7 दिन बाद 7 मजदूरों का शव पहुंचा मोतिहारी:8वें की दिल्ली में इलाज के दौरान मौत, काली पन्नियों में पैक कर लाए गए बॉडी के टुकड़े

राजस्थान के भिवाड़ी स्थित पटाखा फैक्ट्री में हुए विस्फोट में जान गंवाने वाले मोतिहारी के सात मजदूरों का शव रविवार दोपहर 11 बजे मोतिहारी पहुंचा। वहीं सुबह दिल्ली में इलाज के दौरान आठवें मजदूर की भी मौत हो गई है। 3 मजदूर अब भी इलाजरत है, जिनमें एक की हालत गंभीर है। 6 दिनों के लंबे इंतजार के बाद शनिवार की शाम साढ़े 6 बजे सातों बॉडी को उनके परिजनों के साथ एम्बुलेंस से मोतिहारी के लिए रवाना किया गया था। रविवार की सुबह 11 बजे बॉडी मोतिहारी सदर अस्पताल पहुंची। परिजन के पहुंचने पर उन्हें बॉडी सौंप दी गई। इसके बाद सातों मजदूर का शव एम्बुलेंस की मदद से पैतृक गांव पहुंचा, जहां चीख-पुकार मच गई। फिर परिवार और गांव वालों ने मृतक मजदूरों का अंतिम संस्कार किया। पहले कुछ तस्वीरें देखिए… बसों से अपने-अपने गांव लौट रहे लोग मृतकों के परिजनों ने बताया कि आवश्यक कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद शवों को एम्बुलेंस से घर लाया गया है। राजस्थान में मौजूद अन्य लोग बसों से अपने-अपने गांव लौट रहे हैं। यह हादसा 16 फरवरी को भिवाड़ी की पटाखा फैक्ट्री में हुआ था। पटाखा निर्माण के दौरान अचानक हुए जोरदार विस्फोट में पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी के सात मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई थी। दातों से किया गया DNA टेस्ट धमाका इतना खतरनाक था कि सातों मजदूरों की लाशें 20 से 30 मीटर दूर तक जाकर गिरी थी। किसी का हाथ कहीं और मिला, किसी का पैर दूर जाकर गिरा… जो मिला वो सिर्फ कंकाल जैसे जले हुए टुकड़े थे। दो दिनों तक बॉडी पार्ट्स को जोड़कर सभी के दातों से DNA टेस्ट किया गया। अब यही बचे हुए टुकड़े काली पन्नियों में पैक कर रविवार को मोतिहारी लाया गया है। इसके बाद इन्हीं पन्नियों में सभी का अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा। मजदूरों की मां-पत्नियों और बच्चों के जुबान पर सिर्फ एक ही बात है, अब हम उन्हें अंतिम बार भी नहीं देख पाएंगे। हम अपने बेटे, पति या पिता का चेहरा देखे बिना कैसे पहचान करेंगे? मृतकों में हरसिद्धि थाना क्षेत्र के सिकरगंज गांव के पांच मजदूर, घोड़ासहन थाना क्षेत्र का एक मजदूर और एक अन्य मजदूर शामिल हैं। हादसे के बाद से परिजन अपने प्रियजनों के शवों का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। शवों के मोतिहारी पहुंचने की सूचना मिलते ही गांवों में शोक का माहौल छा गया है। परिवार के सदस्यों का रो-रोकर बुरा हाल है और स्थानीय लोग उन्हें ढांढस बंधा रहे हैं। शवों के गांव पहुंचने के बाद उनके अंतिम संस्कार की तैयारी की जा रही है। अब सिलसिलेवार तरीके से पढ़िए पूरी घटना… बॉडी पाट्स को अलग-अलग काली पन्नी में भरकर लाया गया 16 