समस्तीपुर के धमौन में बरसाना और भिरहा में वृंदावन की तर्ज पर आज होली खेली जा रही है। दोनों जगहों की अनोखी होली का कई साल पुराना इतिहास है। जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर धमौन गांव में 500 सालों से छाता वाली होली खेली जा रही है, जो बरसाना की तर्ज पर होता है। वहीं, 40 किलोमीटर दूर रोसरा प्रखंड के भिरहा में इस बार पिचकारी के बदले ‘रेन गन’ से होली खेली जा रही है। धमौन और भिरहा की होली में क्या खास है? दोनों जगहों की अनोखी होली का क्या इतिहास है? कई साल पुरानी परंपरा के बारे में गांव के लोगों का क्या कहना है? पढ़िए पूरी रिपोर्ट। सबसे पहले धमौन में बरसाना की तर्ज पर होली के बारे में जानिए धमौन गांव में करीब 500 साल से होली के उत्सव को अनोखे और अद्वितीय तरीके से मनाया जाता है, जिसे ‘छाता होली’ के नाम से जाना जाता है। यहां वृंदावन के बरसाने की होली की तर्ज पर होली का उत्सव मनाया जा रहा है। धमौन के 5 पंचायतों के लोग ‘कुलगुरु निरंजन स्वामी’ मंदिर के कैंपस में जुटे हैं। यहां 30 से अधिक टोली अपने-अपने छाते के नीचे आकर होली खेल रहे हैं और फगुआ गा रहे हैं। दिनभर चलने वाला होली का उत्सव आधी रात को खत्म होगा। आज खेली जा रही होली सिर्फ रंगों का खेल नहीं, बल्कि धमौन गांव की सांस्कृतिक धरोहर, एकता और भाईचारे का जीवंत प्रतीक है। हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम भी होली के उत्सव में शामिल होते हैं धमौन की छाता होली में सिर्फ हिंदू ही नहीं, बल्कि आसपास के मुस्लिम भाई जुटते हैं और रंगों से होली खेलकर भाईचारा का संदेश देते हैं। गांव में हर व्यक्ति अपनी टोली के साथ छतरी तैयार करता है, और ये छतरियां इतनी बड़ी होती हैं कि इनमें दो दर्जन से अधिक लोग एक साथ होली गीत गा सकते हैं। गांव के बुजुर्ग रामाकांत राय ने बताया कि धमौन की छाता होली की परंपरा करीब 500 सालों से भी पुरानी है। यह परंपरा 15वीं शताब्दी से चली आ रही है, हालांकि छतरियों को नया रूप 1930 से दिया गया था। उस समय नबुदी राय के घर से पहली सजी हुई छतरी निकाली गई थी, जिसने इस परंपरा को और भी लोकप्रिय बनाया। अब जानिए, आखिर बरसाना से धमौन गांव कैसे पहुंची परंपरा पेशे से टीचर दिनकर प्रसाद राय ने बताया कि धमौन के लोग मूल रूप से उत्तर प्रदेश के संबलगढ के हैं, जो काफी पहले धमौन आकर कर बस गए। चुकि संबलगढ के पास ही बरसाना है। वहां भगवान श्री कृष्ण भी छाता बनाकर उसके नीचे रंग-गुलाल से होली खेलते और गीत गाते थे। धमौन आने के बाद लोगों ने इस परंपरा की शुरुआत यहां भी शुरू कर दी, जो करीब 500 साल से ऐसे ही चला आ रहा है। उन्होंने कहा कि होली के दिन, धमौन के लोग सुबह-सुबह स्वामी निरंजन मंदिर में जुटते हैं, जहां वे अपनी छतरियों के साथ अबीर-गुलाल चढ़ाते हैं और ‘धम्मर’ तथा ‘फाग’ गीत गाते हैं। इसके बाद, छतरियों को कलाबाजी के साथ घुमाया जाता है और घंटियों की आवाज से पूरा गांव गूंज उठता है। बिहार सरकार से ‘छाता होली’ को राजकीय महोत्सव घोषित करने की मांग धमौन के लोग अब इस प्राचीन परंपरा को राजकीय महोत्सव घोषित करने की मांग कर रहे हैं। गांव के इंजीनियर रजनीश यादव ने इस परंपरा को एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखा है और सरकार से अपील की है कि इसे राजकीय महोत्सव का दर्जा दिया जाए। उन्होंने बताया कि धमौन की छाता होली को देखने के लिए शरद यादव, लालू