सवाल- मैं यूपी की रहने वाली हूं। मेरी 15 साल की बेटी क्लास 9 में पढ़ती है। वह अपने दोस्तों की तरह सोशल मीडिया यूज करना चाहती है। उसका कहना है कि “मेरे सभी दोस्तों के सोशल मीडिया अकाउंट्स हैं, मुझे भी अपना अकाउंट बनाना है।” वह मोबाइल फोन चलाती है, लेकिन मैंने अभी तक उसे सोशल मीडिया से दूर रखा है, क्योंकि मैं साइबर बुलिंग और प्राइवेसी के रिस्क से डरती हूं। बेटी को लगता है कि मैं पुराने ख्यालों की हूं। क्या टीनएज बच्चे को सोशल मीडिया यूज करने देना चाहिए। क्या गाइडलाइंस होनी चाहिए ताकि वह रिस्पॉन्सिबल रहे? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- मैं आपकी चिंता समझ सकती हूं। आज के समय में बहुत सारे पेरेंट्स इस स्थिति का सामना करते हैं। लेकिन टीनएज वह दहलीज है, जहां बच्चे ‘फोमो’ यानी पीछे छूट जाने का डर महसूस करते हैं। आमतौर पर ऐसा होता है कि जब दोस्त किसी रील या ट्रेंड पर चर्चा करते हैं तो सभी बच्चे उसमें शामिल होना चाहते हैं। ऐसे में जिस बच्चे को इस बारे में कुछ पता नहीं होता, वह अलग-थलग महसूस करता है। आपका डर जायज है, लेकिन सोशल मीडिया पर पूरी तरह पाबंदी लगाना ठीक नहीं है। इससे बच्चों की जिज्ञासा बढ़ जाती है और वे इसे चोरी-छिपे इस्तेमाल करने लगते हैं। इसलिए ‘पाबंदी’ लगाने की बजाय आपको उसे सोशल मीडिया के सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में बताना चाहिए। साथ ही इसके खतरों के बारे में भी। लेकिन इससे पहले ये समझिए कि टीनएज में बच्चे सोशल मीडिया के प्रति क्यों आकर्षित होते हैं। टीनएज में सोशल मीडिया के प्रति झुकाव टीनएज में ‘सोशल वैलिडेशन’ बहुत मायने रखता है। वहीं सोशल मीडिया टीनएजर्स को एक ऐसा मंच देता है, जहां वे अपनी पहचान बना सकते हैं और अपनी पसंद की चीजों को दुनिया के साथ साझा कर सकते हैं। यह उनके लिए केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक वर्चुअल दुनिया है, जहां वे अपने अस्तित्व को तलाशते हैं। साथ ही यहां मिलने वाला इंस्टेंट रिएक्शन (लाइक्स, कमेंट्स और व्यूज) उन्हें यह एहसास कराता है कि लोग उन्हें देख रहे हैं और ये मायने रखता है। टीनएजर्स के सोशल मीडिया के प्रति अट्रैक्शन के कई कारण हो सकते हैं। टीनएज में सोशल मीडिया यूज के रिस्क यहां ये समझना भी जरूरी है कि सोशल मीडिया सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि मेंटल और इमोशनल हेल्थ से भी जुड़ा हुआ है। 13-15 साल की उम्र में बच्चों का ब्रेन पूरी तरह विकसित नहीं होता है। उनमें ‘इम्पल्स कंट्रोल’ (खुद पर नियंत्रण) की कमी होती है। वे अक्सर बिना सोचे-समझे फोटो या जानकारी साझा कर देते हैं, जो उनके लिए मुसीबत की वजह बन सकती है। इसके अलावा लाइक्स और कमेंट्स उनके आत्मविश्वास को प्रभावित करते हैं। ऐसे में टीनएज में सोशल मीडिया यूज करने के कई खतरे भी हो सकते हैं। बेटी को सोशल मीडिया के खतरों के बारे में बताएं आप अपनी बच्ची को छोटे-छोटे उदाहरणों के जरिए सोशल मीडिया के रिस्क समझाएं। उसे बता सकती हैं कि सोशल मीडिया से जुड़े रिस्क के कारण ही हाल में ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इसके इस्तेमाल पर बैन लगाया गया। स्टडीज के हवाले से यह भी समझाएं कि सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों में कई हेल्थ रिस्क पैदा करता है। इसके कारण एंग्जाइटी, आत्मविश्वास में कमी, नींद न पूरी होना, फोकस में कमी और डिप्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। सोशल मीडिया के लिए जरूरी सेफ्टी टिप्स अब आते हैं कि बेटी को सोशल मीडिया के सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में कैसे बताएं। यहां पेरेंट्स का रोल पुलिसिंग का नहीं, बल्कि गाइड का होना चाहिए। बच्ची को डराने के बजाय उसे संभावित खतरों के प्रति सचेत करना जरूरी है। उसे बताएं कि इंटरनेट पर जो एक बार चला गया, वह हमेशा के लिए वहां रह जाता है। इसके लिए बच्ची को सोशल मीडिया यूज के कुछ बेसिक सेफ्टी टिप्स जरूर बताएं। पेरेंट्स न करें ये गलतियां बच्चों को सोशल मीडिया से बचाने की कोशिश में कई बार पेरेंट्स अनजाने में कुछ गलतियां कर बैठते हैं। डराने और पाबंदी लगाने की बजाय बच्चों पर बातचीत का असर ज्यादा होता है। इससे उनमें बेहतर समझ पैदा होती है और पेरेंट्स के प्रति भरोसा बढ़ता है। बातचीत के अलावा कुछ और बाताें का भी खास ख्याल रखें। जैसेकि– अंत में मैं यही कहूंगी कि टीनएज में सोशल मीडिया का इस्तेमाल पूरी तरह सही या पूरी तरह गलत नहीं होता। फर्क इस बात से पड़ता है कि उसे कितनी समझ, कितने समय और कितनी निगरानी के साथ इस्तेमाल किया जा रहा है। पेरेंट्स का काम रोकना नहीं, बल्कि बच्चों को सुरक्षित और जिम्मेदार यूजर बनाना है। इसके अलावा जब पेरेंट्स खुद संतुलित और समझदार रोल मॉडल बनते हैं, तभी बच्चे भी सोशल मीडिया को जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना सीखते हैं। ……………….. पेरेंटिंग से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- मम्मी-पापा एथलीट, लेकिन बेटे को स्पोर्ट्स में इंटरेस्ट नहीं:क्या करूं कि वो खेलों में रुचि ले, क्या फोर्स करना सही है अक्सर माता-पिता अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए उन पर अपनी उम्मीदें थोप देते हैं। इसे साइकोलॉजी में ‘प्रोजेक्शन’ कहते हैं, इसका मतलब है कि पेरेंट्स अपने सपनों को बच्चों के जरिए जीना चाहते हैं। पूरी खबर पढ़िए…