भास्कर न्यूज | जालंधर शहर में बाल भिक्षा की समस्या को खत्म करने के लिए डीसी डॉ. .हिमांशु अग्रवाल ने इसमें शामिल बच्चों के पुनर्वास के लिए संवेदनशील और ठोस प्रयास करने पर जोर दिया। जिला प्रशासकीय परिसर में प्रोजेक्ट जीवनजोत 2.0 की समीक्षा बैठक में कहा कि बाल भिक्षा केवल कानूनी मुद्दा नहीं है, बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टि से भी गंभीर चुनौती है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि इस समस्या के समाधान के लिए बाल भिक्षा में शामिल व्यक्तियों पर सख्त कार्रवाई करने के भिक्षा में शामिल बच्चों की पहचान कर उनकी सुरक्षा, उचित देखभाल, काउंसलिंग और पढ़ाई के लिए ठोस उपाय सुनिश्चित किए जाएं, ताकि उन्हें अच्छा भविष्य दिया जा सके। उन्होंने कहा कि माता-पिता को कौशल प्रशिक्षण आदि उपलब्ध करवाया जाए, ताकि उनके रोजगार का रास्ता साफ हो सके और वह अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकें तथा बच्चों को भिक्षा मांगने की ओर धकेलने की मजबूरी खत्म हो सके। बाल भिक्षा को रोकने संबंधी अभियान में एनजीओ को शामिल किया जाए, जो इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने संदिग्ध मामलों में डीएनए टेस्ट करवाने का निर्देश भी दिया, ताकि बच्चों की पहचान और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। जिले में नवंबर और दिसंबर 2025 तथा 15 जनवरी 2026 तक चलाए गए छापेमारी अभियान के दौरान 36 बच्चों को रेस्क्यू किया गया है। इस मौके पर जिला प्रोग्राम अधिकारी मनजिंदर सिंह, जिला बाल सुरक्षा अधिकारी अजय भारती, डॉ.राकेश चोपड़ा भी मौजूद थे। बच्चों से भीख मंगवाने पर 5 से 7 साल तक सजा जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 की धारा 76 के अनुसार बच्चों को भिक्षा में उपयोग करने वालों को सख्त सजा हो सकती है। किसी व्यक्ति द्वारा बच्चे को भिक्षा में उपयोग करने पर 5 साल तक की सजा और एक लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति द्वारा बच्चे को भिक्षा में उपयोग के लिए उसके अंग काटे जाते है तो उस व्यक्ति को 7 से 10 साल तक की सजा और 5 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है।