रंग बनाना बहुत खतरनाक है। थोड़ी सी चूक हो जाए तो आंख चली जाएगी। तेजाब की एक बूंद और कांच का बुरादा आंख में पड़ जाए तो डॉक्टर भी हाथ खड़े कर लेगा। हमारी फैक्ट्री में 5 मिनट नहीं रुक पाएंगे। तेजाब और केमिकल के रिएक्शन की गंध ऐसी होती है कि आपका फेफड़ा चोक कर जाएगा, इसलिए 90% मार्जिन पर धंधा करते हैं। आप लोगों की सेहत की चिंता कीजिएगा तो कर चुके धंधा। आंख बंदकर रंग लीजिए और होली पर पैसा कमाइए। हमारा बनाया रंग बिहार में ही नहीं यूपी, बंगाल से लेकर झारखंड तक जाता है। यह दावा टॉयलेट क्लीनर और कांच के पाउडर में केमिकल मिलाकर खतरनाक रंग तैयार करने वाले एजेंट्स कर रहे हैं। एजेंट्स पूरी प्रॉसेस बताते भास्कर के खुफिया कैमरे में कैद हुए हैं। भास्कर इन्वेस्टिगेशन टीम ने व्यापारी बनकर 1000 पेटी रंग की डील की। ऐसे धंधेबाजों को एक्सपोज करने के लिए यह भास्कर का ऑपरेशन डर्टी होली था। पार्ट-1 में पढ़िए और देखिए होली में कमाई की लालच में आपकी सेहत से खिलवाड़ करने वाले धंधेबाजों की कहानी.. 5 महीने पहले से तैयार होने लगता है खतरनाक रंग भास्कर की इन्वेस्टिगेशन टीम को इनपुट मिला कि बिहार में बड़े पैमाने पर केमिकल वाले रंगों को तैयार किया जा रहा है। बिहार के साथ यूपी, बंगाल और झारखंड में केमिकल वाले रंगों की सप्लाई होती है। इसकी तैयारी 5 महीने पहले से हो जाती है। बिहार का वैशाली जिला इसका सेंटर पॉइंट है। यहां कई गांव ऐसे हैं जहां हर घर में इसकी फैक्ट्रियां चलती हैं। इनपुट के बाद भास्कर की इन्वेस्टिगेशन टीम वैशाली के इंडस्ट्रियल एरिया में पहुंची। 20 किलोमीटर दूर बिदुपुर गांव का क्लू मिला जहां अधिकतर घरों में नकली रंगों की फैक्ट्रियां चलती हैं।
पटना का व्यापारी बनकर बिरदुपुर गांव पहुंचे अंडरकवर रिपोर्टर की मुलाकात गायत्री से हुई। वो भी केमिकल वाले रंग की फैक्ट्री चलाती है। गायत्री ने बताया कि हमारी फैक्ट्री का रंग पटना नहीं जाता है। हर फैक्ट्री का माल कहां जाएगा यह हम लोगों ने आपस में तय कर रखा है, जिससे पुलिस या कोई जांच करने यहां नहीं पहुंचे। रिपोर्टर – रंग चाहिए था? गायत्री – कहां से आए हैं, कहां सप्लाई करना है? रिपोर्टर – पटना से आए हैं, आसपास के इलाकों में ही देना है। गायत्री – पटना में तो यहां से रंग नहीं जाता है, हमारा माल कहीं और जाता है। रिपोर्टर – नहीं समझा? गायत्री – हम लोगों की आपस में बातचीत है, सहमति से काम होता है। रिपोर्टर – पैसे दे रहे हैं, आप ही दे दीजिएगा कहां खोजने जाएंगे। गायत्री – लग रहा है आप पहली बार आए हैं, इसलिए पता नहीं है। रिपोर्टर – जी, पहली बार इस बार होली से काम शुरू कर रहे हैं। गायत्री – यहां हर फैक्ट्री का माल अलग-अलग जगह जाता है ताकि कहीं से पकड़ा नहीं जाए। रिपोर्टर – अच्छा, आपकी फैक्ट्री का रंग कहां जाता है। गायत्री – हम लोग मुंगेर, जमुई और झारखंड भेजते हैं, आप मनीष के घर में पता कीजिए।
