चीन एक बार फिर अपनी तकनीकी उपलब्धियों के झूठे प्रचार को लेकर दुनिया की आलोचना का पात्र बना है। हाल ही में चीन ने ल्हासा में ‘डीपज़ैंग’ (DeepZang) नामक एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मॉडल को दुनिया का पहला तिब्बती भाषा का बड़ा मॉडल (LLM) बताकर पेश किया। हालांकि, तकनीकी तथ्यों ने बीजिंग के इस दावे को निराधार साबित कर दिया है। असलियत यह है कि हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित ‘मोनलाम तिब्बती आईटी अनुसंधान केंद्र’ ने चीन की इस पहल से काफी पहले ही तिब्बती एआई के क्षेत्र में वैश्विक कीर्तिमान स्थापित कर लिया था। चीन की सरकारी कंपनी चोकनोर द्वारा विकसित ‘डीपज़ैंग’ को लेकर दावा किया गया कि यह तिब्बती संस्कृति और इतिहास के संरक्षण के लिए दुनिया का पहला विश्वसनीय मंच है। कंपनी के चेयरमैन तेनज़िन नोरबू ने इसे राष्ट्रीय और जातीय स्तर पर तकनीकी कमी को दूर करने वाला बताया। हालांकि, जानकारों का कहना है कि यह केवल एक राजनीतिक एजेंडा है, क्योंकि धर्मशाला में विकसित ‘मेलोंग एआई’ (Melong.ai) पहले से ही अस्तित्व में है और अधिक सक्षम है। कई प्लेट फार्म को पीछे छोड़ चुका है 3 नवंबर 2023 को धर्मशाला में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मोनलाम केंद्र ने यह सिद्ध कर दिया था कि उनका प्लेटफॉर्म गूगल के जेमिनी, क्लाउड और डीपसीक जैसे दिग्गज वैश्विक मॉडलों को तिब्बती भाषा की समझ के मामले में पीछे छोड़ चुका है। मोनलाम के उन्नत संस्करण ‘मोनलाम थिंक’ की विश्लेषण क्षमता चीन के वर्तमान मॉडल से कहीं अधिक गहरी और सटीक मानी जा रही है मेलोंंग AI 140 भाषाओं को सपोर्ट करता है जहाँ चीन का मॉडल 80 भाषाओं का दावा कर रहा है, वहीं मेलोंग एआई 140 से अधिक भाषाओं को सपोर्ट करता है और टेक्स्ट के साथ-साथ इमेज इनपुट को भी समझ सकता है। इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत के भुचुंग के. त्सेरिंग ने सोशल मीडिया पर चीन के इस दावे को ‘बेशर्मी भरा’ करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्मशाला के भिक्षु गेशे मोनलाम द्वारा विकसित एआई प्रणाली ही वास्तविक रूप से पहली और अधिक सक्षम तकनीक है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि चीन इस तकनीकी दावे के जरिए तिब्बती भाषा पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है और स्वतंत्र रूप से विकसित हो रही तकनीकों के अस्तित्व को नकारने की कोशिश कर रहा है।