यूपी का दलित समाज संविधान को लेकर काफी संजीदा है। 2024 में जब संविधान पर खतरे की बात उठी, तो दलितों ने बसपा की बजाय कांग्रेस को वोट दिया। जहां कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव में उतरे, वहां बसपा को काफी कम वोट मिले। वहीं, INDI गठबंधन में शामिल जहां सपा लड़ी, वहां बसपा को ज्यादा वोट मिले। कांग्रेस इसी आंकड़े के आधार पर अब 2027 विधानसभा में सपा के साथ सीटों की बारगेनिंग करने जा रही। दलितों में अपनी पैठ बढ़ाने के मकसद से ही कांग्रेस 26 नवंबर से दलितों को जोड़ने के लिए चौपाल पर संविधान की चर्चा अभियान शुरू करने जा रही। कांग्रेस पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम कहते हैं- यूपी में दलितों के स्वाभिमान पर लगातार हमले हो रहे। हम उनके बीच जाएंगे और भाजपा की साजिश के बारे में बताएंगे। आंकड़ों के साथ ये भी बताएंगे कि कांग्रेस के शासन में दलितों को क्या-क्या सुविधाएं मिली थीं? दरअसल, 2024 में कांग्रेस 15 साल बाद 6 सीटें जीतने में सफल रही थी। इससे पहले 2009 में उसने अकेले लड़कर 18.25% वोट हासिल किए थे। उसने 21 सीटों पर जीत दर्ज की थी। जबकि 2019 में 6.36% वोट व 1 सीट और 2014 में 7.50% वोट व 2 सीटें मिली थीं। 2024 में सपा के साथ गठबंधन से कांग्रेस को 6 सीटें और 9.46% वोट मिले। कांग्रेस का प्रदर्शन बसपा को मिले 9.39% वोट से अच्छा रहा था। 2027 में यूपी में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस बार कांग्रेस की चुनाव को लेकर क्या स्ट्रैटजी है? क्या इस बार भी वह महागठबंधन का हिस्सा बनकर चुनाव में उतरेगी? दलितों में पैठ बढ़ाने की उसकी क्या रणनीति है? दैनिक भास्कर ने कांग्रेस में अपने सोर्सेज, पार्टी लीडर्स और पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स से समझने की कोशिश की। महागठबंधन को कांग्रेस के चलते मिले थे दलित वोट
कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष विश्वविजय सिंह आंकड़ों के साथ दावा करते हैं। कहते हैं- 2024 लोकसभा में यूपी में कांग्रेस की वजह से महागठबंधन को दलित वोट मिले थे। अवध से लेकर पूर्वांचल में जहां-जहां कांग्रेस ने चुनाव लड़ा, वहां की 12 सीटों में बसपा को एक लाख से भी कम वोट मिले। जहां सपा के प्रत्याशी उतरे, वहां बसपा को 1 लाख से अधिक वोट मिले। उन्होंने कुछ उदाहरण भी बताए। जैसे कांग्रेस ने पूर्वांचल की वाराणसी, मिर्जापुर, इलाहाबाद, देवरिया, महराजगंज, बांसगांव लोकसभा सीट गठबंधन में लड़ी थी। वाराणसी में 33 हजार, इलाहाबाद में बसपा को 49 हजार, देवरिया 45 हजार, महराजगंज में 32 हजार, बांसगांव में 64 हजार ही वोट मिले थे। जबकि पूर्वांचल की संतकबीरनगर, मिर्जापुर, भदोही, लालगंज, घोसी, जौनपुर, रॉबर्ट्सगंज, डुमरियागंज, लालगंज, बलिया, मऊ, आजमगढ़, बस्ती जैसी सीटों पर सपा ने चुनाव लड़ा था। वहां बसपा को 1.50 से 2 लाख तक वोट मिले थे। इन आंकड़ों से साफ है कि दलितों ने महागठबंधन को वोट दिया, लेकिन तुलनात्मक रूप से उनकी पसंद कांग्रेस थी। कांग्रेस ने 17 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था। इनमें 12 सीटों पर बसपा को 1 लाख से कम वोट मिले थे। सिर्फ 5 सीटें ही ऐसी रहीं, जहां बसपा को एक लाख से ज्यादा वोट मिले। जबकि सपा ने 62 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इनमें 24 सीटों पर बसपा को 1 लाख से अधिक वोट मिले थे। एक सीट गठबंधन में ममता बनर्जी की टीएमसी को मिली थी। वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय कहते हैं- वैसे भी कांग्रेस दलितों का पुराना घर रहा है। दलित-मुस्लिम और ब्राह्मण की सोशल इंजीनियरिंग पर ही कांग्रेस ने कई सालों तक केंद्र और यूपी में राज किया था। जातिवादी पार्टियों के अस्तित्व में आने के बाद कांग्रेस का कोर वोटबैंक उससे दूर चला गया था। लेकिन, अब भी दलितों में कांग्रेस के प्रति एक विश्वास है। लोकसभा में चूंकि बसपा लड़ाई में भी नहीं थी, ऐसे में दलित खासकर संविधान को बचाने के नाम पर बड़ी संख्या में कांग्रेस के साथ गए और महागठबंधन को इसका फायदा मिला। जानिए दलितों को साधने के लिए कांग्रेस की क्या है रणनीति लोकसभा- 2024 के प्रदर्शन के आधार पर ही कांग्रेस यूपी को लेकर उम्मीद लगाए है। पार्टी ने यूपी में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए खासकर दलितों और