फरवरी(सोमवार) को राजस्थान के भिवाड़ी में सुबह 9 बजे पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट हो गया। इस धमाके में 7 मजदूरों की मौत हो गई। शवों के चिथड़े होने के कारण कई परिवार वालों का DNA मैच किया गया। इसमें से सभी शवों की पहचान बुधवार की शाम मोतिहारी के निवासी के रूप में हुई। हालांकि, बॉडी के टुकड़े-टुकड़े होने की वजह से सभी पाट्स पूरी तरह से नहीं मिल पाएं हैं। किसी शव के 10 टुकड़े हुए हैं, तो किसी का सिर्फ सिर बचा है। बाकी के पाट्स गायब हैं। इस वजह से घटनास्थल से FSL की टीम द्वारा कलेक्ट किए गए बॉडी पाट्स को अलग-अलग काली पन्नी में भरकर परिवार वालों को सौंपा जाएगा। वहीं, शव का इंतजार कर रहे परिवार वालों का कहना है, 7 दिनों से हमारे घर में चूल्ह तक नहीं जला है। परिवार के बच्चे से लेकर बूढ़े तक भूखे-प्यासे बैठे हैं। सभी को बिस्किट और फास्ट फूड के सहारे रखा जा रहा है। टुकड़ों में पहुंचे शव की घरवाले कैसे करेंगे पहचान मृतक मंटू के फूफा का कहना है, ‘हमारे घर की हालत बहुत खराब है। भतीजे के शव को पॉलिथिन में भेजा जाएगा। पूरा शरीर नहीं आएगा? अब हम अपने बच्चे को आखिरी बार कैसे देखें?’ मंटू की मां विंदा देवी की स्थिति और भी खराब हो गई है। वे जोर-जोर से रोते हुए कहती हैं, ‘मेरा बेटा एक महीना पहले ही गया था। वहां से फोन पर कहता था कि बारूद के बीच काम होता है, हमारा मन नहीं लगता है। वो काम छोड़कर घर आने वाला था, लेकिन अब टुकड़ों में पॉलिथिन में बंद उसका शव घर आएगा।’ यह कहते-कहते वे बेहोश हो गईं। इसी गांव में दूसरा घर रवि का है, जहां मातम और भय दोनों छाया हुआ है। उसकी मां रीता देवी चीखते हुए बार-बार एक ही बात कहती रहीं, टुकड़ा शरीर आएगा? ई उम्र में हमका का देखे के रह गइल? रवि के पिता रामदत्त राम को संभालना मुश्किल हो रहा था। वह बार-बार कह रहे थे, बच्चा को कंधा देने के लिए शरीर चाहिए… यह कैसी मौत है? दीवारों में धंसे शव गांव के लोग बताते हैं, विस्फोट इतना भीषण था कि मजदूरों के शरीर कई दिशाओं में बिखर गए। कुछ अवशेष दीवारों में धंसे मिले, कुछ मशीनों के ऊपर। शवों की पहचान डीएनए और कपड़ों के टुकड़ों से हुई है। मंटू घर लौटकर अपने पिता के लिए किराना दुकान खोलना चाहता था। वहीं, रवि एक मोटरसाइकिल खरीदने और अपने बूढ़े मां-बाप के लिए पक्का घर बनाने का सपना देख रहा था। अब वही सपने पॉलिथिन के साथ गांव लौटें। गरीब के बच्चे ही क्यों मरते हैं? इस हादसे को देख कई परिवारों ने तय कर लिया है कि वे अब अपने बच्चों को खतरे वाली मजदूरी पर बाहर नहीं भेजेंगे। लोग बार-बार कह रहे हैं कि यह सिर्फ हादसा नहीं, गरीब मजदूरों के साथ किया गया जुल्म है। गांव में हर तरफ एक ही बात दोहराई जा रही है, सरकार ऐसी फैक्ट्रियों को बंद क्यों नहीं कराती? क्यों गरीब के बच्चे ही मरते हैं? हादसे के बाद की PHOTOS…

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