जींद जिले के सफीदों क्षेत्र के गांव खरकगागर की गलियों में मातम पसरा है और हर ग्रामीण की आंख नम थी। करीब ढाई महीने बाद गांव की मिट्टी ने अपने उस बेटे कमल को वापस देखा, जो कभी बेहतर भविष्य की तलाश में इंग्लैंड गया था, लेकिन अब ताबूत में लिपटा हुआ लौटा। बड़े गमगीन माहौल में कमल का अंतिम संस्कार किया गया। दूसरी तरफ सहानपुर गांव के 32 वर्षीय सुधीर राठी की अमेरिका में मौत हुई है। परिवार की आर्थिक हालत ऐसी नहीं कि शव को घर ला सके। 25 साल की उम्र में थम गई जिंदगी कमल, उम्र मात्र 25 वर्ष। सपनों से भरा एक नौजवान, जिसने अपने बूढ़े मां-बाप की उम्मीदों को सीने में लेकर इंग्लैंड की राह पकड़ी थी। गांव की तंग गलियों से निकलकर उसने सोचा था कि परदेस की चमक उसके घर की अंधेरी रातों को रोशन कर देगी। लेकिन किसे पता था कि वही परदेस उसकी आखिरी मंज़िल बन जाएगा। डंकी के रास्ते इंग्लैंड पहुंचा, 30 लाख रुपए का कर्ज लिया कमल ने इंग्लैंड पहुंचने के लिए डंकी का रास्ता चुना था—एक खतरनाक सफर, जिसमें हर कदम पर मौत का साया मंडराता है। रिश्तेदारों और दोस्तों से करीब 30 लाख रुपए उधार लेकर वह निकला था, उम्मीद थी कि वहां पहुंचकर सब चुका देगा और मां-बाप के चेहरे पर मुस्कान लौट आएगी। पर किस्मत ने कुछ और ही लिखा था। बर्घिंगम में 16 सितंबर को हुई मौत 16 सितंबर की रात, इंग्लैंड के बर्घिंगम शहर में अचानक उसकी हृदय गति रुक गई। परदेस की ठंडी दीवारों के बीच उसका दिल थम गया, और उसके साथ थम गईं वो सारी उम्मीदें, जो उसने अपने गांव के लिए संजोई थीं। तीन लाख रुपए खर्च कर लाया गया शव परिवार के लिए यह खबर किसी वज्रपात से कम नहीं थी। मां की चीखें गांव की गलियों में गूंज उठीं, पिता की आंखों से आंसू सूख गए। बेटे का शव वापस लाने के लिए उन्होंने हर दरवाज़ा खटखटाया। इंग्लैंड में रह रही वीना देशवाल और सज्जन देशवाल ने मदद का हाथ बढ़ाया। 3 लाख रुपए का खर्च, ढाई महीने की लंबी प्रक्रिया और आखिरकार, कमल अपने गांव लौटा। गांव में उमड़ा जनसैलाब, मातम में डूबा परिवार जब ताबूत गांव पहुंचा, तो पूरा इलाका उमड़ पड़ा। हर आंख में आंसू थे, हर दिल में दर्द। ढोल-नगाड़ों की जगह सिसकियों की आवाजें थीं। कमल का अंतिम संस्कार गांव की मिट्टी में हुआ, उसी मिट्टी में जिसने उसे जन्म दिया था। अधूरी रह गई मां-बाप की उम्मीदें अब उस घर में सन्नाटा है, जहां कभी कमल की हंसी गूंजती थी। दीवारों पर टंगी उसकी तस्वीर अब हर दिन मां की आंखों से बात करती है। पिता की झुकी हुई कमर अब और झुक गई है। हजारों युवाओं की हकीकत बन गई कमल की कहानी कमल की कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं की है जो सपनों की कीमत अपनी जान देकर चुकाते हैं। परदेस की चमक के पीछे छिपे अंधेरे को शायद अब भी बहुत से लोग नहीं देख पाते। और गांव खरकगागर की मिट्टी, आज भी उस बेटे की याद में भीगी हुई है, जो लौट तो आया—पर हमेशा के लिए खामोश होकर। अमेरिका में भी एक युवक की मौत, तीन बहनों के इकलौता भाई दूसरी तरफ जींद जिले के गांव सहानपुर (सफीदों) के युवक सुधीर राठी (32) की अमेरिका में 6 दिन पहले बीमारी से मौत हो गई। वह तीन बहनों का इकलौता भाई था। परिवार का रो रोकर बुरा हाल है और परिवार की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं है कि बेटे के शव को इंडिया ला सके। सुधीर के पार्थिव शरीर को गांव लाने के लिए ग्रामीणों ने आर्थिक मदद की गुहार लगाई है। परिजनों ने बताया कि सुधीर करीब ढ़ाई साल पहले डोंकी के रास्ते अमेरिका गया था। इसके लिए परिवार ने डेढ़ एकड़ जमीन बेच दी थी। सुधीर करीब डेढ़ महीने वेंटिलेटर पर था। 23 नवंबर की रात को उनकी मौत हो गई।