गायत्री ने डील के दौरान मनीष का नाम लिया। मनीष भी नकली रंगों की फैक्ट्री चलाता है। काफी छानबीन के बाद जब हम मनीष के घर पहुंचे तो वह नहीं मिला। यहां हमारी मुलाकात मनीष के भाई रंजीत से हुई। रंजीत ने बताया कि वह मनीष के साथ मिलकर रंग की फैक्ट्री चलाता है। रंजीत फैक्ट्री का काम देखता है, सप्लाई के साथ मार्केटिंग का पूरा काम मनीष के जिम्मे है। रिपोर्टर – सप्लाई करने के लिए रंग चाहिए? रंजीत – रंग तो पूरा खत्म हो गया है, आप काफी देरी से आए हैं। रिपोर्टर – अभी तो होली दूर है, इतना जल्दी खत्म हो गया। रंजीत – आप कहां काम से आए हैं, कहां सप्लाई करेंगे? रिपोर्टर – हम पटना से आए हैं, आसपास के एरिया में ही काम करेंगे। रंजीत – हम डायरेक्ट आपको रंग नहीं दे सकते हैं। रिपोर्टर – क्यों? रंजीत – पटना में हमारा माला जाता है, वहीं से लेकर आप सप्लाई कीजिए। रिपोर्टर – वहां किससे बात करनी होगी? रंजीत – वहां एक आदमी के पास मेरा माल जाता है, उसी से लेना होगा। रिपोर्टर – यहां से ही दे दीजिए, पैसा दे रहे हैं। रंजीत – नहीं हम लोग ऐसा नहीं करते हैं, आप वहीं से लीजिए। रिपोर्टर – पटना के ग्रामीण क्षेत्र में सप्लाई कर सकते हैं क्या? रंजीत – हां, कर सकते हैं, ग्रामीण इलाकों में कोई दिक्क्त नहीं है। रिपोर्टर – इसके लिए क्या प्रॉसेस है बताइए? रंजीत – मार्केटिंग का पूरा काम मेरा भाई मनीष देखता है, आपकी बात करा देते हैं। रंजीत ने मनीष से फोन पर कराई डील कारोबारी बनकर पहुंचे अंडरकवर रिपोर्टर ने जब बातचीत में रंजीत पर विश्वास जमा लिया तो वह अपने भाई मनीष से फोन पर डील कराने को तैयार हो गया। मनीष ने फोन पर नंकली रंग की पूरी डील की और नकली रंग के पूरे कारोबार का खुलासा किया। मनीष ने ही खतरनाक केमिकल से कैसे रंग बनाया जा रहा है, इसका भी खुलासा किया। इस दौरान मनीष को लगा कि कोई बड़ी पार्टी है, इसलिए उसने खुलकर बात की।
तेजाब वाले रंग के पूरे प्रॉसेस का खुलासा करने के लिए अंडरकवर रिपोर्टर ने फोन पर बातचीत के दौरान ही मनीष पर विश्वास जमा लिया। कई दिनों तक रिपोर्टर मनीष के संपर्क में रहे। हालांकि मनीष कई दिनों की बातचीत के बाद भी मिलने को राजी नहीं हो रहा था। काफी प्रयास के बाद वह बिदुपुर गांव में रिपोर्टर से मिलने को तैयार हुआ। रिपोर्टर जब मनीष की फैक्ट्री पहुंचा तो एक छोटे से कमरे में पूरा धंधा चल रहा था। खतरनाक केमिकल और तेजाब की गंध से सांस लेना भी मुश्किल था। रिपोर्टर – बताइए रंग कैसे मिलेगा? मनीष – देखिए इस साल का पूरा माल तो मार्केट में चला गया है। रिपोर्टर – इतना जल्दी, पूरा माल चला गया। मनीष – यह घर पर रखने चाली चीज नहीं है, रेड होगी तो मामला फंस जाएगा। रिपोर्टर – दिक्क्त क्या है? मनीष – खतरनाक केमिकल है, ओरिजनल रंग नहीं है, इसलिए खतरा है। रिपोर्टर – जो भी पैसे हो बताइए, नहीं तो होली में हमारा धंधा खराब हो जाएगा। मनीष – पहले कहां से आपका माल आता था। रिपोर्टर – यूपी से लाकर सप्लाई करते थे, लेकिन मार्जिन अधिक नही है। मनीष – इस बार तो संभव नहीं लग रहा है, बहुत ऑर्डर है। रिपोर्टर – पैसा जो भी हो दे दिया जाएगा, आप बस जुगाड़ कर दीजिए। मनीष – रंग बनाने का काम तो 5 महीने पहले शुरु हो जाता है, इस साल ऑर्डर दीजिए अगली होली में देंगे। रिपोर्टर – तो आप रंग कैसे दीजिएगा इस साल, हम लोगों के लिए दिक्कत होगी। मनीष – हमारा माल बगहा, मोतिहारी और यूपी तक जाता है, वहीं से बोरा में छिपाकर दे देंगे। रिपोर्टर – आप छिपाकर रंग क्यों दे रहे हैं, ज्यादा दिक्कत है क्या? मनीष – यह काफी खतरनाक केमिकल से बनता है, ओरिजनल थोड़ी है। रिपोर्टर – इस पर तो बड़े ब्रांड का नाम लिखा है। मनीष – हां, हम लोग ब्रांड की कॉपी कर उसी तरह से बनाते हैं ताकि पकड़ में नहीं आए। रिपोर्टर – कोई दिक्क्त नहीं है, आप तो व्यवस्था करा दीजिए। मनीष – आप पटना नहीं, मोतिहारी की तरफ बेचिए, वहां कोई नहीं पूछेगा। रिपोर्टर – माल तो पर्याप्त मिल जाएगा ना? मनीष – एक बार सेटिंग हो गई तो जितनी चाहिएगा उतनी पेटी दे देंगे। रिपोर्टर – ठीक है, आप देख लीजिए। मनीष – बस यह नहीं बताना, कहां बन रहा है, कौन दे रहा है। फिर आप जहां चाहिए बेचिए। मनीष की जुबानी तेजाब से रंग बनाने की कहानी..
टॉयलेट क्लीनर और खतरनाक केमिकल से बनने वाले रंग की पूरी प्रॉसेस समझने के लिए हमारे लिए सबसे बड़ा किंगपिन मनीष निकला। मनीष ही सबसे बड़ा कारोबारी है जो 4 राज्यों में ऐसे रंग की सप्लाई करता है। वह गांव जितनी भी फैक्ट्रियां घरों में अवैध रूप से चलती है सबके लिए सुरक्षा का काम करता है। वह मार्केट में सेटिंग से लेकर गांव में हर घर को सेफ करने के लिए अपना नेटवर्क भी काफी बड़ा कर रखा है। वैशाली के बिदुपुर गांव में अपनी फैक्ट्री पर बैठकर मनीष ने रिपोर्टर से केमिकल वाले रंगों की पूरी प्रॉसेस और सप्लाई चेन बताई। मनीष की जुबानी तेजाब वाले रंग बनाने की पूरी कहानी जानिए..। हम दो तरह के रंग के पैकेट तैयार करते हैं, एक 10 और 8 पुड़िया वाली पैकिंग होती है। जैसा ऑर्डर रहता है, उस तरह से रंग तैयार करते हैं। हम राजेंद्र कंपनी का डुप्लीकेट तैयार करते हैं। मेरे पैकेट का डिजाइन एकदम राजेंद्र कंपनी जैसा रहता है, सिर्फ राजेंद्र की जगह रविंद्र लिख देते हैं। दूसरा राजेश ब्रांड से बनाते हैं, जो राकेश कंपनी का डुप्लीकेट है। राकेश और राजेंद्र अपने पैकेट में 10 पुड़िया भरते हैं और हम 8 पुड़िया भरते हैं। राकेश और राजेंद्र हाई क्वालिटी का रंग भरते हैं, इसलिए उनका माल महंगा आता है और हम आपको जिस तरह का कहेंगे उस तरह का भरकर दे देंगे। आपको मेरा माला कई गुना सस्ता पड़ेगा, मार्केट में बढ़िया मुनाफा भी कमाएंगे। हम अपने रंग में 10 किलो खाद मिलाते हैं और 1 किलो ऑरिजिनल रंग मिलाते हैं। आप जितना कहेंगे उतना मिलाकर बना देंगे। आप मार्केट में ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं तो एक किलो रंग में 10 किलो खाद मिला देंगे। आपको मुनाफा भी बढ़िया होगा और आपके माल को कोई पकड़ भी नहीं पाएगा। रंग में ऑरिजिनल जैसी चमक रहेगा, ज्यादा खाद रहने पर नहीं चमकेगा। पुड़िया फाड़कर रंग की चमक दिखाते हुए कहा – जो चमक रहा है वही ऑरिजिनल रंग है, बाकी सब खाद है। इसको और भी चमकीला बनाने के लिए इसमें कांच पीसकर उसका पाउडर डालते हैं। किसी के भी पकड़ में नहीं आएगा, लोग तो सोच भी नहीं सकते हैं कि रंग भी नकली होता है। टॉयलेट क्लीनर और कांच के पाउडर का इस्तेमाल खाद क्या होता है और इसे कैसे तैयार करते हैं? इस सवाल पर मनीष ने कहा – आरारोट के साथ स्प्रिट, मैजेंटा, तारपीन और अलग-अलग केमिकल मिलाया जाता है। टॉयलेट क्लीनिंग के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एसिड (काफी तेज और खतरनाक) मिलाया जाता है। हम लोग जो बनाते हैं उसमें रंग की मात्रा ना के बराबर होती है। अगर 10 किलो रंग तैयार करना है तो 150 ग्राम असली रंग मिलाते हैं बाकी सब केमिकल होता है। ऑरिजिनल रंग बनाने में 50 प्रतिशत आरारोट और 50 प्रतिशत असली रंग होता है। लेकिन हम आरारोट में केमिकल, तेजाब, स्प्रिट, तारपीन का तेल मिलाकर खाद बना देते हैं। फिर उसमें अलग-अलग रंग के साथ मिलाकर इसकी पुड़िया बनाई जाती है। अगर ऑरिजिनल बनाएंगे तो मार्केट में महंगा सप्लाई करना पड़ेगा, तो कोई नहीं खरीदेगा। हमारा माल दुकानदार को भी सस्ता पड़ता है, इसलिए दुकानदार भी खूब बेचते हैं। सब खेल मुनाफे का है। 150 ग्राम रंग से 10 किलो रंग तैयार मनीष ने बताया, हम लोग मुनाफे के लिए काम करते हैं। हमारा रंग किसको नुकसान कर रहा है किसको फायदा कर रहा है इसकी चिंता करने लगे तो कर चुके धंधा। आजकल बाजार में क्या ओरिजनल मिल रहा है, आप ही बता दीजिए। सबसे महंगा रंग और अरारोट आता है। 10 किलो केमिकल वाला रंग बनाने के लिए हम असली रंग 150 ग्राम और 850 ग्राम अरारोट मिलाते हैं, बाकी 9 किलो अपने हाथ से बनाई खाद मिला देते हैं। आप जितने का माल बनवाना चाहते हैं, उतनी खाद मिलाकर बना देंगे। आपको 1 किलो रंग में 15 किलो खाद मिलाकर बनाकर रंग बनाकर दे देंगे। आप जिस ब्रांड के डब्बे में पैक करवाना चाहते हैं, उस ब्रांड के डब्बे में पैक करके आपके लोकेशन तक भेज देंगे। किसी भी बड़ी कंपनी के ब्रांड का हुबहू बॉक्स बनाकर आपको दे देंगे। मार्केट में आपको कोई नहीं पकड़ेगा, क्योंकि कोई इस बात पर उतना जोर देता ही नहीं है कि रंग भी नकली होता है। सभी लोग खाने-पीने वाली चीजों पर ध्यान देते हैं क्योकि इसमें ही अधिकतर चीजें नकली होती हैं। शहर में नहीं, देहात में बेचिएगा, खूब कमाइएगा। ब्रांडेड कंपनियों से बचने का रास्ता बताया जिस ब्रांड के नाम पर नकली और केमिकल वाले रंग का कारोबार हो रहा है उससे बचने के लिए भी मनीष ने कई उपाए बताए। मनीष ने कहा – आपको राजेंद्र और राकेश वाले दिक्कत कर देंगे, क्योंकि डिब्बे का डिजाइन उसी दोनों का है। हम मार्केट में उसी की कॉपी करते हैं। लोग पकड़ नहीं पाते हैं कि कौन ऑरिजिनल है और कौन नकली है। डिब्बा देखकर कोई नहीं बता सकता है कि कौन असली है और कौन