‘बेटी हम शर्मिंदा हैं…तेरे कातिल जिंदा हैं’, जहानाबाद में प्रदर्शन:NEET स्टूडेंट रेप-मौत केस; पप्पू यादव का 35KM तक विरोध मार्च, बोले-बिहार में बेटियां सेफ नहीं

NEET छात्रा की मौत के मामले में जहानाबाद में 35 किलोमीटर लंबा विरोध मार्च निकाला जा रहा है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि दोषियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर उन्हें कड़ी सजा दी जाए। “बहन-बेटियों के सम्मान में पूरा बिहार मैदान में…” लिखे पोस्टर लेकर लोग सड़कों पर उतरे हैं। प्रदर्शनकारी काले झंडे लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। लोगों का कहना है, “बेटी, हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं।” प्रदर्शन में पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव भी पहुंचे। उन्होंने कहा, “हमने संसद में यह मुद्दा उठाया। आज विधानसभा में भी यह उठा। यह सिर्फ जहानाबाद की बेटी का सवाल नहीं है, बल्कि पूरे बिहार की बेटियों की सुरक्षा का सवाल है।” मीडिया से बातचीत में पप्पू यादव ने कहा- आप नरभक्षियों की चिंता मत कीजिए। बाज बहुत मजबूत होता है। जब कौआ लोल मारता है, तो बाज इतनी ऊंचाई पर उड़ जाता है कि कौए को वहां सांस लेने में भी दिक्कत होती है। गीदड़ों की चिंता मत कीजिए। अभी हमें बेटी की लड़ाई लड़नी है। बेटी के चरित्र को बदनाम करने वालों और इसमें शामिल नेताओं व पदाधिकारियों को बेनकाब करने की जरूरत है। उधर, इस मामले को लेकर दिल्ली में भी संसद के बाहर प्रदर्शन किया गया है। विपक्ष के नेताओं ने NEET छात्रा मौत मामले में आरोपी को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की मांग की। 6 जनवरी को छात्रा पटना के एक हॉस्टल में बेहोशी की हालत में मिली थी। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इस मामले की जांच पहले SIT कर रही थी, लेकिन अब राज्य सरकार ने CBI जांच की अनुशंसा की है। विरोध मार्च से जुड़ी तस्वीरें देखिए…. अब जानिए मार्च में शामिल लोगों ने क्या कहा अब यह समझिए कि SIT की जांच में कहां कमी रह गई? परिवार क्या सवाल उठा रहा है? और CBI के लिए मामला कितना चुनौतीपूर्ण होगा। आगे पढ़िए लीगल एक्सपर्ट हाईकोर्ट के वकीलों की राय पर आधारित रिपोर्ट…। 10 पॉइंट में समझिए CBI को जांच क्यों सौंपी गई…? 1. सरकार की सबसे बड़ी चुनौती 2 फरवरी से शुरू होनेवाला विधानसभा सत्र बिहार में 2 फरवरी से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र से ठीक पहले NEET छात्रा रेप-मौत केस की जांच CBI को सौंपने के फैसले को सियासी टाइमिंग से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार पर लगातार बढ़ते सवाल, SIT की नाकामी और DNA रिपोर्ट के बाद विपक्ष हमलावर है। ऐसे में सरकार के सामने सदन में हर दिन जवाब देने की मजबूरी बन रही थी। CBI जांच की सिफारिश कर सरकार ने यह संकेत दिया कि अब मामला राज्य पुलिस के हाथ में नहीं रहा। इससे विधानसभा के भीतर सीधे जवाबदेही से बचने का रास्ता खुल गया है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव लगातार सरकार को घेर रहे हें। उन्होंने लिखा, “बिहार का प्रशासनिक ढांचा भ्रष्ट और अयोग्य है, जो एक रेप-मर्डर केस भी नहीं सुलझा पा रहा।’ यही सब सवाल विधानसभा में उठने वाले हैं, इसलिए सीबीआई का रास्ता निकाल लिया गया। 2. SIT 22 दिन में किसी रिजल्ट पर नहीं पहुंची किसी भी संगीन अपराध में शुरुआती दो से तीन दिन ही निर्णय वाले होते हैं। यहां 22 दिन बीतने के बाद भी SIT यह तय नहीं कर पाई कि अपराध कब, कहां और किसने किया। केस थ्योरी बार-बार बदल रही है, पहले सुसाइड, फिर संदिग्ध मौत, फिर रेप। इससे पता चल रहा है कि जांच दिशाहीन चल रही है। DNA मिलान जांच का सबसे प्रमुख हथियार था अब वो भी फेल हो रहा है। 