लालू प्रसाद अपने सामाजिक न्याय की लड़ाई और बिंदासपना के लिए जाने जाते हैं। लालू प्रसाद पारंपरिक पर्वों को उसके पूरे देसीपन के साथ जीते रहे हैं। यही वजह है कि उनके अंदर त्योहारों का उल्लास, उमंग और खुलापन हिलोरें मारती हैं। अगर होली खेलते लालू प्रसाद का चेहरा आपके सामने आ जाए तो खुद-ब-खुद गुदगुदी होने लगती है। आप फगुआने लगते हैं। आपने लौंडा नाच देखा है तो वह याद आने लगता है। लालू ने होली के हुड़दंग को भी जिया और छठ के अनुशासन सहित लोकआस्था को भी। अब न तो लालू प्रसाद होली कुर्ता-फाड़ अंदाज में मनाते हैं और न राबड़ी देवी छठ मनाती हैं। लालू प्रसाद यादव का किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है। इस वजह से उन्हें रंग-अबीर से बच कर रहने की हिदायत दी गई है। भले ही वे अब पहले की तरह होली नहीं खेलते, लेकिन हर बार इस त्योहार में उनके कुर्ताफाड़ होली की याद जरूर ताजा हो जाती है। फुलवरिया जैसे गांव की परंपरा पटना में लाने वाले लालू होली के दिन लालू प्रसाद का मूड खुद-ब-खुद बन जाता था। लालू यादव, गोपालगंज के फुलवरिया से राजधानी पटना आकर जरूर बस गए, लेकिन अपने साथ लाए गंवारपन को कभी नहीं छोड़ा। यही गंवारपन लालू प्रसाद को बाकी नेताओं से अलग बनाता है। लालू प्रसाद की जीवनी ‘गोपालगंज टू रायसीना’ के लेखक नलिन वर्मा कहते हैं, लालू खुलेआम कुर्ताफाड़ होली मनाते थे। उनको चैता, कजरी, बिरह जैसे लोकगीत पसंद हैं। वे पटना आए तो अपने साथ जोगिरा वाली संस्कृति साथ लेकर आए।’ नलिन वर्मा बताते हैं, ‘तब गांव में न तो मोबाइल था, न डीजे। हर गांव में होलिया गाने वालों की मंडली होती थी। गांव का तालाब, कुंआ, नाला, कादो-कीचड़, टमाटर होली मनाने में काम आता था। जब तक युवा मंडली अपने मित्रों को नाला में नहीं घसीटे, तब तक होली पूरी नहीं होती थी।’ पहले महंगी शराब तो होता नहीं था। गांव में जो भांग के पत्ते मिल जाते थे, उसको पीसकर भांग तैयार किया जाता था। इसे ही खाकर या पीकर लोग झूमते-गाते थे। गांव से शहर आए, लेकिन गंवारपन को जीवंत रखा होली के इस रंग को जीकर लालू पटना आए थे, जिसे उन्होंने पटना में भी जीवंत रखा। होली के दिन वे खुद गले में ढोल टांगकर फगुवा गाने लगते थे। जोगिरा गाना उन्हें अच्छा भी लगता था। हालांकि, अब लालू प्रसाद बीमार हैं। उनके बच्चों ने उस कल्चर को नहीं जीया हैं, जिसे लालू प्रसाद जीवंत बनाए रखे थे। इसलिए अब राबड़ी आवास पर होली का वह उत्सव नहीं दिखता, जो लालू के समय पर देखने को मिलता था। परंपरा को दिल से निभाते रहे लालू प्रसाद लालू प्रसाद के साथ कुर्ताफाड़ होली खेलने वाले राजद के पुराने नेता सतीश गुप्ता से भास्कर ने बात की। वे कहते हैं कि लालू प्रसाद का लोक संस्कृति से काफी जुड़ाव रहा है। वे परंपरा को दिल से निभाते रहे हैं। यही वजह है कि लालू प्रसाद की होली की चर्चा देश की मीडिया में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी होती थी। अब तो किडनी ट्रांसप्लांट की वजह से वे होली नहीं खेल सकते, लेकिन हम उनकी कुर्ताफाड़ होली को याद करते हैं। होली के दिन मुख्यमंत्री आवास का दरवाजा हर किसी के लिए खुला रहता था। क्या आम और क्या खास, हर कोई लालू प्रसाद के साथ होली खेल सकता था। वीआईपी कल्चर उनके साथ नहीं था। सतीश गुप्ता कहते हैं, ‘मेरा सौभाग्य रहा कि एक बार नहीं, बल्कि कई बार उनके साथ कुर्ताफाड़ होली खेली। होली में उनका कुर्ता हम सबों ने फाड़ा और उन्होंने भी हमें नहीं बख्शा।’ भिखारी ठाकुर के गीत और लौंडा नाच सतीश गुप्ता बताते हैं कि राबड़ी आवास में होली की शुरुआत लालू प्रसाद का कुर्ता फाड़ने से होती थी, उसके बाद तो लालू प्रसाद भी सभी का कुर्ता फाड़ने में लग जाते थे। विधायक से लेकर साधारण कार्यकर्ता और झुग्गी-झोपड़ी के लोग सभी होली खेलने आ जाते थे। वे लोक संस्कृति को जमीन पर उतारते थे। उनके लिए होली आर्टिफिशियल नहीं होता था। लालू प्रसाद की होली में भिखारी ठाकुर के गीत बजते थे। कलाकारों का भी जुटान होता था। गांव के वाद्ययंत्र और गांव के लोकगीतों के साथ होली खेली जाती थी। गांव की गायन मंडली द्वारा फाग गाए जाते थे। इस मौके पर लौंडा नाच भी होता था। वो भी ठेठ पारंपरिक अंदाज में। दोपहर ढाई-तीन बजे से कुर्ता फाड़ा-फाड़ी शुरू लालू प्रसाद का कार्टून बनाकर चर्चा में रहने वाले कार्टूनिस्ट पवन से हमने बात की। पवन ने लालू प्रसाद के कान से खूब बाल निकाला, गाल जितना फूला हुआ है, उससे ज्यादा फुलाया। गाल जितना लाल है, उससे ज्यादा लाल किया। कभी पालथी मरवाया तो कभी खुदाया, लेकिन लालू प्रसाद कभी पवन पर नहीं खिसियाए। हर व्यंग्य पर आनंद ही लिया। पवन कहते हैं, ‘तीन होली मैंने लालू प्रसाद के साथ मनाया। उनके साथ होली खेलने में गांव की याद आने लगती थी। एक बार तो नवभारत टाइम्स का एक पूरा पेज लालू की होली पर निकाला गया था। पत्रकारों की मंडली भी लालू प्रसाद के आवास पर जुटती थी। तमाम सीनियर पत्रकार भी होते थे। लालू प्रसाद खुद ढोल बजाकर जोगिरा गाते थे। 11-12 बजे से होली शुरू होती थी और दोपहर ढाई-तीन बजते ही कुर्ता फाड़ा-फाड़ी होने लगता था। जोगिरा के साथ-साथ.. चर….चर…..चर…!’ इसी के साथ लालू प्रसाद एक्टिव मोड में आ जाते थे। ढ़ोलक, झाल के साथ पुआ भी चलते रहता था। ठंडई भी चलती रहती थी। फोटोग्राफर भी मौजूद होते थे। पहले श्याम रजक और रामकृपाल यादव होली शुरू करते थे। पहला कुर्ता लालू प्रसाद का ही फटता था। एक तरफ होली के गीत चलते रहते और दूसरी तरफ कुर्ता चरचराने की आवाज गूंजती रहती थी। जोगिरा-सारा रा रा…जोगिरा सारा रा रा…। लालू को यह गीत बहुत पसंद है- बाबा हरिहरनाथ…सोनपुर में होली खेले…हो सोनपुर में होली खेलें… बाबा हरिहरनाथ। नेता से लेकर पत्रकार तक लालू संग नाचते लालू अपनी बुलंद आवाज में होली गाते थे। सामने रमई राम या अन्य नेता कमर मटकाते हुए दिखते थे। एक दिग्गज पत्रकार भी लालू की मंडली में कमरतोड़ डांस करते दिखते थे..। माथे पर होली वाली टोपी और गले में ढोल… कभी-कभी बाजा बजाते हुए लाल-लाल गाल वाले लालू….। होली में लालू प्रसाद की पत्नी राबड़ी देवी भी साथ होती थीं। रंगों से तर-बतर। लालू गाते…रामनगर धूम नगर कोना कानी….जोगिरा सा रा..रा…रा…! बेजोड़ सेंस ऑफ ह्यूमर वाले नेता हैं लालू यादव बाद के दिनों में बहुत कुछ बदलने लगा। लालू प्रसाद और नीतीश कुमार जब होली में साथ मिलते, दोनों मर्यादा में रहते। लालू जानते हैं, नीतीश होली उस तरह से नहीं खेलते जैसे वे खेलते रहे हैं। एक बार होली के समय लालू प्रसाद से पत्रकारों ने कहा, नीतीश कुमार को होली विश नहीं करिएगा? लालू ने मजाक में कहा- आज का दिन विश नहीं किस करने का है! लालू प्रसाद के मजाक और नीतीश कुमार के मजाक में अंतर है। लालू प्रसाद का सेंस ऑफर ह्यूमर ऐसा रहा है कि कोई उनका मजाक नहीं उड़ा सकता, वे चट से बोल पड़ने वाले नेता हैं।