पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर किसी आपराधिक मामले में अदालत पहले ही अंतिम आदेश देकर एफआईआर रद्द कर चुकी है तो बाद में समझौता टूटने या शादी का वादा पूरा न होने के कारण उस फैसले को वापस नहीं लिया जा सकता। कोर्ट ने एक महिला की अर्जी खारिज कर दी, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि सेना के एक मेजर ने उससे शादी का वादा किया था, लेकिन बाद में मुकर गया। महिला ने अदालत से मांग की थी कि इस आधार पर पहले रद्द की गई एफआईआर को दोबारा बहाल किया जाए। पहले दुष्कर्म का लगाया था आरोप मामला उस एफआईआर से जुड़ा था, जिसमें महिला ने सेना के एक मेजर पर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था। इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 506 और 328 के तहत केस दर्ज किया गया था। इस मामले में वर्ष 2024 में हाईकोर्ट ने परिस्थितियों और दोनों पक्षों की उम्र को देखते हुए एफआईआर रद्द कर दी थी। बाद में महिला ने अदालत में नई अर्जी दाखिल कर कहा कि समझौते के दौरान आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया था, लेकिन अब वह शादी करने से इनकार कर रहा है। इसलिए अदालत अपने पुराने आदेश को वापस ले। अंतिम आदेश के बाद बदल नहीं सकता फैसला मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मनीषा बत्रा की पीठ ने कहा कि 2024 में दिया गया आदेश केवल समझौते के आधार पर नहीं था। अदालत ने मामले के तथ्यों की जांच करने के बाद पाया था कि आरोपी के खिलाफ पहली नजर में कोई आपराधिक मामला नहीं बनता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार अदालत किसी मामले में अंतिम आदेश पारित कर उसे हस्ताक्षरित कर देती है, तो बाद में उसे वापस लेने या बदलने का अधिकार नहीं रहता। शादी के वादे पर अलग कानूनी रास्ता खुला हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी पक्ष को शादी के वादे के उल्लंघन को लेकर शिकायत है तो उसके लिए अन्य कानूनी विकल्प मौजूद हो सकते हैं, लेकिन इसके आधार पर पहले से रद्द की जा चुकी आपराधिक कार्यवाही को दोबारा शुरू नहीं किया जा सकता। इस तरह अदालत ने महिला की अर्जी खारिज करते हुए अपने पहले दिए गए आदेश को बरकरार रखा।