होली में नालंदा के 5 गांवों में चूल्हा नहीं जलता:रंग छोड़िए, लोग पानी भी नहीं डालते; हुड़दंग की जगह हरिकीर्तन, ऐसा क्यों होता है

‘हमारे गांव में होली के दिन रंग, गुलाल नहीं लगाने की परंपरा 50 से अधिक सालों से अधिक पुरानी है, अगर ये परंपरा चलती आ रही है, तो इसमें कुछ गलत नहीं है। गांव में होली नहीं खेली जाती, फगुआ की जगह हरे राम-हरे कृष्ण की गूंज रहती है। अखंड कीर्तन का जाप चलता है। एक संत ने 1970-72 में होली के दिन अखंड करने का पुण्य बताया था। रंग छोड़िए, होली के दिन पानी भी एक-दूसरे पर नहीं फेंका जाता है, ऐसा करने वाले पर उसकी कमाई के मुताबिक, जुर्माना लगाया जाता है।’ नालंदा जिले के बिहारशरीफ प्रखंड के पांच गांवों के लोगों ने यह बातें दैनिक भास्कर से साझा कीं। दरअसल, प्रखंड के पतुआना, बासवान बिगहा, ढीबरापर, नकटपुरा और डेढ़धारा गांवों में होली के दिन हरिकीर्तन की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। आखिर नालंदा के इन पांच गांवों में होली के दिन रंग-गुलाल खेलने की मनाही क्यों है? किस संत ने और किन परिस्थितियों में यह परंपरा शुरू की थी? गांव के लोग इस परंपरा को लेकर क्या तर्क देते हैं? और फिर यहां के लोग रंग-गुलाल से होली कब खेलते हैं? पढ़िए पूरी रिपोर्ट। सबसे पहले होेली वाले दिन रंग गुलाल नहीं खेलने वाले परंपरा के बारे में जान लीजिए नकटपुरा गांव के रामदास, डेढ़धारा के राजाराम और ढीबरापर के रमेश बताते हैं कि बिहार के अन्य गांवों की तरह हमारे गांवों में भी धूमधाम से होली मनाई जाती थी। होली में जमकर हुड़दंग मचता था। घरों में पकवान के साथ मटन भी पकता था। मटन होता था तो लोग होली को सेलिब्रेट करने के लिए शाम होते-होते शराब भी पी लेते थे। बस फिर लड़ाई-झगड़ा का दौर शुरू हो जाता था। गांव के इन लोगों ने बताया कि 1970-72 के आसपास गांव में एक संत बाबा हुआ करते थे। लड़ाई-झगड़ा और मांस-मदिरा वाली परंपरा से तंग संत बाबा ने एक अलग तरह की परंपरा बनाई। उन्होंने कहा कि अब से होली के मौके पर न तो किसी घर में चूल्हा जलेगा और न ही कोई शराब पीएगा। संत बाबा को मानने वाले लोगों ने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया और तब से लेकर अब तक 5 दशक से ज्यादा वक्त हो गया, ये परंपरा चली आ रही है। होली वाले दिन चूल्हा भी नहीं जलता, एक दिन पहले का बासी खाना खाते हैं लोग गांव के लोगों की मानें तो भक्ति वाला माहौल रहने की वजह से हम लोग उपवास ही रहते हैं। परंपरा के मुताबिक ही होली वाले दिन गांव में किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलता है। पांचों गांव में करीब 1500 परिवार हैं। युवा, महिलाएं और बुजुर्ग अधिकतर उपवास में रहते हैं। होलिका जलने के पहले ही हम लोग खाना बनाकर रख लेते हैं। गांव के लोगों ने कहा कि परंपरा के तहत बासी खाना खाने का चलन भी है। घर में चूल्हा तो नहीं जलता है, बच्चे और युवा जो उपवास नहीं रख पाते हैं, वे होली वाले दिन बासी खाना ही खाते हैं। ग्रामीण अखंड शुरू होने के पहले ही खाना और पकवान तैयार कर लेते हैं। कीर्तन के दौरान घरों से धुआं निकलना भी वर्जित रहता है। अधिकांश लोग इस दौरान नमक का त्याग कर देते हैं और सात्विक आहार ग्रहण करते हैं। मांस और मदिरा से तो लोग कोसों दूर रहते हैं। होली के अगले दिन पांच गांवों में एक दूसरे को लगाते हैं रंग गुलाल इन पांचों गांव में एक दिन बाद होली मनाई जाती है। यानी इस बार इन पांचों गांव में 4 के बजाए 5 मार्च को होली मनाई जाएगी। होली