पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने मोहाली, मोगा और पठानकोट में सेशन जजों को सरकारी मकान न मिलने पर पंजाब सरकार से जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने कहा कि जब डीसी और एसएसपी को सरकारी मकान मिलते हैं, तो सेशन जजों को किराए के घरों में क्यों रहना पड़ रहा है। खंडपीठ ने पंजाब के चीफ सेक्रेटरी को निर्देश दिया है कि वे इस मुद्दे पर विस्तार से हलफनामा दाखिल कर बताएं कि सेशन जजों के लिए सरकारी आवास उपलब्ध कराने में देरी क्यों हो रही है। मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल को होगी, जिसमें सरकार से स्पष्ट और ठोस जवाब देने को कहा गया है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर जजों के लिए सरकारी मकान नहीं हैं, तो इन जिलों में डीसी और एसएसपी के सरकारी आवास खाली कराकर सेशन जजों को दिए जा सकते हैं। हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि इसमें दिक्कत क्या है। एक दशक बाद भी जजों के लिए आवास नहीं सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मोहाली, मोगा और पठानकोट जिलों का गठन एक दशक से भी पहले हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद यहां तैनात सेशन जजों के लिए आज तक सरकारी आवास की व्यवस्था नहीं की गई। अदालत ने इसे न्यायिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को गरिमापूर्ण कार्य वातावरण और आवासीय सुविधाएं मिलना जरूरी है। जब प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को सरकारी आवास उपलब्ध हैं और उन्हें किराये के मकानों में नहीं रहना पड़ता, तो सेशन जजों को किराये के घरों में रहने के लिए मजबूर करना न्यायपालिका की गरिमा के अनुरूप नहीं है। पूरे पंजाब से जुड़ा व्यापक मुद्दा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल इन तीन जिलों तक सीमित नहीं है। पंजाब के कई जिलों में न्यायिक अधिकारियों के लिए पर्याप्त आवास और अदालतों के लिए जरूरी कमरों की कमी का मुद्दा भी अदालत के सामने है। हाईकोर्ट इस बात की समीक्षा कर रहा है कि राज्य सरकार न्यायिक ढांचे को मजबूत करने के लिए पर्याप्त कदम उठा रही है या नहीं। हाईकोर्ट इससे पहले मलेरकोटला जिले में भी इसी तरह के मामले में सख्त रुख अपना चुका है। वहां अदालत ने डीसी और एसएसपी के सरकारी आवास खाली कराने के आदेश दिए थे ताकि न्यायिक अधिकारियों को रहने की सुविधा उपलब्ध कराई जा सके।