मोहाली में श्मशान की राख से होली:जानवरों की हडि्डयां-कंकाल दुकान पर टांगते, CRPF जवान भी चौंके; 200 साल से अनोखी परंपरा

पूरे देश में आज रंगों की होली खेली जा रही है। लेकिन मोहाली के करीब 30 हजार आबादी वाले गांव सोहाना की होली बिल्कुल अलग है। करीब 200 साल से यहां श्मशान की राख और पशुओं की हडि्डयों से होली मनाने की परंपरा है। हालांकि ये राख कौन फेंकता है, हडि्डयां कौन टांग देता है, इसके बारे में आज तक पता नहीं चला। एक बार तो केंद्रीय सुरक्षा बल CRPF के जवानों को भी इसका पता नहीं चला। हैरत की बात ये है कि इस अनोखी होली को लेकर कोई लिखित इतिहास मौजूद नहीं है। लेकिन लोग पुरानी मान्यता को आगे चला रहे हैं। मौजूदा वक्त में अब यह चर्चित के साथ विवादित होली भी बन गई है। पुलिस होली के दिन अलर्ट रहती है ताकि कोई विवाद न हो। अब तक किसी तरह की औपचारिक शिकायत सामने नहीं आई है। होली की रात का ‘डरावना’ सीन
ग्रामीणों के मुताबिक होली से एक रात पहले कुछ लोग घरों और दुकानों के बाहर हड्डियां टांग देते हैं। सड़कों पर पशुओं के अवशेष फैले मिलते हैं। पहले तो हालात ऐसे होते थे कि गलियों से गुजरना मुश्किल हो जाता था। सुबह लोग खुद ही सफाई करते हैं। लेकिन उस दिन कई बाहरी लोग इलाके में आने से परहेज करते हैं। राख कहां से आई, जवानों को पता नहीं चला
इलाके के पार्षद हरजीत सिंह बताते हैं, “सोहना की होली पूरे देश में जानी जाती है। एक बार सीआरपीएफ के जवान लाइन बनाकर जा रहे थे। करीब 20-25 जवान थे। उन्हें समझ ही नहीं आया कि राख कहां से आकर उन पर गिर गई।” ‘न लगे हड्डियां तो नहीं चलता था बिजनेस’
इलाके के रहने वाले 62 वर्षीय एजुकेशनिस्ट सुंदर अग्रवाल कहते हैं, “पहले लोग श्मशान से राख लाते थे, रात में उसे छानते और सुबह एक-दूसरे पर फेंकते थे। कुछ लोग नालियों की गंदगी तक डाल देते थे। बुजुर्गों का मानना था कि अगर इस तरह होली न खेली जाए तो बाजार में ग्राहक नहीं आते। हम अपनी दुकानों के आगे खुद हड्डियां लटकवाते थे।” वह आगे कहते हैं कि अब सीवरेज व्यवस्था होने और शहरीकरण बढ़ने से यह प्रथा कमजोर पड़ी है। बाजार में करीब 25% लोग ही इस तरह की होली मनाते हैं, बाकी लोग रंगों वाली होली खेलते हैं या खरीदारी के लिए निकल जाते हैं। सोहाना गांव अब नगर निगम के अधीन आ चुका है। गांव में आधुनिक कोठियां, शिक्षा संस्थान और विकसित बाजार हैं, फिर भी परंपरा पूरी तरह खत्म नहीं हुई। हालांकि पहले की तुलना में इसका दायरा काफी सिमट गया है। ग्रामीण अब ये 2 वजहें गिनाते
ग्रामीणों का कहना है कि एक लोककथा में कहा गया कि होली के दिन गांव में महामारी फैल गई, इसलिए ग्रामीणों ने होली न मनाने का फैसला किया। तब से ग्रामीण अपशगुन से बचने के लिए अपने घरों के बाहर खोपड़ियां लटकाते हैं। एक और कहानी यह है कि गांव को गरीबी का श्राम मिला था। उस श्राप को दूर करने के लिए ग्रामीणों ने अपने घरों के बाहर खोपड़ियां लटकाना शुरू कर दिया। सोहना में अब दो तरह की होली
सोहाना गांव में अब 2 तरह की होली दिखती है- एक रंगों वाली, दूसरी परंपरागत राख और हड्डियों वाली। नई पीढ़ी का रुझान रंगों की ओर है, जबकि कुछ लोग इसे अपनी विरासत मानकर आज भी निभाते हैं। सोहाना की यह परंपरा जहां कई लोगों को असहज करती है, वहीं गांव के भीतर इसे आस्था, मान्यता और पहचान से जोड़कर देखा जाता है। बदलते समय के साथ यह परंपरा सिमट जरूर रही है। लेकिन फिलहाल पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

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