1992 के बाद रेगुलर कर्मी खुद जीपीएफ के दायरे में : हाईकोर्ट

चंडीगढ़ | हाईकोर्ट ने अकाली नेता बिक्रम मजीठिया की सुरक्षा को लेकर केंद्र और पंजाब सरकार को ताजा थ्रेट असेसमेंट करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि दोनों सरकारें अपनी रिपोर्ट अगली सुनवाई पर सीलबंद लिफाफे में पेश करें। मामले की अगली सुनवाई 6 मार्च को तय की गई है। जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी की एकल पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान मजीठिया की तरफ से दलील दी गई कि 2 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बावजूद मजीठिया को गंभीर जान का खतरा बना हुआ है। उन्होंने 2 मई 2025 के एक पूर्व आदेश का हवाला दिया जिसमें गृह मंत्रालय की थ्रेट रिपोर्ट के आधार पर पर्याप्त सुरक्षा देने के निर्देश दिए गए थे। मजीठिया की तरफ से 3 जनवरी की एक आंतरिक सूचना का भी उल्लेख किया गया जो पंजाब के विशेष पुलिस महानिदेशक (इंटेलिजेंस) द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी गई थी। इसमें बताया गया था कि केंद्रीय खुफिया एजेंसियों से इनपुट मिला था कि एक आतंकी संगठन जमानत से पहले जेल में रहते हुए मजीठिया को निशाना बनाने की योजना बना रहा था। याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि मजीठिया कई वर्षों तक जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा में रहे हैं, इसलिए मौजूदा परिस्थितियों में केंद्र और राज्य दोनों को नई समीक्षा करनी चाहिए। पंजाब सरकार की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि मजीठिया को वर्तमान में 15 सुरक्षाकर्मी, जिनमें हाउस गार्ड और एस्कॉर्ट शामिल हैं। हाईकोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया कि 15 जून, 1992 के बाद नियमित पेप्सू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (पीआरटीसी) कर्मियों को स्वत: जनरल प्रोविडेंट फंड (जीपीएफ) पेंशन योजना के तहत कवर माना जाए। ऐसे मामलों में अलग से विकल्प (ऑप्शन) भरना आवश्यक नहीं है। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने निगम के 19 अक्टूबर 2021 के पत्र और पेंशन लाभ से इनकार करने वाली कमेटी रिपोर्ट को रद्द कर आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को 1992 के विनियमों के तहत जीपीएफ योजना का सदस्य सभी प्रयोजनों के लिए माना जाए। यह फैसला उन कर्मियों के लिए अहम है, जिनकी नियमित नियुक्ति 15 जून 1992 के बाद हुई थी। जो कर्मी 15 जून 1992 (जब पीआरटीसी कर्मी पेंशन-ग्रेच्युटी एवं जीपीएफ विनियम लागू हुए) से पहले एडहॉक आधार पर नियुक्त हुए, पर बाद में नियमित हुए, क्या उन्हें पुराने कर्मियों की श्रेणी में मानकर पेंशन योजना के लिए विकल्प देना जरूरी है या नियमित नियुक्ति तारीख आधार पर उन्हें स्वत: कवरेज मिलेगा। हाईकोर्ट ने कहा कि सवाल यह है कि क्या याचिकाकर्ता धारा 3(1)(i) के तहत फ्रेश एंट्रेंस हैं, जिन्हें स्वत: कवरेज मिलेगा या धारा 3(1)(ii) के तहत आते हैं, जहां तय समय में विकल्प देना आवश्यक है। कहा- याचिकाकर्ता को जीपीएफ सदस्य माना जाए, बशर्ते 3 महीने में सीपीएफ अंशदान लौटाए इधर… मजीठिया की सुरक्षा पर दोबारा थ्रेट असेसमेंट के आदेश अंतिम आदेश में कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को जीपीएफ सदस्य माना जाए, बशर्ते वह 3 माह में सीपीएफ अंशदान लौटाए। अदालत ने साफ किया कि निगम इस राशि पर कोई ब्याज नहीं ले सकेगा, क्योंकि कर्मचारी सेवा में बना रहा और सेवा के दौरान ही दावा उठाया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विनियम जारी होने की तिथि से ठीक पहले कार्यरत का अर्थ पूर्णकालिक और नियमित आधार पर कार्यरत होना है। अदालत ने कहा कि 15 जून 1992 या उसके बाद नियमित और पूर्णकालिक आधार पर नियुक्त कर्मचारी स्वत: पेंशन योजना के दायरे में आएंगे और उन्हें अलग से विकल्प देने की आवश्यकता नहीं है। वहीं जो कर्मचारी उस तिथि से पहले नियमित और पूर्णकालिक आधार पर कार्यरत थे, उन्हें निर्धारित अवधि में सकारात्मक रूप से विकल्प देना होगा। कोर्ट ने पाया कि 15 जून 1992 के बाद नियमित किए गए कई समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को पेंशन लाभ दिए जा चुके हैं। कुछ को तो विकल्प न देने के बावजूद कवरेज मिला। निगम यह स्पष्ट नहीं कर सका कि याचिकाकर्ता को अलग और सख्त व्याख्या पर क्यों वंचित किया गया।

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