पानीपत के खुखराना वासियों की थर्मल की राख से मुक्ति:3 महीने में मिलेगा नए आशियाने का कब्जा: विस्थापन के लिए 445 लाभार्थियों को आवंटित हुए प्लॉट

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में चल रहे ‘सुनील कश्यप बनाम हरियाणा सरकार’ मामले में जिला प्रशासन ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर दी है। पानीपत थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली राख से होने वाले स्वास्थ्य खतरों को देखते हुए खुखराना गांव को शिफ्ट करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। प्रशासन ने बताया कि गांव को शिफ्ट करने के लिए सब-तहसील मतलौडा के गाँव सोंधापुर के पास 39.5 एकड़ भूमि का अधिग्रहण पूरा कर लिया गया है। संबंधित किसानों को मुआवजे का भुगतान भी किया जा चुका है। बुनियादी सुविधाओं का काम पूरा पुनर्वास स्थल पर बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर विभाग ने विस्तृत जानकारी दी है। बिजली व्यवस्था: उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (UHBVN) ने नए गांव में बिजली का बुनियादी ढांचा तैयार कर दिया है। उपभोक्ता अब ऑनलाइन आवेदन कर बिजली कनेक्शन ले सकते हैं। विकास कार्य: पंचायती राज विभाग के अनुसार, सीसी सड़कें, ड्रेन, कम्युनिटी सेंटर, पार्क-सह-व्यायामशाला, और श्मशान घाट के शेड व बाउंड्री वॉल का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। चौपालों का निर्माण: गांव के विभिन्न समुदायों के लिए जनरल चौपाल, बाल्मीकि चौपाल, हरिजन चौपाल और कश्यप चौपाल का निर्माण भी पूर्ण है। आंगनवाड़ी: पुनर्वास स्थल पर 3 आंगनवाड़ी केंद्रों का निर्माण कार्य भी पूरा कर लिया गया है। 445 लाभार्थियों को प्लॉट आवंटन खंड विकास एवं पंचायत अधिकारी (BDPO) की रिपोर्ट के अनुसार, ड्रा प्रक्रिया के माध्यम से अब तक 445 लाभार्थियों को उनके आकार के अनुसार प्लॉट आवंटित किए जा चुके हैं। लाभार्थियों को प्लॉट के आवंटन पत्र और भौतिक कब्जा देने की प्रक्रिया आगामी तीन महीनों में पूरी होने की संभावना है। स्वास्थ्य केंद्र का काम लंबित रिपोर्ट के मुताबिक, सब-हेल्थ सेंटर का निर्माण अभी लंबित है। इसके प्रशासनिक अनुमोदन के लिए एस्टीमेट सिविल सर्जन, पानीपत को भेज दिया गया है। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि विस्थापन की पूरी प्रक्रिया पर जिला राजस्व अधिकारी और जिला नगर योजनाकार लगातार निगरानी रख रहे हैं। 1985-1987 में समस्या बढ़ी थी 1979 में शुरू हुए पानीपत थर्मल पावर प्लांट का बड़ा हिस्सा खुखराना गांव की जमीन पर ही बनाया गया था। शुरुआत में प्लांट में से निकलने वाली कोयले की राख ने ज्यादा परेशान नहीं किया। मगर जैसे ही नवंबर 1985 में प्लांट की स्टेज तीन और 1987 में स्टेज चार चालू हुई तो रोजाना निकलने वाली हजारों टन कोयले की राख ने गांव वालों जीना दुश्वार कर दिया। गांव के सामने असंध रोड पर राख के पहाड़ खड़े होना शुरू हो गए। पूरब से हवा चलती तो ऊंचे-ऊंचे राख के पहाड़ों से राख उड़कर पूरे गांव को ढंक लेती और पश्चिम से हवा चलती तो प्लांट में स्टोर टनों कोयले का काला चूरा गांव में घुस जाता। परेशान गांव वालों ने आखिरकार विरोध शुरू किया और अब विरोध का परिणाम मिलने के आसार बन गए हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *