‘वंदे मातरम जबरदस्ती न थोपें…यह संविधान के खिलाफ’:जमीयत उलेमा-ए-हिंद का विरोध, मौलाना मदनी बोले- ये देशभक्ति नहीं, चुनावी राजनीति

वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में अनिवार्य करने के फैसले पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने ऐतराज जताया है। संगठ ने वंदे मातरम के सभी छंद गाने का विरोध किया है। संगठन ने कहा कि सरकार का ये आदेश हमारी धार्मिक आजादी पर हमला है। संगठन ने सरकार के आदेश को एकतरफा और मनमाना बताया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इसे, ‘अत्यंत दुखद, पक्षपातपूर्ण और नागरिकों पर जबरन थोपा गया फैसला’ बताया है। उन्होंने आज एक बयान जारी कर कहा कि मुसलमान किसी को भी वंदे मातरम गाने या बजाने से नहीं रोकते, लेकिन गाने के कुछ छंद मातृभूमि को एक देवता के रूप में दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि, हम मुसलमान इस गीत को इसलिए नहीं गा सकते क्योंकि हम केवल एक अल्लाह की इबादत करते हैं। अपनी इस इबादत में किसी और को शामिल नहीं कर सकते। ये हमारी मान्यताओं के खिलाफ हैं। दरअसल, केंद्र सरकार ने गुरुवार को एक आदेश जारी कर राष्ट्रगीत वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन की तरह ही सम्मान देना अनिवार्य कर दिया है। आदेश के मुताबिक राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे, जिनकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकेंड है। अब तक मूल गीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे। मौलाना ने और क्या-क्या कहा… सुप्रीम कोर्ट के फैसला का हवाला दिया… मौलाना मदनी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी यह स्पष्ट कर चुका है कि किसी नागरिक को राष्ट्रगान या किसी भी गीत को गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, यदि वह उसके धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध हो। उन्होंने कहा कि देशप्रेम और पूजा दो अलग बातें हैं। कहा-मुसलमानों को इस देश से कितनी मोहब्बत है, इसके लिए उन्हें किसी के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। देश की आजादी में मुसलमानों और जमीयत की भूमिका मौलाना ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों और जमीयत उलमा-ए-हिंद की भूमिका का उल्लेख किया। कहा कि देश के विभाजन का विरोध करने में जमीयत के बुजुर्गों की अहम भूमिका रही है। आज़ादी के बाद भी देश की एकता और अखंडता के लिए उनके प्रयासों को भुलाया नहीं जा सकता। मदनी ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार जब भी किसी मुद्दे पर घिरती है तो जानबूझकर ऐसा विवाद खड़ा करती है जिससे जनता का ध्यान महंगाई, बेरोजगारी और अन्य मूल समस्याओं से हटाया जा सके। उन्होंने कहा, यह देशभक्ति नहीं, बल्कि सत्ता बनाए रखने की राजनीति है। यह देश को बांटने वाली सोच है। 90 साल पहले का इतिहास बताया… मौलाना मदनी ने ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि 26 अक्टूबर 1937 को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर सलाह दी थी कि वंदे मातरम् के केवल प्रारंभिक दो बंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए, क्योंकि शेष पंक्तियां एकेश्वरवादी धर्मों की मान्यताओं से टकराती हैं। इसके बाद 19 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने निर्णय लिया था कि केवल दो बंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए। मदनी का कहना है कि संसद में हुई चर्चा में भी इसी दृष्टिकोण को दोहराया गया था, लेकिन अब पूरे गीत को अनिवार्य करने की कोशिश की जा रही है।
वंदे मातरम् बजने पर हर व्यक्ति को खड़ा होना होगा केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय ने आदेश में कहा है कि अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों या अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम’ बजाया जाएगा। इस दौरान हर व्यक्ति का खड़ा होना अनिवार्य होगा। यह आदेश 28 जनवरी को जारी हुआ, लेकिन मीडिया में इसकी जानकारी 11 फरवरी को आई। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, आदेश में साफ लिखा है कि अगर राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ साथ में गाए या बजाए जाएं, तो पहले वंदे मातरम गाया जाएगा। इस दौरान गाने या सुनने वालों को सावधान मुद्रा में खड़ा रहना होगा। हालांकि, आदेश में यह भी कहा गया है किन-किन मौकों पर राष्ट्रगीत गाया जा सकता है, इसकी पूरी लिस्ट देना संभव नहीं है। यह पहली बार है जब राष्ट्रगीत के गायन को लेकर डिटेल में प्रोटोकॉल जारी किए गए हैं। केंद्र इस समय वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कार्यक्रम मना रहा है। राष्ट्रपति के आगमन और झंडारोहण जैसे कार्यक्रमों में गाया जाएगा नई गाइडलाइन के अनुसार, तिरंगा फहराने, किसी कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के आगमन, राष्ट्र के नाम उनके भाषणों और संबोधनों से पहले और बाद में, और राज्यपालों के आगमन और भाषणों से पहले और बाद में सहित कई आधिकारिक अवसरों पर वंदे मातरम बजाना अनिवार्य होगा। मंत्रियों या अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों की मौजूदगी वाले गैर-औपचारिक लेकिन जरूरी कार्यक्रमों में भी राष्ट्रगीत सामूहिक रूप से गाया जा सकता है, बशर्ते इसे पूरा सम्मान और शिष्टाचार के साथ पेश किया जाए। 10 पेजों के आदेश में, सिविलियन पुरस्कार समारोहों, जैसे कि पद्म पुरस्कार समारोह या ऐसे किसी भी कार्यक्रम में जहां राष्ट्रपति उपस्थित हों, वहां भी वन्दे मातरम बजाया जाएगा। गणतंत्र दिवस परेड में वंदे मातरम की झांकी निकली थी दिल्ली में कर्तव्य पथ पर मुख्य परेड में इस साल 77वें गणतंत्र दिवस पर मुख्य परेड की थीम वंदे मातरम रखी गई थी। परेड में संस्कृति मंत्रालय ने वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने का जश्न मनाने वाली झांकी निकाली थी। इस झांकी को मंत्रालयों और विभागों की कैटेगरी में बेस्ट झांकी का अवॉर्ड मिला। संस्कृति मंत्रालय की ‘वंदे मातरम: एक राष्ट्र की आत्मा की पुकार’ थीम पर आधारित झांकी में बंकिम चंद्र चटर्जी के गीत की रचना, एक प्रसिद्ध मराठी गायक द्वारा औपनिवेशिक काल की रिकॉर्डिंग और Gen Z का प्रतिनिधित्व करने वाले एक समूह द्वारा इसका गायन दिखाया गया था। झांकी के आगे के भाग में वंदे मातरम की पांडुलिपि बनाते हुए दिखाया गया था। इसके निचले हिस्से में एक पैनल पर चटर्जी की एक छवि दिखाई गई थी। मध्य भाग में पारंपरिक वेशभूषा में कलाकारों का एक समूह था जिसने भारत की लोक विविधता को दर्शाया। 26 जनवरी 2026 को दिल्ली के कर्तव्य पथ पर आयोजित 77वें गणतंत्र दिवस परेड के दौरान संस्कृति मंत्रालय की झांकी की तस्वीर। सिनेमा हॉल में लागू नहीं होंगे नए नियम हालांकि, सिनेमा हॉल को नए नियमों से दूर रखा गया है। यानी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले ‘वंदे मातरम’ बजाना और खड़ा रहना अनिवार्य नहीं होगा। वहीं अगर किसी न्यूजरील या डॉक्यूमेंट्री फिल्म के हिस्से के रूप में राष्ट्रगीत बजाया जाता है, तो दर्शकों के लिए खड़ा होना जरूरी नहीं होगा। मंत्रालय ने कहा कि ऐसी स्थिति में खड़े होने से प्रदर्शन में व्यवधान और अव्यवस्था हो सकती है। मंत्रालय ने कहा है कि अब से राष्ट्रगीत का आधिकारिक संस्करण ही गाया या बजाया जाएगा और इसे सामूहिक गायन के साथ प्रस्तुत किया जाएगा।
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