हरियाणा में लकड़ियों पर पकने लगा शादियों का खाना:पानीपत में कॉमर्शियल गैस की सप्लाई ठप, मुरथल के ढाबों ने इंडक्शन चूल्हे मंगवाए

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के चलते हरियाणा समेत पूरे भारत में गैस का संकट शादियों और ढाबों पर दिख रहा है। सरकार ने कॉमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई होटल, रेस्टोरेंट और ढाबा संचालकों के लिए सीमित कर दी है। शादी के सीजन में गैस की किल्लत पानीपत, सोनीपत और गुरुग्राम जैसे बड़े जिलों के आयोजकों और कैटरर्स के लिए एक बड़ी मुसीबत बन गई है। पानीपत में बैंकेट हॉल और मैरिज पैलेस के आयोजक जो पहले कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों का उपयोग करते थे, वहां अब लकड़ी और कोयला जलाकर खाना बनाया जा रहा है। यही हाल अब मुरथल के नामी ढाबों में देखने को मिल रहा है। ढाबा संचालकों ने वैकल्पिक इंतजाम करने शुरू कर दिए हैं। कहीं इंडक्शन चूल्हे मंगवाए जा रहे हैं तो कहीं अतिरिक्त भट्ठियां लगाकर खाना तैयार किया जा रहा है। इसके बावजूद भी गैस संकट का असर धीरे-धीरे ढाबों के संचालन और कारोबार पर भी दिखाई देने लगा है। दूसरी ओर, हरियाणा सरकार गैस किल्लत के चलते पीडीएस आधारित केरोसीन देने पर विचार कर रही है। केंद्र सरकार द्वारा प्रदेश को 8.76 लाख लीटर कैरोसीन ऑयल मिला है। हरियाणा खाद्य एवं आपूर्ति विभाग इसकी वितरण व्यवस्था का खाका तैयार करेगा। जानिए कैसे पड़ रहा गैस सप्लाई का असर… पानीपत की शादियों में लकड़ी-कोयला बना सहारा पानीपत शहर और आसपास के इलाकों में करीब 50 से अधिक बड़े बैंकेट हॉल और मैरिज पैलेस हैं, जहां हर दिन शादियों और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। इन आयोजनों में खाना बनाने के लिए बड़े पैमाने पर कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों का उपयोग किया जाता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से कॉमर्शियल सप्लाई पूरी तरह ठप होने के कारण, शहर के बैंकेट हॉल में अब सिलेंडरों की जगह लकड़ी और कोयला जलाकर खाना बनाया जा रहा है। हलवाई बोला- कॉमर्शियल सिलेंडर न मिलने से घंटों काम कर रहे पानीपत के प्रसिद्ध हलवाई बंटू ने बताया कि एक औसत शादी, जिसमें करीब 500 मेहमानों का खाना बनता है, वहां कम से कम 15 से 20 कॉमर्शियल सिलेंडरों की जरूरत पड़ती है। गुरुवार को हमारे पास एक बड़ा ऑर्डर था, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद हमें केवल 6 सिलेंडर ही मिल पाए। ऐसे में हमारे पास काम रोकने का विकल्प नहीं था। हमने तुरंत 14 सिलेंडरों की कमी को पूरा करने के लिए लकड़ियों का इंतजाम किया। लेकिन, जो खाना हम गैस भट्ठियों पर महज 4 घंटे के भीतर तैयार कर लेते थे, उसे लकड़ी की आग पर पकाने में सुबह से लेकर रात हो गई। आग को बार-बार नियंत्रित करना पड़ता है और धुआं आंखों और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है। पानीपत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर भी संकट सिर्फ शादियां ही नहीं, बल्कि पानीपत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री भी इस गैस संकट की चपेट में है। शहर की लगभग 250 से ऊपर छोटी-बड़ी इंडस्ट्री, जिनमें खास तौर पर डाई हाउस और कंबल उद्योग शामिल हैं, कॉमर्शियल एलपीजी पर निर्भर हैं। हरियाणा चेंबर ऑफ कॉमर्स के चेयरमैन विनोद धमीजा और उद्योगपति प्रितपाल खेड़ा ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि अगर सप्लाई जल्द बहाल नहीं हुई, तो उत्पादन बंद करना पड़ेगा, जिससे