सिक्योरिटी होने के बावजूद जेलों में आत्महत्याएं कैसे हुईं:पंजाब मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में उठे सवाल, लापरवाही और निगरानी में कमी उजागर

पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग (PSHRC) की विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट में पंजाब की जेलों में हुई कस्टोडियल मौतों (जेल हिरासत में मौत) का चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। आयोग ने कई मामलों में जेल अधिकारियों की लापरवाही और निगरानी की कमी पाई। इनमें से 5 प्रमुख मामलों में आयोग ने राज्य सरकार को मृतक के परिजनों को ₹3 लाख का मुआवजा देने की सिफारिश की, जो बाद में चुकाया भी गया। ये मौतें जेलों में आत्महत्या (हैंगिंग) से हुईं, लेकिन आयोग ने जेल प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया। आयोग ने टिप्पणी की है जेल में फूलप्रूफ सिक्योरिटी होने के बावजूद आत्महत्याएं कैसे हुई? यह लापरवाही है। इन 5 मामलों में मुआवजा दिया गया जसविंदर सिंह (लुधियाना) – 2018 में सेंट्रल जेल पटियाला में बैरक के बाथरूम में फांसी लगाकर आत्महत्या। आयोग ने जेल अधिकारियों की निगरानी की कमी पाई। 3 लाख मुआवजा 26 जून 2024 को भाई को ट्रांसफर किया गया। चरणजीत सिंह (मानसा) – 2019 में डिस्ट्रिक्ट जेल मानसा में टर्बन से फांसी। सुसाइड नोट मिला, लेकिन आयोग ने ब्रॉड डेलाइट में घटना को लापरवाही बताया। ₹3 लाख 6 जून 2024 को भाई के खाते में जमा। विक्रम उर्फ विक्की (मोगा) – 2016 में सेंट्रल जेल फरीदकोट में ड्रग एडिक्ट कैदी ने बाथरूम में आत्महत्या की। जेल डिजाइन और स्टाफ शॉर्टेज का हवाला दिया गया, लेकिन आयोग ने निगरानी की कमी मानी। 3 लाख 12 सितंबर 2024 को कानूनी वारिसों को दिया गया। भग राम उर्फ भागू (लुधियाना) – 2018 में सेंट्रल जेल लुधियाना में परना से फांसी। स्टाफ शॉर्टेज का दावा किया, लेकिन आयोग ने कहा- “जेल प्रशासन ने कैदी की सुरक्षा में विफलता दिखाई।” 3 लाख 18 फरवरी 2025 को मां को चुकाया गया। सुनील कुमार (हनुमानगढ़, राजस्थान) – 2018 में सेंट्रल जेल बठिंडा में बैरक में हैंगिंग। आयोग ने कहा- “निगरानी की कमी से मौत हुई।” 3 लाख नवंबर 2024 में मां के खाते में ट्रांसफर। एक जुवेनाइल केस भी – फरीदकोट ऑब्जर्वेशन होम में जुवेनाइल बीरू की 2015 में मौत हुई, लेकिन माता-पिता ने किसी पर शक नहीं जताया। इस केस में अलग निष्कर्ष निकला। अमृतसर से 66 शिकायतें मिली रिपोर्ट में जेलों से जुड़े कुल शिकायतों में CUSTODIAL DEATH (Judicial) कैटेगरी प्रमुख है। अमृतसर जिले अकेले में 66 ऐसी शिकायतें दर्ज हुईं, जबकि अन्य जिलों (लुधियाना, मानसा, फरीदकोट, बठिंडा आदि) में भी दर्जनों मामले। पुलिस कस्टोडियल मौत का 1 मामला भी दर्ज। आयोग ने हर मामले में जेलों को हाई-सिक्योरिटी जोन बताते हुए कहा कि निगरानी और स्टाफ की कमी से अमूल्य जीवन चला गया।

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