हाईकोर्ट ने मंगलवार को चंडीगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि शहर में खुलेआम फायरिंग की घटनाएं हो रही हैं, वहीं पुलिस एक पुराने सिविल विवाद में जरूरत से ज्यादा सक्रिय नजर आ रही है। प्रथम दृष्टया मामले में गलत मंशा दिखाई देती है। जस्टिस जगमोहन बंसल ने यह टिप्पणी कनाडाई नागरिक सरबजीत गिल की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। सीबीआई को सभी पक्षों और पुलिस अफसरों की भूमिका की प्रारंभिक जांच के आदेश दिए। कोर्ट ने कहा- पुलिस अफसरों की भूमिका उनके पद की परवाह किए बिना जांची जाए। सीबीआई के वकील ने सुझाव दिया कि पहले प्रारंभिक जांच कर रिपोर्ट अदालत में पेश की जा सकती है। इसे स्वीकार कर लिया। मामले की अगली सुनवाई अब 7 सितंबर को होगी। कनाडाई नागरिक को एयरपोर्ट पर रोका था याचिकाकर्ता गिल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर वर्चुअल माध्यम से जांच में शामिल होने की अनुमति मांगी थी। गिल ने कहा कि वह पहले ही जांच में पूरा सहयोग कर चुके थे। यूटी प्रशासन को लुकआउट सर्कुलर रिकॉर्ड पर रखने और कनाडा लौटने की अनुमति देने के निर्देश दिए जाएं। 5 मार्च को वह कनाडा लौटने के लिए दिल्ली के एयरपोर्ट पहुंचे तो विदेश यात्रा से रोक दिया गया। 8 और 18 मार्च को विदेश जाने की अनुमति के लिए आवेदन दिए और पत्नी के खराब स्वास्थ्य का हवाला दिया था। दलील: प्रॉपर्टी डीलर के इशारे पर दर्ज की एफआईआर याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि यह पूरा मामला सेक्टर-2 स्थित एक प्रॉपर्टी से जुड़े दस्तावेजों का है, जो वर्ष 1975 और 1999 में एग्जीक्यूट हुए थे। यह विवाद पहले से ही विभिन्न सिविल अदालतों में विचाराधीन है। गिल के वकील ने आरोप लगाया कि पुलिस ने एक प्रॉपर्टी डीलर और शिकायतकर्ता के कहने पर यह एफआईआर दर्ज की है। जबकि संबंधित विवाद पहले ही कई अदालतों में उठाया जा चुका था और इस मामले में धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत शुरू की गई कार्यवाही भी पहले ही खारिज हो चुकी थी। अदालत ने पुलिस की इस जांच पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि यह पूरा प्रकरण सीबीआई से ही जांच कराए जाने के योग्य है।