विदेशी ऑर्डर रद्द हो सकते हैं और हजारों मजदूरों का रोजगार छिन सकता है। अब पढ़िए मुरथल के ढाबों का हाल… छोटे ढाबा संचालक सबसे ज्यादा परेशान मुरथल ढाबा एसोसिएशन के प्रतिनिधि मंजीत सिंह ने बताया कि कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की कमी का सबसे ज्यादा असर छोटे ढाबा संचालकों पर पड़ रहा है। बड़े ढाबों के पास कुछ वैकल्पिक साधन मौजूद हैं, लेकिन छोटे ढाबों के लिए गैस की कमी बड़ी समस्या बन गई है। इसी कारण कई ढाबा संचालक अब लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर शिफ्ट हो गए हैं, जबकि कुछ ने इंडक्शन चूल्हों का भी सहारा लेना शुरू कर दिया है। रेशम ढाबा ने 70% तक घटाया गैस का उपयोग रेशम ढाबा के मैनेजर मंगत राम के अनुसार गैस की समस्या के चलते उनके ढाबे पर गैस का उपयोग करीब 70 प्रतिशत तक कम कर दिया गया है। फिलहाल गैस का इस्तेमाल केवल 30 प्रतिशत कामों में ही किया जा रहा है, जिसमें मुख्य रूप से तवे की रोटी और पराठे बनाना शामिल है। बाकी अधिकांश खाना अब लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर तैयार किया जा रहा है। पहले गैस पर बनते थे कई ग्रेवी आइटम मुरथल के ढाबों में बेस किचन के लगभग 10 से 12 आइटम पहले गैस पर ही तैयार किए जाते थे। इनमें रेड और व्हाइट ग्रेवी, चॉक मसाला, कढ़ाई पनीर, बटर मसाला, मिक्स वेज, येलो दाल और दाल मखनी जैसे लोकप्रिय व्यंजन शामिल हैं। इन सभी व्यंजनों को तैयार करने में गैस का काफी अधिक उपयोग होता था, लेकिन अब गैस की कमी के कारण इन्हें भी लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर बनाया जा रहा है। ढाबों में लगाई जा रही हैं अतिरिक्त भट्ठियां मैनेजर मंगत राम ने बताया कि उन्होंने अपने ढाबे पर पांच अलग-अलग भट्ठियां लगा दी हैं, ताकि काम सुचारू रूप से चलता रहे। हालांकि एक भट्ठी को पूरी तरह से चालू होने में करीब 30 से 40 मिनट का समय लगता है। इसके अलावा गैस की तुलना में भट्ठी पर खाना तैयार करने में लगभग 15 मिनट अधिक समय लग रहा है। मेन्यू और कीमतों में अभी कोई बदलाव नहीं गैस संकट के बावजूद ढाबा संचालकों ने अभी तक मेन्यू या कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। ढाबों पर ग्राहकों की मांग के अनुसार सभी आइटम पहले की तरह तैयार किए जा रहे हैं। संचालकों का कहना है कि फिलहाल उनका प्रयास यही है कि ग्राहकों को किसी प्रकार की असुविधा न हो और सेवा पहले की तरह जारी रहे। इंडक्शन चूल्हों का सहारा, लेकिन महंगी पड़ रही बिजली मुरथल के कई ढाबों ने इंडक्शन चूल्हे भी मंगवाकर रख लिए हैं ताकि जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल किया जा सके। झिलमिल ढाबा के संचालक और ढाबा संगठन के प्रधान मंजीत सिंह का कहना है कि उन्होंने भी अपने स्टाफ को इंडक्शन चूल्हे मंगवाने के निर्देश दिए हैं। हालांकि कॉमर्शियल बिजली दरें काफी ज्यादा होने के कारण इंडक्शन चूल्हों का अधिक उपयोग करना भी उनके लिए महंगा साबित हो सकता है। —————- यह खबर भी पढ़ें… हरियाणा 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अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहे तनाव का असर हरियाणा में भी दिख रहा है। गुरुवार सुबह से ही गैस एजेंसियों पर लंबी कतारें लगी रहीं। अब कालाबाजारी भी शुरु हो गई है। गुरुग्राम में घरेलू सिलेंडर ब्लैक में 1500 तक में मिल रहा है, जबकि कॉमर्शियल सिलेंडर का रेट 3 से 4 हजार रुपए हो गया है। पढ़ें पूरी खबर…

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