बिहार की राजनीति में ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। यह बहस सिर्फ किसी एक जाति के खिलाफ या पक्ष में नहीं, बल्कि राज्य की बदलती सामाजिक-राजनीतिक संरचना, प्रतिनिधित्व की मांग और सत्ता-साझेदारी के सवालों से जुड़ा है। बीते 35 साल से बिहार की राजनीति यादव-कुर्मी मतलब लालू-नीतीश के बीच घूम रही है। फिर भी निशाने पर ब्राह्मण हैं। 3.66% आबादी और एक मंत्री पद पाने वाले समाज को लेकर विधानसभा से लेकर चौक-चौराहों तक निशाना साधा जा रहा है। विधानसभा में माले विधायक संदीप सौरभ के ब्राह्मणवाद वाले बयान के बाद एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है कि सत्ता जाने के बाद भी ब्राह्मण ही टारगेट पर क्यों हैं? इसके पीछे क्या राजनीति है? जानेंगे आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में…। सबसे पहले जानिए, पूरा मामला 20 फरवरी को पालीगंज के CPI-ML विधायक संदीप सौरभ ने UGC इक्विटी एक्ट से जुड़ा सवाल बिहार विधानसभा में पूछा। इसी दौरान उन्होंने ‘ब्राह्मणवादी मानसिकता’ शब्द का इस्तेमाल किया। इस पर सत्ता पक्ष के विधायक भड़क गए। 3 पॉइंट में समझिए, ब्राह्मण निशाने पर क्यों 1. ब्राह्मणों को टारगेट कर अपने वोटरों को एकजुट रखने की कोशिश यादव समाज से आने वाले संदीप सौरभ माले के दो बार के विधायक हैं। JNU से एमफिल और पीएचडी हैं। स्टूडेंट यूनियन की राजनीति करते हुए पॉलिटिक्स में आए हैं। पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह कहते हैं, ‘संदीप सौरभ की राजनीति ही कैंपस में ब्राह्मणों की आलोचना करने से शुरू हुई है। बीते 20 साल से उनकी सहयोगी पार्टी RJD सत्ता से बाहर है। 2025 विधानसभा चुनाव में तो विपक्ष का बुरा हाल हुआ है। महागठबंधन 35 सीटों पर सिमट गया। वहीं, माले 12 से 2 सीटों पर सिमट गया।’ संजय सिंह कहते हैं, ‘इतने खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी को अपने वर्करों को एक्टिव रखने के लिए कुछ ना कुछ एग्रेसिव तो बोलना पड़ेगा। और इसके लिए जाति ही सबसे आसान टारगेट है। माले की पूरी राजनीति सवर्णों के खिलाफ रही है। उसे पता है कि हमारे वर्कर यही सब सुनना चाहते हैं।’ 2. 20 साल से सत्ता नहीं मिली, इसका गुस्सा निकाल रहा विपक्ष ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द का प्रयोग अक्सर एक विचारधारा या सामाजिक संरचना के प्रतीक के रूप में किया जाता है। जिसका संबंध ऐतिहासिक रूप से ऊंची जातियों के वर्चस्व से जोड़ा गया है। हालांकि, कई लोग इसे सीधे ब्राह्मण समुदाय से जोड़कर देखते हैं, जिससे विवाद और संवेदनशीलता बढ़ जाती है। पॉलिटिकल एनालिस्ट प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, ‘बिहार जातीय गणना-2022 के मुताबिक, राज्य में सवर्णों की आबादी 10.56% है। संख्या भले कम है, लेकिन जमीनी स्तर पर सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों के कारण इनका दबदबा है। चुनाव जीतने-जिताने में इनकी अहम भूमिका होती है।’ प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, ‘सवर्ण से दूरी को ठीक तरीके से पाटने का प्रयास महागठबंधन की पार्टियों ने कभी नहीं किया। समय-समय पर प्रयास किए हैं, लेकिन वह प्रयास नाकाफी थे। और यही कारण है कि सवर्ण पूरी तरह से महागठबंधन खेमे में जाने से परहेज करते हैं। और जब सत्ता नहीं मिलती है तो विपक्ष फिर अपने पुराने सवर्ण विरोधी ढर्रे पर लौट आता है।’ 3. सस्ती लोकप्रियता पाने का टूल बन गया है ब्राह्मण पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘किसी समाज को गाली देना। उन पर अभद्र टिप्पणी करना सस्ती लोकप्रियता का पैमाना बन गया है। नेता देशभर में नाम कमाने के लिए इस तरह की हरकत कर रहे हैं। यह सभ्य राजनीति के लिए ठीक नहीं है।’ मनुस्मृति की प्रणाली है ब्राह्मणवाद: कुणाल भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल ने कहा, ‘ब्राह्मणवाद मनुस्मृति की प्रणाली है। इस व्यवस्था की धुरी ब्राह्मण हैं। अब जाकर बात निशाने पर पहुंची है। सामंती व्यवस्था में ब्राह्मण वर्चस्व है। न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था में ब्राह्मणवाद सबसे बड़ी बाधा है। अंबेडकर इसलिए ही हिंदू धर्म का विरोध करते थे। इस फासीवादी व्यवस्था के खिलाफ सबको एकजुट होकर लड़ना चाहिए।