दो दशकों से बिहार की कमान संभालने वाले नीतीश कुमार अब दिल्ली जा रहे हैं। और ठीक इसी वक्त, उनके इकलौते बेटे निशांत कुमार, जिन्होंने अब तक राजनीति से पूरी दूरी बनाए रखी। BIT मेसरा से इंजीनियरिंग की डिग्री ली और लो-प्रोफाइल जीवन जिया। 8 मार्च को जनता दल यूनाइटेड (JDU) में औपचारिक रूप से शामिल होकर सक्रिय राजनीति में कदम रखा। यह महज एक सदस्यता नहीं, बल्कि पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है। ऐसे समय में जब JDU कार्यकर्ताओं में नीतीश के दिल्ली जाने से असंतोष है। पार्टी बिखरने का डर है। निशांत के लिए यह सफर आसान नहीं है। आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में निशांत के सामने 4 बड़ी चुनौतियां…। 1. JDU को एकजुट और मजबूत रखना नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और मुख्यमंत्री पद छोड़ने के फैसले से JDU कार्यकर्ताओं में असंतोष और नाराजगी है। कई विधायक-नेता इसे ‘नेतृत्व शून्यता’ का खतरा मान रहे हैं, क्योंकि पार्टी लंबे समय से नीतीश के व्यक्तिगत करिश्मे और निर्णयों पर निर्भर रही है। 2. नीतीश के वोटबैंक को बचाए रखना नीतीश कुमार का मुख्य वोटबैंक कुर्मी (उनकी जाति), महादलित, EBC और कुछ मुस्लिम-दलित समूहों में है, जो ‘सुशासन’ और विकास की छवि पर टिका है। इसके बदौलत नीतीश कुमार बीते 21 सालों से बिहार की राजनीति की तीसरी धुरी बने हुए हैं। वह जिधर जाते हैं, सरकार बनती है। 3. भाजपा से तालमेल बनाकर रखना नीतीश के दिल्ली जाने के बाद बिहार में BJP का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय है, और JDU को डिप्टी CM या अन्य पदों पर संतोष करना पड़ सकता है। निशांत को BJP के साथ पावर-शेयरिंग में संतुलन बनाना होगा, ताकि JDU की स्वतंत्र पहचान बनी रहे। अगर BJP ज्यादा दबाव बनाए तो गठबंधन टूटने का खतरा है, जैसा पहले कई बार हुआ। 4. परिवारवाद की छवि से खुद को बाहर निकालना नीतीश कुमार ने हमेशा वंशवाद का विरोध किया है (लालू-राबड़ी, तेजस्वी पर हमले) और खुद को ‘परिवार पहले नहीं, बिहार पहले’ वाला नेता बताया है। निशांत की एंट्री से JDU पर वंशवाद का ठप्पा लग रहा है, जो नीतीश की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। कई रिपोर्ट्स में इसे ‘राजनीतिक जरुरत’ बताया गया है, लेकिन विरोधी दल RJD-कांग्रेस इसे मुद्दा बनाएंगे।