हिमाचल में देशव्यापी हड़ताल का असर:15 हजार बिजली इंजीनियर-कर्मचारी, मजदूर-आउटसोर्स कर्मी स्ट्राइक पर, PSU बेचने और लेबर कोड का विरोध

केंद्र सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम बेचने (PSU) और नए लेबर कोड के विरोध में आज राष्ट्रव्यापी हड़ताल का असर हिमाचल प्रदेश में भी देखने को मिलेगा। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और विभिन्न फेडरेशन के आह्वान पर बुलाई गई इस हड़ताल के तहत प्रदेश में सीटू के बैनर तले धरना-प्रदर्शन किए जाएंगे। इसका असर बैंकिंग, एलआईसी, बिजली, स्वास्थ्य इत्यादि सेवाओं पर पड़ेगा। प्रदेश के 15 हजार से ज्यादा बिजली इंजीनियर व कर्मचारी दिनभर पेन और टूल डाउन स्ट्राइक पर रहेंगे। इस दौरान हिमाचल के विभिन्न विभागों में सेवारत्त आउटसोर्स कर्मचारी, 108 एंबुलेंस कर्मी, ट्रीटमेंट प्लांट कर्मचारी, बिजली प्रोजेक्ट में काम करने वाले कर्मचारी, रेहड़ी-फड़ी व तहबाजारी यूनियन, होटल कर्मी, निर्माण मजदूर, मनरेगा मजदूर, उद्योग मजदूर, बैंक, बिजली, बीएसएनएल और एलआईसी कर्मचारी भी हड़ताल में शामिल होंगे। हिमाचल के किसानों ने भी इस हड़ताल का समर्थन किया है। सोलन शहर में सुबह 11 से दोपहर 1 बजे तक ऑटो रिक्शा भी नहीं चलेंगे। ऑटो यूनियन भी केंद्रीय ट्रेड यूनियन के समर्थन में उतर आई है। अस्पतालों में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मियों और एंबुलेंस कर्मचारियों के हड़ताल पर जाने से स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ेगा। लेबर कोड मजदूरों के अधिकारों को कमजोर करने वाले: मेहरा सीटू के प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा ने बताया कि केंद्र के चार नए लेबर कोड मजदूरों के अधिकारों को कमजोर करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इन कोड्स से यूनियन बनाने और सामूहिक सौदेबाजी के अधिकार सीमित हो गए हैं, साथ ही हड़ताल की प्रक्रिया को भी जटिल बनाया गया है। संगठनों का मानना है कि ये कानून ठेका प्रथा को बढ़ावा देंगे, स्थायी नौकरियों में कमी लाएंगे और मजदूरों की असुरक्षा बढ़ाएंगे। सीटू ने चारों लेबर कोड वापस लेने की मांग दोहराई है। पूरे देश में 27 लाख बिजली कर्मचारी-इंजीनियर स्ट्राइक पर: लोकेश हिमाचल पावर इंजीनियर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष लोकेश ठाकुर ने बताया कि देशभर के लगभग 27 लाख बिजली कर्मचारी और अभियंता भी इस एक दिवसीय हड़ताल में शामिल होंगे। यह आंदोलन मुख्य रूप से पावर सेक्टर के निजीकरण के विरोध में, इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 और प्रस्तावित नेशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी 2026 को वापस लेने तथा पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की मांग को लेकर किया जा रहा है।

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