हिमालय में अनियंत्रित विकास से ‘देवभूमि’ पर संकट:विशेषज्ञ बोले- टेक्टोनिक प्लेटों में हलचल, तत्काल कदम नहीं उठाए तो मिट सकता वजूद

हिमालयी क्षेत्र में अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप और बदलती भूगर्भीय परिस्थितियाँ हिमाचल प्रदेश सहित पूरी मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा बन गई हैं। सेंट्रल यूनिवर्सिटी हिमाचल प्रदेश के भूविज्ञान विभाग द्वारा आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में वैज्ञानिकों, भूगर्भशास्त्रियों और कानूनी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो ‘देवभूमि’ का वजूद समाप्त हो सकता है। हिमाचल में 294 फ्लैश फ्लड, शिमला और थुनांग में भूधंसाव हाल के वर्षों में प्रदेश में 294 फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) की घटनाएँ दर्ज की गई हैं। शिमला और थुनांग जैसे क्षेत्रों में गंभीर भूधंसाव देखा गया है, जहाँ बुनियादी ढाँचा ढहने के कगार पर है। वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालय की जटिल संरचना और भूकंपीय संवेदनशीलता इसे आपदाओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है। टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियाँ बड़ी आपदा का संकेत: पद्मश्री डॉ. शैलेश नायक ने चेतावनी दी कि हिमालय के भीतर 50 किलोमीटर की गहराई तक टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियाँ किसी बड़ी आपदा का संकेत दे रही हैं। ‘एनवायरनमेंटल रूल ऑफ लॉ’ का उल्लंघन अस्वीकार्य: सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका के रूप में कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि ‘एनवायरनमेंटल रूल ऑफ लॉ’ के तहत राजस्व और आर्थिक विकास के लिए पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना स्वीकार्य नहीं होगा। चारधाम जैसी परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सड़कें आवश्यक हैं, लेकिन इसका उपयोग पहाड़ों को क्षति पहुँचाने के बहाने के रूप में नहीं किया जा सकता।
आपदा प्रबंधन में डेटा की सटीकता पर चिंता सम्मेलन में डेटा की सटीकता पर भी चिंता व्यक्त की गई। मौसम विभाग के पूर्व अधिकारियों ने बताया कि आपदा प्रबंधन के लिए आधिकारिक स्रोतों के बजाय समाचार पत्रों या विकिपीडिया जैसे माध्यमों से प्राप्त डेटा पर निर्भरता बढ़ रही है। इस तरह के डेटा में वास्तविक आंकड़ों से तीन गुना तक का अंतर हो सकता है। ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ और प्रो-एक्टिव दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर्यटन के दबाव में खड़ी ढलानों पर बनी बहुमंजिला इमारतें और नष्ट होते सेब के बागान भविष्य की बड़ी त्रासदी का आधार तैयार कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अब ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ और प्रो-एक्टिव दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है। यदि आज हिमालय की पुकार अनसुनी की गई, तो आने वाली पीढ़ियों के पास पछताने का अवसर भी नहीं बचेगा।

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