‘अगर एससी-एसटी और रेप मामले में एफआईआर दर्ज होने के स्तर पर ही राहत राशि दी जाती रही, तो फर्जी मुकदमों की संख्या बढ़ती जाएगी और निर्दोष लोग झूठे मामलों में फंसते रहेंगे।’ ‘अगर झूठे मामलों पर कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो एससी-एसटी एक्ट का गलत इस्तेमाल बढ़ता ही रहेगा। कानून का दुरुपयोग निर्दोष लोगों को आजीवन कारावास जैसे गंभीर अपराधों में फंसा सकता है।’ ये दोनों टिप्पणियां एससी-एसटी विशेष कोर्ट के जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने दो अलग मामलों में की हैं। झूठा केस दर्ज कराने वाली एक महिला को 3 साल तो दूसरी को साढ़े तीन साल की सजा सुनाई है। साथ ही उन्हें दी गई राहत राशि तत्काल वापस लेने का आदेश जारी किया। इस बार संडे बिग स्टोरी में पढ़िए यूपी में कैसे लोग रंजिश, राजनीति, प्यार-नफरत और संपत्ति विवाद में निर्दोषों को आजीवन कारावास तक की धाराओं में फंसा रहे। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े क्या कहते हैं? ऐसे प्रकरणों में एफआईआर दर्ज होते ही कितनी राहत राशि मिलती है? केस झूठा निकलने पर वसूली के नियम क्या हैं? पहले वो कहानी, जिसमें FIR दर्ज कराने वाली ही बनी मुल्जिम
3 जून, 2025 को एक 20-22 साल की युवती रिंकी रोते हुए मोहनलालगंज थाने पहुंची। उसने शिकायत दर्ज कराई कि वह गांव के ही दीपक से बेइंतहा मोहब्बत करती थी। उसने शादी का आश्वासन भी दिया था। शादी का झांसा देकर उसने रेप किया। जब शादी के लिए दबाव बनाया तो 30 मई को उसके साथ दीपक और उसके घरवालों ने मारपीट की। रिंकी ने शिकायत में ये भी बताया था कि वह एससी वर्ग की है। दीपक सामान्य वर्ग से आता है। मोहनलालगंज पुलिस ने मामले में एससी-एसटी एक्ट सहित रेप का प्रकरण दर्ज कर लिया। पुलिस ने जांच शुरू की तो पता चला कि युवती ने झूठा केस दर्ज कराया था। दीपक के साथ रिंकी 5 साल से लिव-इन रिलेशन में थी। लेकिन, फरवरी- 2025 में दीपक की शादी हो गई। इस शादी के बाद रिंकी ने दीपक से बदला लेने की ठानी। पहले उसने दीपक पर शादी तोड़ने का दबाव डाला। जब वह नहीं तैयार हुआ, तो वह जबरन उसके घर में घुस गई। वहां काफी हंगामा हुआ। दीपक के परिवार वालों ने किसी तरह उसे घर से बाहर किया। इसके बाद रिंकी ने बदला लेने के लिए थाने पहुंच कर झूठी एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस ने जांच की तो पता चला कि रिंकी 30 मई को दीपक के घर जरूर गई थी, लेकिन उसके साथ रेप नहीं हुआ। रिंकी के शरीर पर चोट के निशान भी नहीं मिले। वहीं उसने अपना मेडिकल कराने से भी मना कर दिया था। मोहनलालगंज पुलिस ने मामले में एफआर (फाइनल रिपोर्ट) लगाते हुए विशेष कोर्ट में चालान पेश किया था। इस मामले की सुनवाई विशेष कोर्ट के जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी के यहां हुई। कोर्ट में पूरा मामला तथ्यों के साथ रखा गया। कोर्ट ने रिंकी को झूठे केस दर्ज कराने का दोषी माना। उसे तीन वर्ष और 6 माह कारावास की सजा सुनाई। साथ ही 30 हजार का अर्थदंड भी लगाया है। जज ने शूर्पणखा का उदाहरण दिया
