यूपी के कद्दावर मुस्लिम नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा में शामिल होंगे। 24 जनवरी को उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दिया था। आज शुक्रवार शाम तक वह इसका ऑफिशियल ऐलान करेंगे। सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश से कई राउंड में उनकी बात हो चुकी है। सपा में उन्हें पश्चिम यूपी में पार्टी में अहम पद दिया जाएगा। 15 से 20 फरवरी तक लखनऊ में अखिलेश ही नसीमुद्दीन को पार्टी जॉइन कराएंगे। इस्तीफे के बाद से ही नसीमुद्दीन के अगले कदम पर सबकी निगाहें टिकी हुई थीं। दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में भी उन्होंने कहा था- वे फिरकापरस्तों को हराने वाली पार्टी में शामिल होंगे या नई पार्टी बनाएंगे। बसपा से राजनीति की शुरुआत करने वाले सिद्दीकी मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। पश्चिम यूपी के मुस्लिम वोट बैंक में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। नसीमुद्दीन के साथ 73 और कांग्रेस नेताओं ने भी कांग्रेस पार्टी छोड़ी थी। इसमें कई पूर्व विधायक भी शामिल थे। नसीमुद्दीन बोले- कांग्रेस में जातिवाद की लड़ाई लड़ने आया था नसीमुद्दीन सिद्दीकी पश्चिमी उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रांतीय अध्यक्ष भी थे। सहारनपुर, मुजफ्फरनगर के आसपास के जिलों में मुस्लिम वोट बैंक पर उनकी बड़ी पकड़ मानी जाती है। सिद्दीकी ने इस्तीफे में लिखा था- ‘मैं कांग्रेस में जातिवाद की लड़ाई लड़ने आया था। 8 साल से जमीन पर काम नहीं कर पाया। मुझमें जंग लग रही थी। मैं राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी का सम्मान करता हूं, और आगे भी करता रहूंगा। लेकिन पार्टी में मेरे लिए कोई काम नहीं था। मैं कांग्रेस में इसलिए शामिल हुआ था कि संप्रदायवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ सकूं। लेकिन अब ऐसा नहीं हो पा रहा था।’ लोकसभा चुनाव में नहीं मिली थी तवज्जो कांग्रेस में नसीमुद्दीन की भूमिका और प्रभाव को लेकर असंतोष चल रहा था। 2024 लोकसभा चुनाव में भी उन्हें तवज्जो नहीं मिली थी। 2027 विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ नसीमुद्दीन कांग्रेस में खुद के भविष्य को लेकर परेशान थे। कांग्रेस में सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद का कद जिस तेजी से बढ़ा है। उनकी गिनती प्रियंका के खास सिपहसालारों में होती है। इससे भी सिद्दीकी खासा परेशान थे। बीते दिनों अमौसी एयरपोर्ट पर राहुल गांधी को रिसीव करने के दौरान प्रमोद तिवारी व आराधना मिश्रा सहित अन्य नेताओं के आगे उन्हें एंट्री नहीं मिली थी। मायावती ने बसपा से बाहर किया था नसीमुद्दीन का इस्तीफा 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए बड़ा नुकसान माना जा रहा है। सिद्दीकी पहले बसपा में थे, जहां से मायावती ने उन्हें 2017 में पार्टी से निकाल दिया था। उसके बाद 2018 में वे कांग्रेस में शामिल हुए थे और पार्टी ने उन्हें मुस्लिम चेहरे के तौर पर प्रमोट किया था। सूत्रों के मुताबिक, इस्तीफे के बाद कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय उन्हें मनाने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन फिलहाल सिद्दीकी ने अपना निर्णय बदलने से साफ मना कर दिया है। अब सभी की नजरें सिद्दीकी के अगले कदम पर टिकी थी। कयास लग रहे थे कि क्या वे किसी नई पार्टी में जाएंगे या निर्दलीय राजनीति करेंगे? एक चर्चा यह भी थी कि वह चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी में शामिल हो सकते हैं, लेकिन सिद्दीकी ने सारे कयासों पर विराम लगाते हुए सपा में शामिल होने का निर्णय लिया है। दैनिक भास्कर से बातचीत में भी नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा था- मेरे साथ दिल्ली, उत्तराखंड, गाजियाबाद सहित पश्चिमी यूपी के 73 नेताओं ने पार्टी छोड़ी हैं। इसमें पूर्व विधायक से लेकर अन्य वरिष्ठ लोग शामिल हैं। हम सभी से चर्रचा के बाद कोई निर्णय लेंगे। रेलवे ठेकेदार से शुरू हुआ था करियर उत्तर प्रदेश की सियासत में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का नाम लंबे समय से चर्चित रहा है। एक रेलवे ठेकेदार से शुरू हुआ उनका सफर बसपा में मायावती के सबसे करीबी सहयोगी बनकर चरम पर पहुंचा था। इसके बाद बसपा से निष्कासन हुआ तो नई पार्टी बना ली। कुछ ही दिनों बाद पत्नी-बेटे के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए। अब विधानसभा चुनाव से एक साल पहले उन्होंने कांग्रेस को भी अलविदा कह दिया। नसीमुद्दीन सिद्दीकी का जन्म 4 जून 1959 को हुआ। परिवार में कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। मां की बीमारी के चलते सेना की नौकरी छोड़ने के बाद वे रेलवे के ठेकेदारी में सक्रिय हुई। 1990 के आसपास नसीमुद्दीन बसपा संस्थापक कांशीराम के संपर्क में आए। शुरुआत पालिका (नगर पालिका) चुनाव से हुई। 1991 में उन्होंने बसपा से बांदा सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद पश्चिम में सक्रिय रहे। ——————- ये खबर भी पढ़ें- भास्कर इंटरव्यू ‘कांशीराम साहब का मर्ज…1991 की वो रात नहीं भूलती’:नसीमुद्दीन बोले- भाजपा को हराने के लिए उसकी काट खोजनी होगी ‘1991 की बात है। मैं कांशीराम साहब के साथ फतेहपुर के पुराने पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस में रुका था। एक बड़े कमरे में वह सोए, बगल के छोटे कमरे में मैं था। रात करीब 2 बजे नींद टूटी, तो उन्हें कमरे में टहलते और खांसते देखा। तबीयत के बारे में पूछा तो बोले- नींद नहीं आती। दवा की बात की तो कहा- दवा नहीं मिलेगी। फिर बोले- बैठ जा, पहले मर्ज तो समझ ले। हर रात मेरी 2 बजे आंख खुल जाती है। सारी रात इसी सोच में गुजर जाती है कि बाबा साहब अंबेडकर शोषित समाज को हुक्मरान नहीं बना पाए। क्या मैं अपनी जिंदगी में यह कर पाऊंगा या ऐसे ही चला जाऊंगा? यही मेरा मर्ज है। जाओ दवा ला सको तो लाओ। मैं भावुक हो गया। कहा, मेरी उम्र आपको लग जाए।’ पढ़ें पूरी खबर..