राज्य के तीन मेडिकल कॉलेजों में छात्रों को पढ़ने के लिए मानव शव नहीं मिल रहे हैं। वे वर्चुअल डिसेक्शन (एनाटोमेज) से मानव अंग की बनावट सीख रहे हैं। ऐसे में वे बिना मानव शव (कैडेवर) को छुए ही आगे की पढ़ाई कर लेंगे। एनोटॉमी के पेपर में मेडिकल छात्रों को डिसेक्शन टेबल पर मानव शवों को चीड़- फाड़कर नसों और अंगों को समझना होता है। लेकिन शव नहीं मिलने के कारण वे वर्चुअल डिसेक्शन (एनाटोमेज) से मानव अंग की जटिलता सीख रहे हैं। नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) की हालिया जांच रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है कि राज्य के तीन मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्रों की पढ़ाई के लिए कैडावेर (मृत मानव शरीर) उपलब्ध ही नहीं हैं। इनमें पावापुरी (नालंदा), बेतिया और मधेपुरा का मेडिकल कॉलेज हैं। एनएमसी ने इन्हें शो-कॉज किया है। निजी मेडिकल कॉलेजों की स्थिति तो और भी खराब है। विशेषज्ञों का कहना है कि इंसानी त्वचा, मांसपेशियां और नसें छूने पर कैसी महसूस होती हैं, यह कोई सॉफ्टवेयर नहीं सिखा सकता। हर इंसान का शरीर अंदर से एक जैसा नहीं होता। कैडावेर पर अभ्यास से ही डॉक्टर को शरीर के भीतर के एनाटोमिकल वेरिएशंस का पता चलता है। क्या है मानक? एनएमसी के मानकों के अनुसार, एमबीबीएस प्रथम वर्ष के 10 छात्रों पर एक कैडावेर होना अनिवार्य है। शव मिलने के बाद उसे एम्बॉलमिंग (रसायनों से सुरक्षित करने की प्रक्रिया) से गुजारा जाता है। इसके बाद छात्रों को छोटे समूहों में बांटकर हर ग्रुप को एक विशेष डिसेक्शन टेबल और एक शव आवंटित किया जाता है। नुकसान क्या? … एनएमसी के मानकों के आधार पर बिना पूर्ण एनोटॉमी ज्ञान के निकले और वर्तमान में अध्ययन कर रहे बैचों के आंकड़े डराने वाले हैं। पावापुरी और बेतिया मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई 2013 से शुरू हुई थी। अब तक यहां से लगभग 6 से 7 बैच एमबीबीएस पूरी कर चुके हैं। मतलब है कि लगभग 600 से 700 डॉक्टर ऐसे तैयार हो चुके हैं जिनकी बुनियादी सर्जिकल समझ केवल किताबों या अधूरे डिसेक्शन पर टिकी है। छात्रों का दर्द… बिना गुरु के हमारी पूरी पढ़ाई खोखली रस्म मधेपुरा मेडिकल कॉलेज के छात्र ने बताया कि उसे कडैवेरिक शपथ दिलाई गई कि कैडावेर पहला गुरु है, पर हमने गुरु का चेहरा तक नहीं देखा। पावापुरी मेडिकल कॉलेज में पढ़ रही छात्रा ने अभी तक सिर्फ एक मानव शरीर के एक हिस्से का डिसेक्शन किया। कहा क्या हम सीधे मरीजों पर प्रयोग करेंगे? कॉलेज का तर्क… जिला प्रशासन और थाना से नहीं मिलता सहयोग वर्धमान आयुर्विज्ञान संस्थान, पावापुरी की प्राचार्य प्रो. सर्बिल कुमारी ने कहा कि कॉलेज में कैडावेर के लिए कई बार जिला प्रशासन, थाना और सिविल सर्जन को पत्र लिखे गए, लेकिन सहयोग नहीं मिलता। कभी- कभार कुछ लावारिस मरीज की मौत हो जाती है, तो उन्हें ही डिसेक्शन के लिए लेते हैं। वर्चुअल व किताबों के भरोसे भविष्य के सर्जन हकीकत क्या? अधिकांश मेडिकल कॉलेजों में वर्चुअल पढ़ाई हो रही है। मुजफ्फरपुर के निजी मेडिकल कॉलेज आरडीजेएमएमसीएच के प्राचार्य प्रो. उदय कुमार ने बताया कि पर्याप्त मानव शव नहीं मिलने के कारण वर्चुअल डिसेक्शन से छात्रों को पढ़ाई कराई जा रही है। कई जगह तो लाशों के लिए एक से डेढ़ लाख तक कीमत देनी पड़ती है। वो सबकुछ जो आपके लिए जानना जरूरी है राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई- प्रैक्टिकल के लिए नहीं मिल रहे मानव शव मेडिकल शिक्षा में कैडावेर (मृत मानव शरीर) को छात्र का पहला गुरु माना जाता है। सर्जरी से लेकर क्लिनिकल डायग्नोसिस तक की बारीकियां इसी से सीखी जाती हैं। कैडावेर न होने से छात्र केवल चार्ट पेपर और डिजिटल मॉडल के भरोसे हैं। जो छात्र मानव शरीर की वास्तविक जटिलता को महसूस नहीं करते, उनकी सर्जिकल समझ अधूरी रह जाती है। यह न केवल शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता है, बल्कि भविष्य में मरीजों से सीधा खिलवाड़ है। -डॉ. राजीव रंजन प्रसाद, बेतिया मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य