मनाने से पहले लोग संत बाबा के समाधि स्थल पर जाते हैं और पूजा पाठ करते हैं। इन गांवों में होलिका दहन के दिन अखंड कीर्तन का आयोजन होता है। गांव के युवा बोले- भक्ति वाला माहौल होता है, शांति होती है बसावन बिगहा गांव के 23 साल के गौतम कुमार ने बताया कि जब पूरा देश फागुन की मस्ती में सराबोर होकर रंग, गुलाल और फगुआ के गीतों में डूबा होता है, तब हमारे गांव में हुड़दंग के बजाए हरिकीर्तन होता है। माहौल बिल्कुल भक्तिमय होता है। होली वाले दिन न तो रंगों की बौछार होती है और न ही पकवानों की खुशबू आती है। गौतम ने बताया कि होली के एक दिन पहले घर में जो खाना बना होता है, उस बासी खाना को ही हम लोग होली वाले दिन खाते हैं और दिनभर भक्ति में लीन होते हैं। ये परंपरा 50 से अधिक साल से चली आ रही है। परंपरा की वजह से गांव में होली वाले दिन किसी तरह का कोई विवाद नहीं होता है, इस परंपरा को हम लोग आगे भी जारी रखेंगे, ये जिम्मेदारी हम युवाओं की है। बुजुर्ग बोले- होली पर शराब-मांस खाने से झगड़े होते थे पतुआना गांव के 55 साल के बुजुर्ग राम खेलावन यादव बताते हैं कि होली के दिन का खानपान अन्य दिनों से अलग होता है। उनके अनुसार, कई जगहों पर होली पर तामसी भोजन बनता है। बिहार में आज भले ही शराबबंदी है, लेकिन करीब 10 साल पहले तक होली के दिन लोग मुर्गा-मटन खाकर शराब भी पीते थे, जिससे अक्सर लड़ाई-झगड़े होते थे। राम खेलावन यादव कहते हैं कि शराबबंदी के बाद भले ही शराब बंद हो गई हो, लेकिन कई घरों में मांस-मछली बनना आम बात है। हालांकि, इन पांच गांवों के लोग इससे दूर रहते हैं। इसकी वजह संत बाबा द्वारा बनाई गई परंपरा है। उन्होंने बताया कि करीब 55 साल पहले संत बाबा ने जो नियम और परंपरा बनाई थी, उसे आज भी गांववासी खुशी-खुशी निभा रहे हैं। होलिका दहन के साथ ही गांव में 24 घंटे का अखंड कीर्तन शुरू हो जाता है, जिसमें बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी शामिल होते हैं। उनका मानना है कि होली के दिन रंग खेलने से मन के विकार बढ़ सकते हैं, जबकि कीर्तन करने से मन को शांति मिलती है। महिला बोली- चूल्हा नहीं जलता है, सबसे ज्यादा हम लोग खुश हैं नकटपुरा गांव की महिला निर्मला देवी ने बताया कि संत बाबा ने जो परंपरा बनाई है, उससे सबसे ज्यादा हम लोग खुश हैं। होली के दिन तरह-तरह के पकवान बनाना पुरानी परंपरा थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। मैं जब से इस गांव में अपने ससुराल आई हूं, मुझे ये परंपरा काफी अच्छी लगी। अखंड कीर्तन से हम भक्ति में लीन रहते हैं, न किसी तरह के पकवान बनाने की चिंता होती है और न ही रंग लगाने और छुड़ाने की मशक्कत करनी पड़ती है। अब उस संत बाबा के बारे में जानिए, जिन्होंने ये परंपरा बनाई गांव के लोगों के मुताबिक, संत बाबा मूल रूप से नालंदा शहर के इमादपुर के रहने वाले थे। उन्होंने कम उम्र में ही सांसारिक मोह त्याग दिया और पतुआना और राजाकुआं के मैदानों (खंधे) में तपस्या करने लगे। उन्होंने देखा कि होली के दिन अक्सर नशे और हुड़दंग के कारण विवाद होते हैं, जिससे आपसी भाईचारा बिगड़ता है। बाबा ने ये बातें देखकर गांव वालों को अपने पास बुलाया और ग्रामीणों को होली वाले दिन को भगवान के नाम समर्पित करने की सीख दी। 2 अक्टूबर 2000 को शरीर त्यागने वाले संत बाबा की समाधि आज एक भव्य मंदिर का रूप ले चुकी है। होली के दिन दूर-दराज से लोग यहां माथा टेकने आते हैं।

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