पंजाब रोडवेज के कर्मचारी पिछले दो दिनों से हड़ताल पर हैं। 27 डिपो की करीब 10 हजार बसें बंद पड़ी हैं। किलोमीटर स्कीम वाला टेंडर दो बार पोस्टपोन हो चुका है, लेकिन कर्मचारी इसे पूरी तरह रद्द कराने पर अड़े हुए हैं। आखिर इस टेंडर का विरोध क्यों हो रहा है? कर्मचारियों को इसमें क्या ऐतराज हैं? इन सवालों के जवाब जानने के लिए भास्कर डिजिटल टीम ने कर्मचारी यूनियन नेताओं से बात की, जिसके बाद कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। जालंधर के पंजाब रोडवेज डिपो-1 के कच्चे मुलाजिमों के प्रधान विक्रमजीत सिंह का कहना है कि सरकार बहुत महंगा टेंडर ला रही है। किलोमीटर स्कीम के तहत बस का ड्राइवर मालिक का होगा, जिससे सरकार के ड्राइवरों की पोस्ट धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। टेंडर 26 से 30 रुपए प्रति किलोमीटर की दर पर हो रहा है और तेल का खर्च भी सरकार ही उठाएगी। यहां तक कि किसी वजह से चाहे हड़ताल हो या अन्य कारण अगर किलोमीटर स्कीम की बस नहीं चलती, तब भी सरकार या रोडवेज विभाग को रोजाना 250 किलोमीटर का भुगतान करना पड़ेगा। यूनियन को इन 5 पॉइंट पर एतराज 2017 में कांग्रेस सरकार ने किलोमीटर स्कीम हटाई
विक्रमजीत सिंह ने कहा कि किलोमीटर स्कीम घाटे का सौदा थी। इसे अकाली सरकार लेकर आई थी, लेकिन यह कभी सफल नहीं हो पाई। अकाली सरकार के समय टेंडर का रेट लगभग 22 रुपये प्रति किलोमीटर था। इसके बाद कांग्रेस सरकार ने विभाग की 1,000 बसें सड़क पर उतारीं, जो आज भी चल रही हैं। लगभग 9 साल के अंतराल के बाद अब ‘आप’ सरकार फिर से किलोमीटर स्कीम के तहत बसें डालने जा रही है, जबकि यह स्कीम पहले ही फ्लॉप साबित हो चुकी है। मंत्रियों-विधायकों के रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने का आरोप
रोडवेज कच्चे मुलाज़िम यूनियन के प्रधान विक्रमजीत सिंह और वाइस प्रधान चानण सिंह ने आरोप लगाया कि किलोमीटर स्कीम का टेंडर रद्द करने के लिए सीएम मान तैयार हो गए थे, लेकिन अफसर किसी भी कीमत पर इस टेंडर को लागू करना चाहते हैं। उनका आरोप है कि बसें अफसरों या फिर मंत्रियों-विधायकों के रिश्तेदारों और चेहतों के नाम पर डाली जाएंगी। ये लोग 5 साल में अपनी बसों का पूरा पैसा निकालकर बाहर हो जाएंगे। इसके बाद नाम बदलकर यही बसें प्राइवेट तौर पर चलनी शुरू हो जाएंगी या फिर किसी प्राइवेट ट्रांसपोर्ट कंपनी को बेच दी जाएंगी। रोडवेज में मैकेनिक की नौकरी पर भी खतरा
किलोमीटर स्कीम के तहत अगर प्राइवेट बसें डाली जाती हैं तो इससे मैकेनिकों की नौकरी पर भी खतरा मंडरा जाएगा। फिलहाल जालंधर के पंजाब रोडवेज डिपो में कई मैकेनिकों को रोजगार मिला हुआ है, क्योंकि सरकारी बसें 15 साल या इससे ज्यादा समय तक चलती हैं और उन्हें लगातार मेंटेनेंस की जरूरत पड़ती है। लेकिन अगर सरकारी बसों को हटाकर हर 5 साल के टेंडर पर नई प्राइवेट बसें चलाई जाएंगी तो ऐसी नई बसों को मेंटेनेंस की बहुत कम जरूरत होगी। इससे धीरे-धीरे मैकेनिकों की नौकरी खत्म होने का खतरा बढ़ जाएगा।