नवजोत सिद्धू बोलीं- राजनीति छोड़ने की सोच रही:कैंसर हुआ तो भगवान को शुक्रिया कहा; हरियाणा के संत रामपाल के आश्रम गई थीं

पंजाब कांग्रेस के पूर्व प्रधान व पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिद्धू की पत्नी डॉ. नवजोत कौर सिद्धू ने कहा कि मैं राजनीति खत्म कर संतों की सेवा करने की सोच रही हूं। अगर राजनीतिक लोग दूर हो जाएं तो संत रामपाल जैसे लोग ही धरती को संभाल लेंगे। आजकल के राजनीतिक लोग अपनी पहचान भूल चुके हैं। नवजोत 2 दिन पहले फतेहगढ़ साहिब स्थित सतलोक आश्रम में गई हुई थीं, जहां मीडिया से बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि जब उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हुआ तो उन्होंने भगवान का शुक्रिया कहा। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने बॉडी दान कर रखी है। ब्रेस्ट की किसी को जरूरत नहीं होती, बाकी बॉडी के हिस्से ठीक हैं तो वह किसी के काम आएंगे। हालांकि, जिस संत रामपाल के आश्रम में नवजोत कौर गई थीं, वह मूल रूप से हरियाणा के हैं और इस वक्त जेल में बंद हैं। संत रामपाल पर देशद्रोह के आरोप तक के केस दर्ज हैं। हालांकि, कई केसों में वह बरी हो चुके हैं। नवजोत कौर सिद्धू को पार्टी विरोधी बयानबाजी के चलते कांग्रेस पहले सस्पेंड और फिर पार्टी से निकाल चुकी है। इसके बाद से वह BJP से नजदीकी बढ़ा रही हैं, लेकिन उनके पति नवजोत सिद्धू ने अभी तक इस मामले पर कुछ नहीं कहा है। नवजोत कौर सिद्धू की 2 अहम बातें 1. नेताओं को भगवान कुर्सी देता, संतों के पास असली कुर्सी
नवजोत कौर ने कहा- मुझे यहां आकर ऐसा लग रहा है कि धरती पर कहीं स्वर्ग पर घूम रही हूं। गुरू जी से जुड़ी तो इतनी बड़ी सेवा से मुझे लगता है कि मैं राजनीति खत्म करके संतों की सेवा कर लूं, वही बहुत है। अगर यह राजनीतिक लोग दूर हो जाएं तो गुरू जी जैसे लोग ही धरती को संभालेंगे। आजकल जो राजनीतिक लोग हैं, वह अपनी पहचान को भूल चुके हैं। नवजोत ने आगे कहा- पहले वाले जो राजनीतिक लोग हैं, राजा-महाराजा अपने ऊपर ब्राह्मणों को बिठाते थे, जो उन्हें सत्य के मार्ग पर लेकर चलते थे लेकिन आजकल जो कुर्सी पर बैठ जाता है, वह यही मानता है कि मैं ही सब कुछ बन गया हूं। भगवान किसी को कुर्सी देता है काम करने के लिए। मगर, ये लोग उस पर बैठकर किस तरह का काम करते हैं। संतों को असली कुर्सी मिली हुई है, जो यह कहीं ना कहीं लगता है कि बाहर वाली जो दुनिया है उससे बचकर और हटकर भी दुनिया है, जो हमारे संतो की दुनिया है। 2. मैंने पूरी बॉडी दान की, दूसरे अंग में कैंसर नहीं
नवजोत कौर ने कहा- मैंने और पति नवजोत सिद्धू ने पूरी बॉडी दान कर रखी है। जब मुझे कैंसर हुआ तो मैंने भगवान को शुक्रिया कहा। सब मुझसे पूछ रहे थे कि ऐसा क्यों कर रही। मैंने उन्हें कहा कि मुझे ब्रेस्ट कैंसर हुआ है, मैंने पूरी बॉडी दान कर रखी है। ब्रेस्ट की जरूरत किसी को नहीं होती। यह भी शुक्र है कि मेरे किसी दूसरे अंग में कैंसर नहीं आया है। अब मेरी बॉडी के बाकी अंग किसी के काम आएंगे। मुझे इस बात की खुशी है। नवजोत कौर ने कहा कि हम टीवी नहीं देखते, सोशल मीडिया जरूर देखते हैं। मैं बचपन से 3 साल की उम्र से गुरुओं-साधुओं की वाणी सुनती रहती हूं। मुझे उनके साथ बैठना अच्छा लगता है। मैंने डॉक्टरी की चाहे पॉलिटिक्स, मैं संतों के साथ में रहती हूं। वाणी के साथ रहती हूं। जिस सतलोक आश्रम गईं नवजोत, उनके संत रामपाल के बारे में जानिए… सरकारी नौकरी थी, बाबा बन गए
