अपाहिज पुत्र व लकवे से बीमार मां को दी जिंदगी:अमृतसर के पिंगलवाड़ा चैरिटेबल ट्रस्ट ने दिया आश्रय, इलाज से हो रहा सुधार

इंसानियत आज भी जिंदा है और इसका सबसे जीवंत उदाहरण है, अमृतसर का पिंगलवाड़ा चैरिटेबल ट्रस्ट। संस्था ने हाल ही में एक अपाहिज पुत्र और लकवे की चपेट में आई मां को आश्रय ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें नई जिदगी देने में भी अहम भूमिका निभाई। गुवाहाटी और शिलॉन्ग से ताल्लुक रखने वाले प्रणव, जो खुद अपाहिज है, मेहनती और पढ़ाई में तेज है, अपनी मां के लिए हर संभव प्रयास करता रहा। अचानक उसकी मां लकवे की चपेट में आ गई और उनके इलाज के लिए प्रणव बेंगलुरु पहुंचे। यहां डॉक्टरों ने उन्हें PGI चंडीगढ़ भेज दिया, लेकिन वहां भी उनका इलाज संभव नहीं हो सका। दोनों मां-पुत्र अचानक सहारे के बिना सड़क पर आ गए। मुश्किल हालात में कुछ सिख भाइयों ने मदद का हाथ बढ़ाया और अपने खर्च पर उन्हें अमृतसर भेजा। वहीं एक ड्राइवर ने सीधे उन्हें पिंगलवाड़ा पहुंचा दिया, जहां संस्था ने तुरंत उनकी स्थिति का आकलन कर उन्हें आश्रय और इलाज प्रदान किया। पिंगलवाड़ा की मुखिया बीबी इंदरजीत कौर के अनुसार, जिसका कोई नहीं होता, उसका पिंगलवाड़ा होता है। संस्था अपाहिज, मानसिक रोगी, बेसहारा और लावारिस लोगों के लिए पूरी सुविधाएं उपलब्ध कराती है। यहां न केवल रहने और खाने-पीने का इंतजाम है, बल्कि बच्चों की शिक्षा का भी ध्यान रखा जाता है। डॉ. गुलशन, पिंगलवाड़ा के मेडिकल अफसर का कहना है कि अब मां और पुत्र दोनों सुरक्षित हैं और उनकी सेहत में सुधार हो रहा है। प्रणव भावुक होते हुए कहता है, अब यही मेरा घर है, मैं यहां से कहीं नहीं जाऊंगा। मुझे यहां सब कुछ मिल गया है।अब वह संस्था की शाखा में सेवा देने के लिए भी तैयार है। जहां दुनिया ने इस मां-पुत्र का साथ छोड़ दिया, वहां पिंगलवाड़ा ने उन्हें अपनाया और नई जिंदगी दी। यह कहानी साबित करती है कि अगर दिल में सेवा की भावना हो, तो किसी की भी जिदगी बदली जा सकती है। पिंगलवाड़ा चैरिटेबल ट्रस्ट आज भी उन लोगों के लिए खड़ा है, जिनका समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। इस तरह, इंसानियत की यह मिसाल यह दर्शाती है कि कभी-कभी मदद का एक छोटा हाथ भी किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है।

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