धमदाहा में जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) की अनुविज्ञप्ति निकलते ही डाकघर के बाहर सुबह से ही लंबी कतारें लग गईं। हैरानी की बात यह रही कि डाकघर में रजिस्ट्री की प्रक्रिया दोपहर 2:00 बजे के बाद बंद हो जाती है, लेकिन आवेदन जमा करने के लिए युवा सुबह 8:00 बजे से पहले ही लाइन में लगने को मजबूर दिखे। जैसे-जैसे समय बीतता गया, कतार और लंबी होती गई और डाक सेवा कर्मी भी लगातार काम में जुटे रहे। इन कतारों में खड़े युवाओं को देखकर एक गंभीर सवाल खड़ा होता है। बीए, एमबीए, डबल ग्रेजुएट जैसे उच्च शिक्षित युवा भी मामूली आवेदन जमा करने के लिए घंटों पसीना बहा रहे हैं। उनके पास डिग्रियां हैं, लेकिन उन डिग्रियों के अनुरूप रोजगार नहीं। यह दृश्य केवल एक डाकघर की समस्या नहीं, बल्कि देशभर की स्थिति को उजागर करता है। कोई भी वैकेंसी निकलते ही युवा बिना विकल्प के हर फॉर्म भरने के लिए दौड़ पड़ते हैं। चाहे नौकरी उनकी योग्यता के अनुरूप हो या नहीं—मजबूरी उन्हें हर अवसर के पीछे भागने पर मजबूर कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का परिणाम है। जब उच्च शिक्षित युवा भी असुरक्षित भविष्य के बीच कतारों में खड़े नजर आते हैं, तो यह व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह असंतोष एक बड़े सामाजिक संकट का रूप ले सकता है। फिलहाल, लंबी कतारों में खड़े डिग्रीधारी युवा देश के विकास मॉडल की सच्चाई को बेनकाब कर रहे हैं।