बाबा रामपाल का जन्म हरियाणा के सोनीपत जिले के एक छोटे से गांव धनाना में हुआ था। पढ़ाई पूरी करने के बाद बाबा रामपाल को हरियाणा सरकार में सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर की नौकरी मिल गई। इंजीनियर की नौकरी के दौरान ही रामपाल की मुलाकात 107 साल के कबीरपंथी संत स्वामी रामदेवानंद महाराज से हुई। यहीं से रामपाल के बाबा बनने का सिलसिला शुरू हुआ। रामपाल सिंह जगतगुरु रामपाल बन गया और आश्रम में रहने लगा। नौकरी छोड़ दी और लोगों को प्रवचन देने लगा। 1980 से सफर शुरू, आश्रम बनाया
बाबा रामपाल के धार्मिक सफर की शुरुआत 1980 के दशक में हुई। उन्होंने अपने गुरु स्वामी रामदेवानंद जी से दीक्षा ली। रामपाल ने भी अपने गुरू की तरह कबीरपंथ की शिक्षाओं का प्रचार करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद, उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए सतलोक आश्रम की स्थापना की। उनके उपदेशों ने कई लोगों को आकर्षित किया, और उनके अनुयायियों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। एक बयान से बाबा पर विवाद हुआ
बाबा रामपाल का सफर केवल उपदेशों और अनुयायियों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके जीवन में कई विवाद भी आए। बाबा रामपाल के जीवन में विवादों की शुरुआत साल 2006 में हुई, जब स्वामी दयानंद की लिखी एक किताब पर उन्होंने एक टिप्पणी की। इसके बाद आर्यसमाज बाबा रामपाल के खिलाफ खड़ा हो गया। संघर्ष में हुई व्यक्ति की मौत, हुआ हत्या का मामला दर्ज
आर्यसमाज और बाबा के अनुयायियों के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। इस घटना के बाद, संत रामपाल पर हत्या का मामला दर्ज हुआ। पुलिस ने आश्रम को अपने कब्जे में लिया। रामपाल और उनके 24 समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया गया। 2008 में बाबा जेल से बाहर आ गया और 2009 में बाबा रामपाल को आश्रम वापस मिल गया। पुलिस और बाबा के समर्थकों के बीच हुई थी हिंसक झड़प
इसके बाद बाबा के खिलाफ आर्यसमाज के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। इसके बाद 12 मई 2013 को नाराज आर्य के लोगों और रामपाल के समर्थकों में एक बार फिर झड़प हुई। इस झड़प में तीन लोगों की मौत हो गई। करीब 100 लोग घायल हो गए। 2014 में, रामपाल के खिलाफ अदालत में पेश न होने के कारण अवमानना के आरोप में गिरफ्तारी का आदेश दिया गया। बाबा रामपाल पर कई आरोप लगे
इसके बाद पुलिस ने सतलोक आश्रम पर धावा बोला, जहां उनके अनुयायियों ने उनकी गिरफ्तारी को रोकने के लिए विरोध किया। इस घेराबंदी में कई लोग घायल हुए और एक सप्ताह तक चले इस घेराबंदी में 6 लोगों की मौत हो गई। इसके बाद, रामपाल को गिरफ्तार कर चंडीगढ़ ले जाया गया जहां उनका मुकदमा चलाया गया। बाबा रामपाल पर कई आरोप लगे, जिनमें हत्या, अवैध हथियार रखना, और दंगा करना शामिल थे। संत रामपाल 2014 से जेल में बंद
रामपाल की गिरफ्तारी के बाद, उन्हें अदालत में पेश किया गया और कई सालों तक कानूनी लड़ाई चलती रही। 2018 में, हिसार की अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई। वर्तमान में, बाबा रामपाल जेल में हैं, लेकिन उनके अनुयायियों की संख्या अब भी काफी है, जो उनकी शिक्षाओं का पालन करते हैं और उन्हें निर्दोष मानते हैं। उनके अनुयायी अब भी उनकी शिक्षाओं में विश्वास करते हैं और उन्हें आदर देते हैं।

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