न्यायालय ने सजा सुनाते हुए उदाहरण देकर बताया कि हिंदुओं के प्रसिद्ध धार्मिक ग्रंथ रामायण में इस तथ्य का उल्लेख है कि वैवाहिक संस्था की पवित्रता को बचाने के लिए ही शूर्पणखा को अंग भंग करके तब दंडित किया गया था, जब वह वैवाहिक संस्था को अपवित्र करने के आशय से हमलावर हो गई थी। कोर्ट ने लखनऊ जिलाधिकारी को निर्देश दिया है कि वह किसी भी एससी-एसटी एक्ट के प्रकरण में सिर्फ एफआईआर दर्ज कराने पर ही राहत राशि न दें। कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल होने पर ही राहत की पूरी राशि दी जाए। उन्होंने रिंकी के मामले में दी गई राहत धनराशि की वसूली के भी आदेश दिए। विशेष न्यायिक जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने टिप्पणी करते हुए आदेश में लिखा है कि रिंकी ने दीपक से बदला लेने के लिए झूठा एससी-एसटी एक्ट का मामला दर्ज कराया। रिंकी ने दीपक को ऐसे केस में फंसाया, जिसमें उसे आजीवन कारावास तक हो सकती थी। दो गुटों की रंजिश में ‘बदले की FIR’
अदालत के सामने जब पूरा सच खुला, तो कहानी सिर्फ छेड़छाड़ और लूट की नहीं थी। यह एक ऐसी राजनीतिक-गुटबाजी की पटकथा थी। जिसमें एक महिला को मोहरा बनाकर तीन निर्दोष लोगों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट और लूट का मामला दर्ज कराया गया था। 3 अगस्त, 2019 को माल थाने में ममता नाम की महिला पहुंची। शिकायत में बताया कि वह बीमार मौसा को देखकर घर लौट रही थी। रास्ते में विनोद कुमार, किशन और अर्जुन सिंह ने रोककर छेड़छाड़ की। उसके गले की चेन छीन ली। पुलिस ने मामले में छेड़छाड़, लूट और एससी-एसटी का प्रकरण दर्ज कर लिया। पुलिस ने जांच शुरू की तो पता चला कि ये सब भारतीय किसान यूनियन के दो गुटों के बीच लंबे समय से तनाव और रंजिश का हिस्सा है। एक दिन पहले ही मतलब 2 अगस्त को अर्जुन गुट की एक महिला आरती ने दूसरे गुट के विष्णु पाल पर रेप और मारपीट का प्रकरण दर्ज कराया था। इसके बाद विष्णु पाल सिंह ने अपने बचाव में ममता नाम की महिला को मोहरा बनाकर झूठी एफआईआर दर्ज कराई। इस केस की विवेचना मलिहाबाद सीओ ने की। जांच में पाया गया कि ममता ने जो घटनास्थल बताया था, वहां छेड़छाड़ या लूट की घटना ही नहीं हुई थी। गवाहों ने भी ये स्वीकार किया कि ये झूठी कहानी रची गई थी। खुद ममता ने अपनी मेडिकल जांच कराने से मना कर दिया। पुलिस की जांच में उसने भी स्वीकार किया कि ये एफआईआर बदले की भावना से दर्ज कराई गई थी। उसे चोट भी नहीं थी। 30 अक्टूबर, 2025 को विवेकानंद शरण त्रिपाठी की विशेष कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए सुनीता को 3 साल के कारावास की सजा से दंडित किया है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एससी-एसटी का केस दर्ज कराकर सरकारी सहायता प्राप्त करने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है। कोर्ट ने विशेष टिप्पणी करते हुए कहा- यदि एफआईआर दर्ज होने के स्तर पर ही राहत राशि दी जाती रही, तो फर्जी मुकदमों की संख्या बढ़ती जाएगी। निर्दोष लोग झूठे मामलों में फंसते रहेंगे। कोर्ट ने राहत राशि भी वापस करने का आदेश दिया है। वकील ने रंजिश में एक महिला को मोहरा बनाकर दर्ज कराईं 29 FIR
राजधानी लखनऊ के विभूतिखंड थाने में वकील परमानंद गुप्ता ने 18 और उनकी पत्नी संगीता गुप्ता की ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली पूजा रावत ने 11 झूठे एससी-एसटी और रेप जैसी धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई थी। ये सभी मामले उन्होंने अपने पड़ोसी अरविंद यादव और उनके परिवार वालों के खिलाफ दर्ज कराए थे। हैरानी की बात ये थी कि सभी मामलों की कहानी एक जैसी थी, बस तारीख का अंतर था। एससी-एसटी कोर्ट ने एक समान कहानी के आधार पर संदेह व्यक्त करते हुए 5 मार्च, 2025 को सीबीआई को इस मामले की जांच सौंपी। सीबीआई की जांच में सामने आया परमानंद गुप्ता का अपने पड़ोसी अरविंद यादव से जमीन का विवाद है। इसी विवाद में पड़ोसियों को सबक सिखाने के लिए परमानंद ने नौकरानी पूजा रावत को मोहरा बनाया था। 