बुजुर्ग की अर्थी को बेटी, बहू, पोती ने दिया कंधा:महिलाएं भी शव यात्रा में शामिल होकर श्मशान गईं, कहा- परंपरागत व्यवस्था अंधविश्वास पर आधारित

गयाजी के वजीरगंज में एक बुजुर्ग के निधन पर बेटों की जगह बेटियों और बहू ने अर्थी को कंधा दिया। घटना शनिवार को वजीरगंज प्रखंड के ओरैल गांव से सामने आई। यहां अर्जक संघ से जुड़े 74 साल के सुरेश प्रसाद के निधन के बाद उनकी अंतिम यात्रा पूरी तरह से अलग अंदाज़ में निकली। इस बार न सिर्फ परिवार की महिलाएं आगे रहीं, बल्कि बहू, बेटी, पोती, नातिन और गांव की कई महिलाएं अर्थी को कंधा देकर श्मशान घाट तक ले गईं। मरने-जीने के सत्य और प्रकृति की गति को याद दिलाते हुए लोग रास्ते भर नारे लगा रहे थे। जीना मरना सत्य है, प्रकृति की यही गति है, सुरेश प्रसाद अमर रहें, अर्जक संघ ज़िंदाबाद। गांव की गलियों से होती हुई यह अंतिम यात्रा सामाजिक चेतना का चलता-फिरता संदेश बन गई। जुलूस में अर्जक संघ सांस्कृतिक समिति के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुमार पथिक, मृतक के बेटे रजनीकांत रवि, अविनाश कुमार, नागमणि प्रसाद, पूर्व मुखिया कैलाश महतो, पंचायत समिति सदस्य शशि भूषण कुमार सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल थे। स्त्री-पुरुष सभी बराबर हैं का दिया संदेश अर्जक संघ के सीनियर नेता उपेंद्र कुमार पथिक ने मौके पर कहा कि महिलाओं ने अर्थी को कंधा देकर यह संदेश दिया है कि स्त्री-पुरुष सभी बराबर हैं। यह एक महिला सशक्तिकरण की मिसाल है। परंपरागत दाह संस्कार व्यवस्था विषमता और अंधविश्वास पर आधारित है। जबकि अर्जक पद्धति पूरी तरह वैज्ञानिक, मानववादी व शोषण से मुक्ति देने वाली है। उन्होंने बताया कि अर्जक पद्धति कम समय, कम खर्च और कम औपचारिकताओं में मानवीय व वैज्ञानिक सोच को मजबूत करती है। इसलिए समझदार व साहसी लोग इसे अपनाते हैं।सुरेश प्रसाद का परिवार कई वर्षों से अर्जक संघ से जुड़ा रहा है। उनके बेटे रजनीकांत रवि शिक्षक हैं और अर्जक विचारधारा के मजबूत पक्षधर। उन्होंने कहा कि दाह संस्कार के बाद सभी रस्में अर्जक पद्धति से ही होंगी। किसी भी पुरानी परंपरा का पालन नहीं किया जाएगा। ओरैल से निकली यह शव यात्रा सिर्फ एक अंतिम विदाई नहीं थी, बल्कि ग्रामीण समाज में बराबरी और वैज्ञानिक सोच की नई इबारत लिखने वाला संदेश छोड़ गई।

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