पंचकूला नगर निगम फ्रॉड केस में महिला आरोपी स्वाति तोमर ने सोमवार को एसीबी मुख्यालय पहुंचकर सरेंडर किया। सरेंडर के दौरान उनके वकील नीरज साथ रहे। स्वाति तोमर के बैंक अकाउंट में करीब 30 करोड़ रुपए ट्रांसफर हुए थे। हालांकि, अभी तक एसीबी की ओर से स्वाति तोमर को लेकर कोई ऑफिशियल बयान जारी नहीं किया गया है। महिला आरोपी स्वाति तोमर के वकील के अनुसार, उसे बताया गया कि किसी प्रोजेक्ट में उसे सब कान्ट्रेक्टर बनाया जा रहा है। यह कहकर उससे कुछ दस्तावेज साइन करवाए गए थे। उसके बाद उससे बैंक अकाउंट के चैक साइन करवाए गए। जब रकम खाते में आई तो उसके कुछ समय में ही ट्रांसफर भी हो गई। जिसकी जानकारी स्वाति तोमर को नहीं है। सरेंडर करने पहुंची स्वाति तोमर पहले टीचर रही हैं। पंचकूला नगर निगम फ्रॉड केस में यह पांचवीं गिरफ्तारी है। इससे पहले पंचकूला नगर निगम के पूर्व अकाउंट अफसर विकास कौशिक को गिरफ्तार किया गया था। वहीं इस मामले में प्राइवेट व्यक्ति रजत व बैंक रिलेशनशिप मैनेजर दिलीप राघव को भी गिरफ्तार किया जा चुका है। अब जानिए कैसे हुआ खुलासा… फ्रॉड केस आए तो वापस मांगा पैसा : हरियाणा के सरकारी विभागों के साथ हुए फ्रॉड का खुलासा हुआ, तो अधिकारियों ने कोटक महिंद्रा बैंक को पत्र लिखकर अपनी एफडी को मैच्योर होने पर वापस दिए जाने की बात कही। जिस पर बैंक ने रिप्लाई देते हुए कहा कि इन नंबर के तहत तो आपकी कोई एफडी बैंक के पास नहीं है। डिटेल मिली तो जांचे डॉक्यूमेंट : कोटक महिंद्रा बैंक का रिप्लाई मिला, तो नगर निगम कार्यालय में हड़कंप मच गया। नगर निगम द्वारा एक जांच टीम का गठन हुआ। जिसमें अकाउंट अफसर, कमिश्नर और ज्वाइंट कमिश्नर शामिल रहे। जांच टीम ने रिपोर्ट तैयार कर सरकार और बैंक को फिर से भेजा। हर बार भेजे रिन्यूअल के डॉक्यूमेंट : बैंक कर्मियों ने फ्रॉड करते समय शातिर दिमाग का प्रयोग किया है। बैंक के रिन्युअल डॉक्यूमेंट हर बार नगर निगम को भेजे गए, जिससे अधिकारियों के ध्यान में ही मामला न आए। अधिकारी बिना अकाउंट चेक करवाए ही निश्चिंत रहे। कैसे दिया घोटाले को अंजाम : बैंक में नगर निगम के द्वारा 2 खाते खुलवाए गए थे। इसके अलावा 2 अलग खाते उन्हीं डॉक्यूमेंट पर अलग से खोल दिए गए। उन खातों से बाद में अलग-अलग खातों में रकम ट्रांसफर कर दी गई। बताया जा रहा है कि बैंक से जुड़ी एक महिला के खाते में भी बड़ी अमाउंट ट्रांसफर हुई है। निगम अधिकारियों की लापरवाही का नतीजा : बैंक में एफडी की रकम हर बार रिन्यूअल हो रही थी, लेकिन कभी अधिकारियों ने उसकी जांच करना जरूरी नहीं समझा। अब भी जब रकम वापस लेने के लिए पत्र लिखा गया तो बैंक का कोई कर्मचारी पर्दा डालने की नीयत से निगम पहुंचा था। जिसने ऑफर दिया कि ज्यादा इंटरस्ट रेट के साथ फिर से एफडी करवा दी जाए, लेकिन इस बार नगर निगम के अधिकारी झांसे में नहीं आए। जिससे पूरे मामले का खुलासा हो गया।