19 अगस्त 2025 को विवेकानंद शरण त्रिपाठी की विशेष कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने वकील परमानंद गुप्ता को फर्जी एससी–एसटी व रेप का केस दर्ज कराने पर 12 वर्ष की सजा सुनाई है। साथ ही प्रदेश में उनके वकालत करने पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने 5.10 लाख का जुर्माना भी लगाया है। सह आरोपी को कोर्ट ने सशर्त दोषमुक्त करते हुए रिहा कर दिया। कोर्ट में सह आरोपी बनी पूजा रावत ने कोर्ट में बयान में बताया था कि वह रोजगार के सिलसिले में लखनऊ आई थी। यहां संगीता गुप्ता के ब्यूटी पार्लर में काम करती थी। वहीं पर वकील परमानंद ने पत्नी संगीता के साथ मिलकर उसे अपने जाल में फंसाया। उसे धमका कर कोरे शिकायती फॉर्म पर हस्ताक्षर करवाए गए थे। बाद में वकील परमानंद इसमें झूठी कहानी भरकर शिकायत दर्ज कराता था। कोर्ट ने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा- विरोधियों को फंसाने गैंगरेप और एएसी-एसटी का केस दर्ज कराया
बाराबंकी के जैदपुर की रहने वाली रेखा ने थाना जैदपुर में 29 जून, 2021 को अपने ही गांव के राजेश और भूपेंद्र के खिलाफ जानमाल की धमकी, सामूहिक रेप और एससी-एसटी एक्ट की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। घटनास्थल के आधार पर विवेचना लखनऊ जिले की बीकेटी स्थानांतरित हो गई। सीओ ने विवेचना में आरोप गलत पाया और विशेष कोर्ट में रिपोर्ट पेश की। ट्रायल के दौरान ही भूपेंद्र की मौत हो गई। रेखा ने शासन की ओर से 75 हजार रुपए का आर्थिक मदद भी ली थी। 16 जुलाई, 2025 को लखनऊ की एससी-एसटी की विशेष कोर्ट ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने झूठ एफआईआर दर्ज कराने वाली रेखा को 7 साल 6 महीने कारावास की सजा सुनाई। उस पर 2.10 लाख का अर्थदंड भी लगाया है। कोर्ट ने अर्थदंड की रकम से 52,500-52,500 रुपए निर्दोष होते हुए भी जेल में बंद रहने के लिए दोनों पीड़ित राजेश और भूपेंद्र के परिवार वालों को देने का आदेश दिया। वहीं, रेखा को शासन से प्राप्त आर्थिक राशि भी लौटाने का आदेश दिया। एनसीआरबी के आंकड़े भी बताते हैं कानून का हो रहा दुरुपयोग
24 जुलाई, 2024 को राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री बंदी संजय कुमार ने कांग्रेस नेता मुकुल वासनिक के सवाल का जवाब देते हुए एनसीआरबी के ये आंकड़े पेश किए थे। इन आंकड़ों से भी साफ है कि बड़ी संख्या में झूठे केस दर्ज कराए जा रहे। एससी-एसटी के साथ रेप के मामले में सरकार 5 से 8.25 लाख रुपए तक आर्थिक मदद देती है। इस राशि का भुगतान तीन किश्तों में किया जाता है। 50% राशि की पहली किश्त एफआईआर दर्ज होने के बाद, 25% राशि की दूसरी किश्त पुलिस द्वारा आरोप पत्र दाखिल करने पर और 25% राशि की तीसरी और आखिरी किश्त अदालत में दोषसिद्धि के बाद मिलता है। गैंगरेप के केस सहायता राशि 8.25 लाख तक दी जाती है। अगर पीड़िता की मौत हो जाती है या वह अपंग हो जाती है, तो उसके बच्चों की शिक्षा और भरण-पोषण का पूरा खर्चा सरकार वहन करती है। कई केस में सिर्फ आर्थिक राहत राशि पाने के लिए भी झूठे मामले दर्ज करा दिए जाते हैं। ———————— ये खबर भी पढ़ें- दुल्हन की मां बोली- बेटी को फांसी दे दो, बस्ती में दूल्हे के पिता का दर्द- शादी वाले दिन बेटे को मारने की प्लानिंग थी यूपी के बस्ती में शादी के 7वें दिन दूल्हे अनीस की हत्या कर दी गई। कातिल उसकी पत्नी का प्रेमी था। पत्नी और प्रेमी को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। लेकिन, दूल्हा-दुल्हन दोनों के घरवाले परेशान हैं। दोनों का दर्द एक है, आखिर यह सब क्यों किया गया? पढ़िए पूरी खबर…