बाघ ने गैंडे का शिकार किया, उस पर बैठा रहा:दुधवा में तालाब में घुसकर हमला किया, गर्दन चीरकर मांस खाया

लखीमपुर खीरी के दुधवा नेशनल पार्क में बाघ ने एक मादा गैंडे पर हमला कर दिया। मोटी चमड़ी की वजह से काफी देर तक उस पर पंजों से वार करता रहा। जबड़े में उसकी गर्दन दबा ली। थोड़ी देर में घायल गैंडे की मौत हो गई। इसके बाद बाघ उसके ऊपर चढ़कर बैठ गया। गर्दन चीरकर मांस खाता रहा। दरअसल, बुधवार को नेशनल पार्क के दक्षिण सोनारीपुर रेंज स्थित गैंडा पुनर्वास केंद्र में ‘राजेश्वरी’ नाम की मादा गैंडा तालाब में आराम कर रही थी। तभी एक बाघ ने उस पर हमला कर दिया। ‘राजेश्वरी’ ने पलटवार किया, लेकिन बाघ ने उसकी गर्दन दबोच ली। गहरे घाव होने की वजह से उसकी मौत हो गई। ‘राजेश्वरी’ उन चार गैंडों में शामिल थी, जिसे बाड़े से खुले जंगल में छोड़ा गया था। गश्त कै दौरान वन विभाग की टीम की नजर तालाब पर पड़ी। वहां पानी में आधे डूबे गैंडे पर बाघ बैठा हुआ था। गैंडा कोई हरकत नहीं कर रहा था। उन्होंने सबसे पहले तस्वीरें खींची। फिर बाघ को भगाया। तब तक गैंडा दम तोड़ चुका था। एक सींग वाला गैंडा, ऊपर बाघ बैठा था वन विभाग के मुताबिक, टीमें तरफ से गैंडों की मॉनिटिरिंग की जाती है। इसके लिए लगातार गश्ती के इंतेजाम किए जाते हैं। बुधवार को टीम दो हाथियों पर सवार होकर रूटीन गश्त पर थी। इसी दौरान अमहा ताल क्षेत्र में टीम ने एक बाघ को पानी में आधे डूबे गैंडे के ऊपर बैठा देखा। टीम ने तुरंत तस्वीरें लीं। शोर मचाकर बाघ को भगाया। टीम गैंडे के पास पहुंची। गैंडा गंभीर रूप से घायल मिली। उसकी मौत हो चुकी थी। दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड निदेशक डॉ. एच. राजा मोहन ने बताया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से भी यह स्पष्ट हो गया है कि मादा गैंडे की मौत बाघ के हमले के कारण ही हुई है। गैंडों की निगरानी बढ़ा दी गई दक्षिण सोनारीपुर रेंज में यह पहला गैंडा पुनर्वास केंद्र है, जहां गैंडों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए विशेष निगरानी की जाती है। इस घटना के बाद वन विभाग ने क्षेत्र में गश्त और निगरानी बढ़ा दी है। टाइगर और गैंडों में अक्सर संघर्ष होता रहता है तराई पूर्वी की डब्लूडब्लूएफ हेड मुदित गुप्ता ने बताया- टाइगर के गैंडे पर हमले की यह कोई पहली घटना नहीं है। जहां भी टाइगर और गैंडे एक साथ हैं, संघर्ष होता रहता है l दुधवा नेशनल पार्क में भी ऐसी घटनाएं पहले हो चुकी हैं, लेकिन गैंडा एक भारी जानवर है, इसलिए विशेष परिस्थितियों जैसे- बीमार या फिर बच्चों पर हमला होने की घटनाएं ज्यादा आती हैं l इस मामले में क्या कुछ स्थिति बनी है, इस पर जांच पड़ताल चल रही है। 2 महीने पहले मादा गैंडे ने ऐसे बेबी गैंडे को बचाया था दुधवा नेशनल पार्क में दो महीने भी बाघ और गैंडे के संघर्ष का एक वीडियो समाने आया था। इसमें एक मादा गैंडे ने अपने बच्चे के लिए जान की बाजी लगा दी थी। मादा गैंडे का गुस्सा देखकर बाघ को भी उल्टे पैर भागना पड़ा था। दरअसल, दुधवा में एक मादा गैंडा अपने बच्चे के साथ टहल रही थी। इसी बीच एक बाघ दबे पांव उसके पीछे आ गया। धीरे-धीरे बाघ गैंडे के बच्चे तक पहुंच गया। वह झपट्टा मारने ही वाला था, तभी मादा गैंडे को खतरे का एहसास हो गया। वह तुरंत पीछे मुड़ी और बाघ को दौड़ा लिया। बाघ जंगल की तरफ भाग गया। पूरी खबर पढ़ें…

इसलिए रोल मॉडल है गैंडों के लिए दुधवा दुधवा टाइगर रिजर्व में वर्ष 1984-85 में शुरू की गई दुधवा गैंडा पुनर्वास योजना आज देश की सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण परियोजनाओं में शुमार हो चुकी है। शुरुआती दौर में दक्षिण सोनारीपुर रेंज के 27 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (RRA-1) में उन्हें सुरक्षित रखा गया, जहां कड़ी निगरानी और प्राकृतिक वातावरण में उनका संरक्षण किया गया। गैंडों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अब दो नए पुनर्वास क्षेत्र RRA-3 और RRA-4 विकसित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों के निर्माण और प्रबंधन के लिए प्रदेश सरकार ने लगभग 1.5 करोड़ रुपए की मंजूरी दी है। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक घासभूमि, जलस्रोत, सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि गैंडे घास के मैदानों के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी मौजूदगी से दुधवा का पारिस्थितिकी तंत्र और सुदृढ़ हुआ है। साथ ही इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा मिला है, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हो रहे हैं। ———————-
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