रंगमंच सोचने के ढंग को चुनौती देता है…

रंगमंच सोचने के ढंग को चुनौती देता है और विस्तार भी। ये विचार हैं एक्टर विलियम डाफो के। जिस पर वर्ल्ड थिएटर डे मनाया जा रहा है। इस विचार को समझना और इसी के अनुसार रंगमंच करना जरूरी है। यह कहा लेखक शब्दीश ने। वह सुचेतक स्कूल ऑफ एक्टिंग -70, मोहाली में आयोजित सेशन में पहुंचे थे। उनके साथ लेखक जगदीप वड़िंग भी थे। उन्होंने फिल्म स्क्रिप्ट राइटिंग पर आधारित वर्कशॉप भी कंडक्ट ​की। उन्होंने युवाओं को कहा- लेखक को करामात नहीं मुलाकात बनाती है। मेरी मुलाकात अच्छे साहित्य से हुई तो मेरे जीवन में लेखन आया। सोच को व्यापक साहित्य बनाता है। गुड्डियां पटोले, गलवकड़ी, बूहे बारियां जैसी फिल्मों में लिखना मजेदार रहा। पंजाबी इंडस्ट्री को लेकर बोले- यह इंडस्ट्री ग्रो कर रही है, मगर यहां महिला प्रधान फिल्म बनाना अभी भी मुश्किल है। ऐसी कोई फिल्म सफल हो जाती थी तो लोग नए प्रोजेक्ट्स के लिए मान तो जाते हैं मगर फिर वहीं आ जाते हैं, जहां पूरी इंडस्ट्री की सूई अटकी पड़ी है। नाटक में दो पीढ़ियों के तनाव को दिखाया कार्यक्रम में सार्थक रंगमंच पटियाला द्वारा लक्खा लहरी के निर्देशन में नाटक ‘पीढ़ी दर पीढ़ी’ का मंचन हुआ। कामतानाथ की हिंदी कहानी के पंजाबी अनुवाद में बने इस नाटक में दो पीढ़ियों के तनाव को दिखाया। इसमें पिता के जाने के बाद बेटा भी उसी मनोदशा में आ जाता है, जिसमें उसके पिता थे। नाटक में करमन सिद्धू ने अभिनय किया।

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