चंडीगढ़ कोर्ट ने हेड कांस्टेबल रणबीर सिंह की मृत्यु के बाद उनके सेवा लाभों को लेकर दायर सिविल अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कथित पंचायत/समुदाय तलाक (कस्टमरी डिवोर्स) को साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य पेश नहीं किए गए, इसलिए पत्नी का वैवाहिक संबंध समाप्त मानना कानूनन संभव नहीं है। यह आदेश जज अश्वनी कुमार ने सुदेश राव बनाम उषा रानी एवं अन्य मामले में सुनाया। सुदेश राव ने दावा किया था कि उनके भाई रणबीर सिंह की शादी 3 अप्रैल 1991 को उषा रानी से हुई थी, लेकिन शादी अधिक समय तक नहीं चली। वर्ष 1993 में समुदाय की पंचायत में दोनों के बीच आपसी सहमति से तलाक हो गया था, जिसका लिखित समझौता 12 फरवरी 1993 को तैयार हुआ। वादिनी का आरोप था कि तलाक के बाद उषा रानी ने राम प्रसाद से दूसरा विवाह कर लिया और तीन बेटियां हुईं। ऐसे में रणबीर सिंह की 5 मई 1994 को सड़क दुर्घटना में मौत के बाद उषा रानी को उनकी विधवा या कानूनी प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। सुदेश राव ने कोर्ट से घोषणा (डिक्लेरेशन) की मांग की थी कि उषा रानी का रणबीर सिंह की संपत्ति और सेवा लाभों पर कोई अधिकार नहीं है। विधवा सेवा लाभ पाने की हकदार उषा रानी ने कोर्ट में कहा कि उनका विवाह कभी कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ। न तो कोई वैध पंचायत तलाक हुआ और न ही हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक की प्रक्रिया अपनाई गई। उन्होंने दावा किया कि वह रणबीर सिंह की विधवा हैं और सेवा लाभ पाने की हकदार हैं। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2019 में सुदेश राव द्वारा दायर दावा खारिज करते हुए स्पष्ट कहा था कि कथित कस्टमरी डिवोर्स यानी पंचायत के माध्यम से हुए तलाक का कोई ठोस और विश्वसनीय प्रमाण कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू विवाह केवल हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के तहत ही विधिक रूप से समाप्त किया जा सकता है। महज आपसी समझौते, अलग रहने या किसी निजी दस्तावेज के आधार पर विवाह को कानूनी रूप से समाप्त नहीं माना जा सकता। रिवाज के आधार पर तलाक का दावा अपील में सुदेश राव ने तर्क दिया कि पंचायत तलाक की परंपरा ‘राव’ समुदाय में प्रचलित है और इस संबंध में गवाह भी पेश किए गए। कोर्ट ने कहा कि समुदाय में पंचायत के जरिए तलाक होने की कोई पक्की और भरोसेमंद सबूत पेश नहीं किए गए। जो गवाह लाए गए, वे उस समुदाय के सदस्य नहीं थे और उन्हें ऐसी किसी परंपरा की सीधी जानकारी भी नहीं थी। जो समझौता पत्र दिखाया गया, उसे कानून के अनुसार वैध तलाक नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर किसी रिवाज के आधार पर तलाक का दावा किया जाता है, तो उसे मजबूत और स्पष्ट सबूतों से साबित करना जरूरी होता है। अदालत ने की अपील खारिज कोर्ट ने निचली कोर्ट के फैसले को सही माना और सुदेश राव की सिविल अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के निर्णय में कोई कानूनी गलती नहीं है। इस फैसले के बाद रणबीर सिंह की पत्नी के रूप में उषा रानी का कानूनी दर्जा बरकरार रहेगा। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि डिक्री शीट तैयार कर केस का रिकॉर्ड संबंधित कोर्ट को वापस भेज दिया जाए।