सवाल- मैं राजस्थान से हूं। मेरा 15 साल का एक बेटा है। हमारे परिवार में अक्सर पूजा-पाठ और कल्चरल एक्टिविटीज होती रहती हैं। मैं चाहती हूं कि मेरा बेटा भी इन पारिवारिक परंपराओं से जुड़े। लेकिन वह इन्हें बोरिंग और पुराने जमाने की चीजें कहकर टाल देता है। अगर हम घर के किसी रिचुअल में उसे शामिल होने को कहते हैं तो वह अनमने मन से खड़ा रहता है या बहाना बनाकर मोबाइल गेम्स खेलने चला जाता है। मैंने उसे कई बार प्यार से समझाया और कई बार फोर्स भी किया। वह कहता है कि उसका इन सबमें मन नहीं लगता है। मैं चाहती हूं कि वह हमारी संस्कृति को जाने–समझे। क्या बच्चों को फोर्स करके फैमिली ट्रेडिशन्स फॉलो कराना सही है? कृपया सही मार्गदर्शन दें। एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- मैं आपकी चिंता समझ सकती हूं। सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना पेरेंटिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं और उन्हें अपनेपन का एहसास कराती हैं। लेकिन असली सवाल ये है कि क्या बच्चों को ‘फोर्स’ करके फैमिली ट्रेडिशन्स फॉलो कराना सही है? इसका सीधा जवाब है, नहीं। किसी भी चीज को, खासकर संस्कृति, आस्था और भावनाओं से जुड़ी बातों को जबरदस्ती थोपने से अक्सर इसका उल्टा असर होता है। जब आप अपने बेटे को मजबूरी में पूजा या किसी रिवाज में शामिल कराती हैं, तो उसके मन में उस परंपरा के प्रति सम्मान के बजाय नकारात्मक भाव पैदा हो सकते हैं। इससे चिड़चिड़ापन, विरोध, भावनात्मक दूरी और यहां तक कि परंपराओं से नफरत भी पनप सकती है। आपका बेटा अब 15 साल का है। यह वह उम्र है, जहां बच्चे हर चीज को चुनौती देते हैं, हर चीज पर सवाल करते हैं। उन्हें पसंद नहीं होता कि उन पर कोई भी चीज थोपी जाए। आपके लिए जो अनमोल है, उसे वह ‘बोरिंग और कंजर्वेटिव’ लग रहा है। उसे ये सब करने का कारण समझ में नहीं आ रहा है। यहां उसके विचारों और भावनाओं को रिजेक्ट करने के बजाय उसे समझने और इस पर बात करने की जरूरत है। परंपराओं से भागने के बच्चों के अपने बहुत से कारण हो सकते हैं। जैसेकि– बच्चाें को अपनी परंपराओं से कैसे जोड़ें? कोई भी चीज थोपने पर बोझ बन जाती है। इसलिए कोशिश करें कि रिवाजों को एक ड्यूटी की तरह नहीं, बल्कि एक एक्सपीरियंस की तरह पेश करें। अपने बेटे से बात करें और उससे पूछें कि उसे इनमें क्या बोरिंग लगता है। हो सकता है उसे लंबे पूजा-पाठ थकाने वाले लगते हों या उसे इनका मतलब समझ न आता हो। जब आप उसके नजरिए को बिना जज किए सुनेंगी, तो उसे लगेगा कि उसकी बात की अहमियत है। यहीं से जुड़ाव की शुरुआत होती है। घर में जिन भी परंपराओं का पालन किया जाता है, बेटे को उससे जुड़े तर्क, कारण और किस्से बता सकते हैं। उससे जुड़ी कहानियां सुना सकते हैं। जैसे यह पूजा सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि परिवार के साथ जुड़ने का एक जरिया है। जब बच्चे को रिवाज में कोई पर्सनल मीनिंग दिखने लगता है, तो उसका नजरिया बदलता है। याद रखिए, परंपराएं बचाने के लिए बच्चों को बांधना नहीं होता, उन्हें जोड़ना होता है। जब जुड़ाव बनेगा, तो परंपराएं खुद-ब-खुद आगे बढ़ेंगी। इसके लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें। आइए, इन पाॅइंट्स को विस्तार से समझते हैं। परंपराएं न मानने का कारण समझें सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि बच्चा मना क्यों कर रहा है। कई बार वह परंपराओं को इसलिए नकारता है क्योंकि उसे उनमें थकान और बोरियत होती है। जब आप उसका कारण समझने की कोशिश करेंगी तो उसे लगेगा कि उसकी सोच की कद्र की जा रही है। उसकी भावनाओं को स्वीकार करें अगर वह कहता है कि उसे पूजा या रिवाज बोरिंग लगते हैं, तो उसे तुरंत गलत न ठहराएं। उसकी भावना को मान्यता दें। जब बच्चा महसूस करता है कि उसकी भावनाएं सही हैं, तब वह खुलकर आपकी बात सुनने के लिए तैयार होता है। नॉन-जजमेंटल माहौल बनाएं उसे यह बिल्कुल भी न महसूस कराएं कि परंपराओं में कम रुचि रखना गलत है। घर में ऐसा माहौल रखें, जहां वह बेझिझक कह सके कि “मुझे पूजा से ज्यादा प्रसाद बांटना पसंद है।” अगर वह अपनी राय रखे तो उसे डांटने या ताना देने से बचें। जब बच्चा जज नहीं होता, तभी वह अपनी सोच, उलझन और सवाल खुलकर सामने रख पाता है। उसे खुद को व्यक्त करने की आजादी दें बच्चे को सवाल पूछने, असहमति जताने और अपनी राय रखने का मौका दें। उसकी राय का सम्मान करें। उसकी हर बात को गलत न ठहराएं और न ही ये कहें कि ‘हमें तुमसे ज्यादा पता है।’ हर बात पर उसे सुधारने की कोशिश न करें और न ही ज्यादा टोकें। अगर आप बच्चे का पक्ष सुनेंगी और उसका सम्मान करेंगी तो बच्चा आपसे जुड़ाव महसूस करेगा। अगर अपनी बात थोपेंगी, तो दूरियां बढ़ जाएंगी। हर बात तर्क से समझाएं टीनएजर्स हर चीज को ‘तर्क’ से समझना चाहते हैं। इसलिए उन्हें हर परंपरा के पीछे की कहानी बताएं। जब आप बताते हैं कि यह क्यों शुरू हुई, तो वह रस्म से आगे बढ़कर अर्थ को समझते हैं। इससे धीरे-धीरे लगाव बढ़ता है। बच्चों को एक्टिविटीज में शामिल करें बेटे को सिर्फ पूजा में बैठने का आदेश न दें। उसे पूजा से जुड़े काम भी सौंपें, जिम्मेदारियां भी दें। आप ऐसे काम भी दे सकती हैं, जिसमें उसकी रूचि हो या उसे मजा आता हो। जैसेकि बाजार जाकर पूजा से जुड़ी खरीदारी करना, जरूरी चीजों की लिस्ट बनाना। आप उसे पूजा के ‘चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफीसर’ का पद भी दे सकती हैं। सबकुछ अंत तक ठीक से निपटे, यह इंश्योर करना उसकी जिम्मेदारी होगी। काम अच्छा होने पर इनाम भी मिलेगा। जब बच्चे ओनरशिप महसूस करते हैं तो उनका जुड़ाव भी गहरा होता है। रस्मों को छोटा और मजेदार बनाएं बहुत लंबी रस्में बच्चों को थका देती हैं। इसलिए उन्हें छोटा, हल्का और रोचक बनाएं, ताकि वह बोझ नहीं, खुशी लगे। उनसे ये भी कह सकती हैं कि वह केवल शुरू के 15 मिनट और अंतिम 15 मिनट कार्यक्रम में शामिल हों। इसमें बच्चे की पसंद को शामिल करें परंपराओं को उसकी रुचि, जैसेकि टेक्नोलॉजी से जोड़ें। उसे त्योहारों के पलों को रिकॉर्ड करके परिवार के लिए एक छोटी रील/वीडियो बनाने को कहें। इससे वह आधुनिक तरीके से अपनी संस्कृति को पहचान देगा। परिवार के ट्रेडिशन में बदलाव करें अगर कोई बहुत पुरानी या लंबी रस्म आपके बेटे के लिए अर्थहीन है तो उसे थोड़ा बदलें। परंपराएं स्थिर नहीं होतीं, वे समय के साथ बहती हैं। बदलाव उन्हें कमजोर नहीं, मजबूत बनाता है। तुलना, ताने और दबाव से बचें उसकी तुलना कभी भी उसके चचेरे भाई-बहनों से न करें। दबाव डालने से वह भले ही मजबूरी में शामिल हो जाए, लेकिन उसके मन में नफरत पैदा हो जाएगी। ताने या प्रेशर से बचें। यह उसे हमेशा के लिए परंपराओं से दूर कर सकता है। बच्चे से बहुत ज्यादा उम्मीद न करें उसे अपनी तरह ‘पारंपरिक’ बनाने की अपेक्षा न रखें। अगर वह केवल 10 मिनट के लिए भी पूजा में शामिल होता है तो उसकी तारीफ करें। उसकी छोटी सी भागीदारी को भी सफलता मानें। यही सकारात्मक अनुभव उसे जीवन भर अपनी जड़ों से जोड़े रखेंगे। बच्चों को फोर्स करना कितना सही? कई माता-पिता यह मानते हैं कि अगर हम बच्चों को पूजा में बैठाएंगे, हवन में शामिल करेंगे तो वो अपने–आप परंपराओं से जुड़ेंगे। लेकिन मनोविज्ञान कहता है कि फोर्स करने से इंसान सीखता नहीं है, बल्कि इससे रेजिस्टेंस ही पैदा होता है। जब बच्चे को लगता है कि उसके साथ जबरदस्ती की जा रही है, उसकी इच्छा का सम्मान नहीं किया जा रहा है, उस पर चीजें थोपी जा रही हैं तो वह सिर्फ पूजा या उस पर्टिकुलर एक्टिविटी से ही दूर नहीं होता। वह उस पूरी संस्कृति और माहौल से ही दूर होने लगता है। धीरे-धीरे वह परंपराओं के प्रति नकारात्मक होने लगता है। यही वजह है कि कई बच्चे बड़े होकर या तो परंपराओं से पूरी तरह कट जाते हैं या फिर उन्हें सिर्फ एक औपचारिकता की तरह निभाते हैं। अंत में यही कहूंगी कि परंपराएं बच्चों को सिखाई नहीं जातीं, महसूस कराई जाती हैं। जब हम उन्हें प्यार, समझ और आजादी के साथ परंपराओं से जोड़ते हैं, तभी वे उन्हें अपनाते हैं। ……………………. पेरेंटिंग से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- 10 साल का बेटा पॉकेट मनी मांगता है: क्योंकि उसके दोस्तों को मिलती है, क्या इतने छोटे बच्चे को पैसे देना ठीक है? जब बच्चा अपने दोस्तों को पॉकेट मनी लाते हुए देखता है तो तुलना करना स्वाभाविक है। ऐसे में उसे डांटें नहीं, बल्कि समझाएं कि हर परिवार के नियम, जरूरतें और आर्थिक स्थिति अलग होती है। पूरी खबर पढ़िए…