ओबीसी वर्ग को आकर्षित करने के लिए अपनी रणनीति बदली है। कांग्रेस पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम कहते हैं- यूपी में दलितों के स्वाभिमान पर लगातार हमला हो रहा। डॉ. अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ी जा रहीं। शोषण-उत्पीड़न किया जा रहा। इन सभी घटनाओं में भाजपा के लोग शामिल हैं। दलितों को काम के बदले रुपए मांगने पर पेशाब छिड़का जा रहा। स्कूल बंद करके दलित समाज को पीछे धकेला जा रहा, क्योंकि ज्ञान से सवाल पूछने का हौसला आता है। दलितों को पढ़ाई से वंचित करने के लिए स्कूलों की फीस महंगी की जा रही। सरकारी उपक्रम बेचे जा रहे। लैटरल एंट्री के जरिए भर्ती हो रही, जो दलितों के खिलाफ साजिश है। हम गांव-गांव में कैडर विकसित करेंगे। किसानों की जमीन किसे दे रहे, उससे लोगों को वाकिफ करेंगे। हम लोगों को जागरूक करेंगे। विधानसभा चुनाव 2027 में अभी एक साल का वक्त है। हम 26 नवंबर से हर गांव में चौपाल लगाकर दलितों के साथ संविधान पर चर्चा करेंगे। बताएंगे कि कांग्रेस के शासन में दलितों को क्या-क्या मिला? जो अब भाजपा की सत्ता में उनसे छीना जा रहा। दलितों को बताएंगे कि बसपा जैसी पार्टियां भाजपा को नहीं रोक पाएंगी। यूपी के 20 से 22 चौपालों में खुद राहुल गांधी भी शामिल होंगे और दलितों से सीधे बात करेंगे। 4 मकसद के साथ शुरू होगी चौपाल में संविधान पर चर्चा कांग्रेस सभी 403 विधानसभाओं पर कर रही तैयारी
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय कहते हैं- हमारी तैयारी सभी 403 विधानसभा सीटों पर है। संगठन सृजन अभियान के तहत हम सभी 403 विधानसभा में बूथ लेवल तक संगठन को खड़ा करने में जुटे हैं। कांग्रेस ओबीसी और दलितों को साधने के लिए ही चौपाल में संविधान पर चर्चा अभियान भी शुरू करने जा रही। विधानसभा से पहले हमारे कार्यकर्ता यूपी में पंचायत चुनाव लड़ेंगे। उनमें अच्छा प्रदर्शन करने वालों को विधानसभा में भी मौका दिया जाएगा। इसके बाद 2026 के आखिरी में होने वाले शिक्षक और स्नातक की 11 एमएलसी सीटों पर भी कांग्रेस अकेले लड़ने की तैयारी कर रही। प्रत्याशी चयन के साथ ही सदस्यता अभियान में चलाया जा रहा। बिहार चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस को कम सीटें देना चाहती है सपा
दरअसल, बिहार चुनाव परिणाम के बाद सपा यूपी में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। बिहार में कांग्रेस 61 सीटों पर लड़कर महज 5 सीटें ही जीत सकी थी। यही वजह है कि यूपी में कांग्रेस लोकसभा के आंकड़ों और दलित व ओबीसी वर्ग को साधने की रणनीति पर आगे बढ़कर अपनी बारगेनिंग पावर बढ़ाने में जुटी है। जबकि सपा ने 2022 के विधानसभा चुनाव में सहयोगियों के लिए 63 सीटें छोड़ी थीं। इस बार भी वह इतनी ही सीटें सहयोगी दलों को देना चाहती है। हालांकि कांग्रेस 17 लोकसभा सीटों के आधार पर कम से कम 75-85 सीटों पर दावा कर रही है। सपा इसे ये कहते हुए खारिज कर रही कि 2024 लोकसभा में कांग्रेस 17 लोकसभा की 85 सीटों में सिर्फ 39 विधानसभाओं में ही बढ़त हासिल कर पाई थी। इसी तरह 2017 में उसके साथ गठबंधन में कांग्रेस 114 सीटों पर लड़कर सिर्फ 7 जीत पाई थी। 2022 में कांग्रेस 399 सीटों पर अकेले लड़कर सिर्फ 2 सीटें जीत पाई थी। 4 सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे थे। भाजपा के हिंदुत्व की काट के लिए पीडीए का सहारा
सपा-कांग्रेस गठबंधन भाजपा के हिंदुत्व की काट के लिए पीडीए के नारे पर आगे बढ़ रहा है। कांग्रेस भी सपा की तरह पीडीए को मजबूत करने में जुटी है। उसकी कोशिश दलित और ओबीसी को साधना है। गठबंधन ये मानकर चल रहा है कि मुस्लिम का बहुतायत वोट उसे ही मिलेगा। ओबीसी में यादव वोटबैंक में सपा का दबदबा है। अन्य ओबीसी वोटर्स को साधने की चुनौती कांग्रेस ने संभाली है। यही कारण है कि राहुल जातिगत जनगणना पर अधिक जोर दे रहे हैं। ———————– ये खबर भी पढ़े- क्या RSS की तरह रणनीति बना रहीं मायावती, MY फॉर्मूला का काट लाने की तैयारी ‘मायावती ने लखनऊ में रैली की तो भीड़ उमड़ पड़ी। ये वो भीड़ थी, जो अपने साथ रोटियां बांधकर लाई थी। सोचिए कितनी कमिटेड जनता होगी, जो सिर्फ मायावती के नाम पर इकट्ठी हुई। वरना रैलियों में लोग तब जाते हैं, जब कम से कम खाने-पीने का अच्छा इंतजाम हो। कई बार तो लोग बारात जैसा स्वागत मांगते हैं।’ पढ़े पूरी खबर…