प्रसाद और चौधरी चरण सिंह जैसी प्रमुख हस्तियां भी यहां आ चुकी हैं। यदि इसे राजकीय महोत्सव का दर्जा मिल जाता है, तो यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर बन सकती है और इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को भी बढ़ावा मिलेगा। गांव के मनोज कुमार राय ने बताया कि धमौन की छाता होली केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि यह गांव की पहचान बन चुकी है। ये उत्सव एकता, भाईचारे और सामूहिक उत्सव की भावना का प्रतीक है। इस परंपरा का संरक्षण और प्रचार इस क्षेत्र की संस्कृति को जीवित रखने में मदद करेगा, और आने वाली पीढ़ियों के लिए ये एक अमूल्य धरोहर बन जाएगा। अब, भिरहा में वृंदावन की तर्ज पर खेली जा रही होली के बारे में जानिए भिरहा गांव में होली को लेकर दिवाली जैसी सजावट की गई है। गांव के तीनों टोलों में समारोह को लेकर लोगों में उत्साह है। इस बार यहां पिचकारी के बदले रेन गन से रंगों की बरसात हो रही है। ऐतिहासिक ‘होली पोखर’ पर छह पिलर बनाकर समरसेबल की मदद से रेन गन लगाया गया है, जहां पानी टैंक के माध्यम से इसके जरिए रंगों की बरसात हो रही है। गांव के पूर्व सरपंच अनिल राय बताते हैं कि पूरा गांव ‘होली पोखर’ पर आकर रंग खेलता है। गांव में कही एक बूंद भी रंग नहीं दिखेगा। इसी पोखर पर लोग जुटते हैं। इस बार तो हम लोग रेन गन से होली खेल रहे हैं, लेकिन इससे पहले यहां लोग पिचकारी से ही एक-दूसरे पर रंग डालते थे। अनिल राय ने बताया कि रेन गन की रेंज 100 से 200 मीटर तक है, जिसके नीचे आकर लोग होली खेल रहे हैं। शाम को जबलपुर, पटना और राजस्थान के बैंड की प्रस्तुति गांव के हाई स्कूल मैदान में शाम को पटना, जबलपुुर और राजस्थान के बैंड की ओर से होली के गीतों की प्रस्तुति होगी। गांव की हर सड़क को दिवाली की तर्ज पर भव्य लाइट से सजाया गया है। ग्रामीण राममोहन राय ने बताया कि इस बार भिरहा में तीन दिनों तक होली कार्यक्रम होगा। कार्यक्रम में बनारस, कोलकाता और मुजफ्फरपुर से डांसर भी बुलाई गईं हैं। बताया जाता है कि कुछ लोग करीब 1935 में होली के दिन वृंदावन गए थे। वहां उन्होंने वृंदावन की भव्य होली देखी, जिसके बाद यहां आकर वृंदावन जैसी होली का कॉन्सेप्ट लोगों के सामने रखा। फिर गांव के सभी लोगों की सहमति हुई, और 1936 से आज तक वृंदावन की तर्ज पर ही लोग होली खेलते हैं। गांव के बुजुर्ग राजाराम राय ने बताया कि पहले इस तरह से इतनी सजावट नहीं होती थी, सांस्कृतिक कार्यक्रम, बैंड की प्रस्तुति नहीं होती थी। लेकिन समय के साथ इस पर्व में आधुनिक चीजें बढ़ती चलीं गईं। राष्ट्रकवि दिनकर ने बिहार के वृंदावन का दर्जा दिया था भिरहा गांव की होली सैड़कों सालों से आज भी ब्रज की तर्ज पर हो रही है। यहां की होली को देख राष्ट्रकवि दिनकर ने इसे बिहार के वृंदावन का दर्जा दिया था। होली के दो स्प्ताह पहले से ही गांव में उत्सव का माहौल रहता है। भिरहा की अनूठी होली का गवाह बनने के लिए यहां राष्ट्रकवि दिनकर के अलावा, महाकवि आरसी, महाकवि आचार्य सुरेन्द्र झा सुमन, राजनीतिक हस्तियों में कर्पूरी ठाकुर, जगन्नाथ मिश्र, विन्देश्वरी दूबे, जगजीवन राम, रामविलास पासवान आदि पहुंच चुके हैं। भिरहा की होली को राजकीय महोत्सव का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर स्थानीय भाजपा विधायक बीरेन्द्र कुमार ने बिहार विधानसभा में अपनी मांग रखी है।