18 सैंपल लिए गए, जिनमें हॉस्टल मालिक, उसके बेटे, हॉस्टल से जुड़े लोग, मददगार, परिजन, लेकिन सभी के सैंपल फेल हो गए। इससे दो बातें निकलती हैं: या तो सही संदिग्धों तक पहुंच नहीं हुई, या सैंपलिंग/सीन-मैनेजमेंट में खामी रही। 3. एम्स की राय अभी तक आई ही नहीं, केस पहले ही ट्रांसफर अभी तक पूरी एसआईटी विशेषज्ञ राय (AIIMS) की रिपोर्ट का इंतजार रही थी। हर सवाल पर एक ही जवाब था, रिपोर्ट का इंतजार करिए। प्राइवेट पार्ट में चोट, कैथेटर थ्योरी, दवाओं का असर, मृत्यु का कारण सभी वहीं से स्पष्ट होना था। SIT अब तक सभी आवश्यक दस्तावेज एकसाथ एम्स को नहीं दे पाई। बिना विशेषज्ञ ओपिनियन के केस डायरी अधूरी है। अब बिना रिपोर्ट का इंतजार किए CBI को जांच सौंप दी गई। 4. सीन ऑफ क्राइम को देर से सील करना, सबूत कमजोर हुए FIR में देरी और हॉस्टल कमरे का समय पर सील न होना। CCTV, DVR का फॉरेंसिक ऑडिट देर से होना, ये सब शुरुआती दौर में ही चूक हुई, इससे सबूत मिट गए। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में प्राइवेट पार्ट में ताजा चोटें, शरीर पर रगड़ के निशान के बावजूद शुरुआती दिनों में सुसाइड पर ही जोर रहा। परिवार का आरोप है कि सुसाइड मानने का दबाव बनाया गया, बार-बार पूछताछ हुई और सुरक्षा नहीं मिली। 5. सीसीटीवी पूरी तरह स्पष्ट नहीं, देर से पहुंची पुलिस 5 जनवरी रात 9:30 से 6 जनवरी दोपहर 2 बजे तक सबसे संदिग्ध समय रहा। यही वो टाइम था, जब छात्रा अपने घर से हॉस्टल पहुंची और पिता से फोन पर बात की। लेकिन इन 17 घंटों का सीसीटीवी पुलिस शायद नहीं जुटा पाई है। या स्पष्ट नहीं है, जिससे यह नहीं पता चल पा रहा कि छात्रा के कमरे का दरवाजा किसने तोड़ा और कब तोड़ा। कमरे में कौन गया और कौन बाहर निकला। 6. सियासत शुरू, लोगों का भरोसा पुलिस से उठता जा रहा लीगल एक्सपर्ट कहते हैं, न्याय केवल होना नहीं चाहिए, होता दिखना भी चाहिए। नीट छात्रा के मामले में पुलिस शुरू से ही ढीला रवैया अपनाती रही। पुलिस की प्राइमरी थ्योरी पर ही एसआईटी आगे बढ़ती रही। यही कारण है कि सियासत तेजी से शुरू हो गई। धरना-प्रदर्शन हुए और अब जिम्मेदारी से बचने के लिए मामला सीबीआई को सौंप दिया गया है। अब जानिए इस पूरे मामले में CBI के सामने क्या चुनौतियां होंगी 1. समय बीतने से साक्ष्य कमजोर होते जा रहे CBI को सबसे बड़ी चुनौती समय की देरी से मिलेगी। घटना को कई हफ्ते बीत चुके हैं। डिजिटल डेटा ओवरराइट हो सकता है, गवाहों के बयानों में अंतर आ सकता है, फिजिकल साक्ष्य की ताजगी कम हो चुकी है। CBI को अब रीकंस्ट्रक्शन के आधार पर केस बनाना होगा, जो हमेशा मुश्किल होता है। 2. एसआईटी की जांच की कमियों को दूर करना CBI को SIT की शुरुआती गलतियों के बावजूद केस को दोबारा खड़ा करना होगा। सीन ऑफ क्राइम, सैंपलिंग और टाइमलाइन की खामियों को बचाव पक्ष कोर्ट में हथियार बनाएगा। CBI को यह दिखाना होगा कि नई जांच कैसे निष्पक्ष और वैज्ञानिक है, ताकि पुरानी थ्योरी केस को न डुबो दें। 3. परिवार-गवाहों का भरोसा जीतना परिवार और कुछ गवाह पहले ही दबाव और डर की बात कह चुके हैं। CBI के लिए जरूरी होगा कि वह गवाहों की सुरक्षा और परिवार का विश्वास बहाल करे। बिना भरोसे के कोई भी गवाह खुलकर बयान नहीं देगा। यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती है, सिर्फ कानूनी नहीं। 4. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और एम्स रिपोर्ट का कंपरीजन CBI को पोस्टमॉर्टम, FSL और एम्स ओपिनियन सबको साइंटिफिक तरीके से जोड़ना होगा। मेडिकल राय में जरा-सी गड़बड़ी बचाव पक्ष को संदेह का लाभ दे सकती है। यह सबसे तकनीकी और संवेदनशील चुनौती होगी। CCTV, कॉल डिटेल, टावर डंप और मोबाइल डेटा इन सबका टाइम-सिंक जरूरी है। अगर एक भी डेटा सेट मेल नहीं खाया, तो पूरी डिजिटल थ्योरी कमजोर पड़ जाएगी।

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