिल्लाते हैं स्वीटी मेकअप कर रही थी तभी बार-बार अनाउंस किया जाने लगा, ‘सभी लड़कियां जल्दी से तैयार हो जाएं।’ इतना सुनते ही उसके हाथ तेजी से चलने लगे। बोली, ‘7 बजे तक स्टेज पर नहीं जाने पर थिएटर वाले केबिन में आकर चिल्लाते हैं।’ स्वीटी पहले बॉडी लोशन लगाती है। इसके बाद चेहरे पर फाउंडेशन और पाउडर। पाउडर का डिब्बा दिखाते हुए कहती है कि यह स्पेशल पाउडर है। इसे लगाने से चेहरे की चमक बढ़ जाती है, फेस काफी ग्लो करने लगता है। एक छोटे से आइना में चेहरा देखते हुए मेकअप करती है। कई लेयर के मेकअप से उसके ओठ के नीचे का तिल छिप जाता है, उसके बाद आई-लाइनर से तिल बनाते हुए कहती है, ‘यह आई-लाइनर कई काम कर देता है। आइब्रो पर लगाने से चेहरे की खूबसूरती तो बढ़ती ही है, इसी से तिल भी बना लेती हूं। जब मेरे ओठ के नीचे का तिल दिखता है तो लोग काफी पसंद करते हैं। करीब 40 मिनट तक मेकअप करती है, उसके बाद आखिरी में अपनी आंखों में नीले रंग का लेंस लगाते हुए कहती है, इन्हीं आंखों पर तो पूरा बिहार फिदा है। कपड़े छोटे हो तो लोग ज्यादा पैसा लुटाते हैं शाम 7 बजने में 10 मिनट से भी कम समय बचा तो स्वीटी कपड़े बदलने लगी। कहा, ‘सभी लड़कियों को खुद से ड्रेस खरीदना होता है या अपना लाना होता है। थिएटर की ओर से ड्रेस नहीं मिलता।’ वह एक ब्लू रंग की स्लीवलेस टॉप और हॉट पैंट अपने ट्राली बैग से निकालती है। किस तरह के ड्रेस पहनकर स्टेज पर जाती हो? इस पर स्वीटी ने कहा, ‘कपड़े को लेकर पर्सनल चॉइस होती है। छोटे कपड़े पहन कर जाने से दर्शक ज्यादा पैसे लुटाते हैं।’ इस बीच स्वीटी ने ब्लू टॉप वापस ट्रॉली में रखा और सफेद स्लीवलेस टॉप निकाला। बोली, ‘हॉट पैंट ब्लू है इसलिए व्हाइट कलर के साथ बढ़िया मैच करेगा। 25 जोड़ी कपड़े लेकर आई हूं। हर दिन अलग-अलग कपड़े पहनती हूं।’ छोटे कपड़े पहनने को लेकर स्वीटी ने कहा, ‘यहां सारी लड़कियां छोटे कपड़े पहनती हैं। पहनने के लिए तो सूट भी पहन सकती हूं, लेकिन कोई पसंद ही नहीं करेगा। छोटे कपड़े पहन कर जाती हूं तो हमारे ऊपर खूब पैसे लुटाए जाते है। थिएटर मालिक भी छोटे कपड़े पहन कर स्टेज पर जाने के लिए कहते हैं।’ पीरियड में भी डांस करना मजबूरी, बदल जाते हैं कपड़े डांसर पीरियड के समय को कैसे मैनेज करती हैं? इस पर स्वीटी ने कहा, ‘हर रोज कोई न कोई लड़की पीरियड में रहती है। यहां कोई छुट्टी नहीं। हमें पीरियड में भी डांस करना होता है। स्टेज पर नहीं जाने पर पैसे काट लिए जाते हैं। पीरियड के हमलोग दौरान जींस या साड़ी पहनती हैं।’ स्वीटी से बात करते-करते शाम के 7 बज गए। इस बीच अनाउंस हुआ सभी लड़कियां स्टेज पर चढ़ जाएं। एक आदमी हर केबिन में झांककर देखने लगा। जो लड़की अभी स्टेज पर नहीं गई थी उसे जल्दी से जाने के लिए कहने लगा। इसी बीच स्वीटी बोली अब स्टेज पर जाने का समय हो गया है। इतना कहकर वह केबिन से बाहर निकली और स्टेज पर पहुंच गई। पार्ट-2ः अब कहानी स्टेज और थिएटर की सोनपुर मेला में शाम का समय। सूरज ढलने के साथ ही एक-एक कर थिएटरों में हनुमान चालीसा और भक्ति गाने बजने शुरू हो गए। आवाज इतनी तेज कि कान के पर्दे फट जाए। 2 से 3 भक्ति गानों के बाद हिन्दी गाने, फिर भोजपुरी गाने बजने लगे। शाम को हमें लौटने वालों से ज्यादा आने वालों की भीड़ दिखी। थिएटर में बज रहे गानों के बीच बार-बार अनाउंस किया जा रहा था, ‘सभी लड़कियां जल्दी से तैयार होकर स्टेज पर पहुंच जाएं।’ अनाउंसर लोगों को रिझाने के लिए कहता है, ‘रात भर स्टेज शो का आनंद लीजिए। वायरल गर्ल का डांस देखिए। एक साथ 100 लड़कियों का डांस देखिए। जल्दी से टिकट खरीदें, हाउसफुल होने वाला है।’ इन्हीं आवाजों के बीच हम (भास्कर रिपोर्टर) एक थिएटर के पास पहुंचे। वहां वायरल गर्ल काजल और नेहा का पोस्टर लगा था। थिएटर के बाहर टिकट खरीदने के लिए लोगों की लाइन लगी थी। स्टेज पर एक बार में 100 लड़कियां करती हैं डांस थिएटर के अंदर बड़ा स्टेज बनाया गया है। करीब 100 लड़कियां डांस कर रहीं हैं। थिएटर के गेट पर पर्दा लगा है। वह भी ऐसा कि बाहर से लोग डांस कर रही लड़कियों की झलक तो देख सकें, लेकिन पूरा स्टेज नहीं। पास खड़ा स्टाफ किसी को ज्यादा देर गेट के पास टिकने नहीं देता, कहता है देखना है तो टिकट लीजिए, भीड़ नहीं लगाइए। जैसे ही शाम 7 बजा एक-एक कर स्कर्ट और छोटे कपड़े पहनी लड़कियां स्टेज पर चढ़ने लगीं। 5 मिनट के अंदर स्टेज लड़कियों से भर गया। भोजपुरी और हिंदी गाने बजने लगे और दर्शक गंदे इशारे। बीच-बीच में गाने पर पैसे देने वालों की कमी नहीं थी। कार्यक्रम सुबह 4 बजे तक चला। हालांकि, थिएटर आधा ही भरा था।