नॉर्दर्न रेलवे के सेवानिवृत्त कर्मचारी सुरिंदर कुमार को सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) चंडीगढ़ से राहत नहीं मिली। ट्रिब्यूनल ने उनके उस दावे को खारिज कर दिया, उन्होंने खुद को सीनियर शंटर बताते हुए ज्यादा वेतनमान देने और उसी आधार पर पेंशन दोबारा तय करने की मांग की थी। जानिए पूरा मामला क्या था लुधियाना निवासी सुरिंदर कुमार ने 1972 में रेलवे में क्लीनर के रूप में नौकरी शुरू की थी। बाद में वे फायरमैन, फर्स्ट फायरमैन और फिर 2002 में शंटर बने। आवेदक का दावा था कि उन्हें 4 फरवरी 2005 को सीनियर शंटर के पद पर पदोन्नत किया गया और वे उसी पद पर कार्यरत रहे। 2010 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने मांग की कि उनकी पेंशन का निर्धारण सीनियर शंटर के वेतनमान (5000-8000 रुपये, समकक्ष पे बैंड 9300-34800 व ग्रेड पे 4200) के आधार पर किया जाए। पैनल में था आवेदक का नाम रेलवे प्रशासन ने कहा कि भले ही आवेदक का नाम पैनल में था, लेकिन दो वर्ष की ‘विथ इन्क्रीमेंट्स टेम्पररी’ (WIT) सजा के कारण उनकी पदोन्नति प्रभावी नहीं हो सकी। इसी दौरान 16 मई 2006 को वे चिकित्सकीय रूप से डि-कैटेगराइज हो गए और उन्हें वैकल्पिक पद पंप ऑपरेटर-1 (4500-7000) पर समायोजित किया गया। नियमों के तहत 30% रनिंग अलाउंस जोड़कर उनका वेतन तय किया गया। मेडिकल आधार पर अयोग्य घोषित पीठ ने कहा कि कर्मचारी की पदोन्नति सजा (दंड अवधि) चलने की वजह से लागू ही नहीं हो पाई। इसलिए उन्हें सीनियर शंटर नहीं, बल्कि शंटर (4000-6000 वेतनमान) ही माना जाएगा। जब वे मेडिकल आधार पर अयोग्य घोषित हुए और दूसरे पद पर लगाए गए, तब उनका वेतन नियमों के मुताबिक ही तय किया गया था। इन्हीं कारणों से ट्रिब्यूनल ने उनकी याचिका खारिज कर दी। अब उन्हें ऊंचा वेतनमान और बढ़ी हुई पेंशन का लाभ नहीं मिलेगा।