नकली। हम 15 साल से ऐसे ही बेच रहे हैं। आप पटना के अलावा दूसरी जगह बेचिए, कोई दिक्कत नहीं होगी। पटना में मेरा एक आदमी है जो बेच रहा है, वह अपना चोरी-छिपे बेच लेता है। यहां जितने घर में रंग बनता है, सारे घरों के अलग-अलग जिले में ग्राहक सेट हैं। मेरा माल पूरे बिहार में जाता है, लेकिन वहां भी इलाका बंटा है। पटना, बेतिया, मोतिहारी के चकिया, गोपालगंज, दरसिंहसराय में जाता है। मेरे चाचा भी इसका कारोबार करते हैं, वह गजेन्द्र नाम से पैकिंग करते हैं। उनका माल समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी जाता है।
मनीष से डील के दौरान ही उसके चाचा सुबोध के बारे में इनपुट मिला। सुबोध नकली रंग के कारोबार का बड़ा खिलाडी है। वह 30 साल से नकली रंग बना रहा है। भास्कर के अंडरकवर रिपोर्टर व्यापारी बनकर जब सुबोध के पास पहुंचे तो उसने चौंकाने वाला खुलासा किया। रिपोर्टर – पटना से रंग के लिए आए हैं, गांवों में सप्लाई करना है। सुबोध – पटना में हमारा माल नहीं जाता है, वहां मनीष की सप्लाई है। रिपोर्टर – आप कोई जुगाड़ कर दीजिए, मनीष के पास रंग नहीं बचा है। सुबोध – पैसा जमा कर दीजिए, अगले साल जितना चाहिएगा आपको माल मिल जाएगा। रिपोर्टर – इस सान का क्या होगा, होली में कैसे धंधा चलेगा। सुबोध – इस बार मनीष से रंग लेकर काम चलाइए, अगले साल से हम दे देंगे। रिपोर्टर – ठीक है, हम चाहते हैं आपसे डील हो जाए ताकि बाद में कोई दिक्क्त नहीं हो। सुबोध – आप पैसा दे दीजिए फिर जब फैक्ट्री चलेगी आपको बुला लेंगे। रिपोर्टर – आप फैक्ट्री दिखा दीजिए ताकि हम लोग निश्चिंत हो जाएं। सुबाेध – आप हमारी फैक्ट्री देख सकते हैं, फोटो वीडियो मत लीजिएगा। 5X5 के कमरे में मशीनों से बन रहे तेजाब वाले रंग अंडर कवर रिपोर्टर के काफी रिक्वेस्ट के बाद सुबोध अपनी फैक्ट्री दिखाने को तैयार हो गया। फैक्ट्री के नाम पर एक छोटा सा 5X5 का कमरा था। कमरे में दो किनारे पर डेढ़ से दो फीट की दूरी पर दो मशीनें लगी थीं। दोनों मशीनें बिजली से चल रही थीं। शोर और डस्ट से कमरे में एक सेकेंड रुकना मुश्किल था। केमिकल और तेजाब आंख में मिर्ची की ताह लग रही थी। मुंह पर कपड़ा रखकर रिपोर्टर ने सुबोध से पूरे प्रॉसेस को समझने की कोशिश की। सुबोध ने बताया कि इस जगह पर रंग में स्प्रिट और तेजाब मिलाया गया है, इसलिए यह आंखों में लगता है। इसकी 1 से 2 ग्राम की पुड़िया बनती है, इसलिए पुड़िया में कुछ नहीं होता है। यह माल 1 किलो रंग में 10 किलो खाद वाला है। 3 से 4 मिनट में ही रिपोर्टर की हालत खराब हो गई। आंख में तेज-तेज जलन होने लगी। थोड़ी-थोड़ी देर पर छिंकें आने लगीं। रिपोर्टर की हालत देख सुबोध उसे अपने घर ले गया और वहां नकली रंग के बारे में और बड़ा खुलासा किया। रंग नहीं तेजाब है, हर दिन नहीं लगा सकते सुबोध ने बताया – हमारा मोहल्ला नकली रंग की फैक्ट्री की खान है। यहां से ही बिहार, यूपी, झारखंड और बंगाल में माल जाता है। इस मोहल्ले में कोई भी ऑरिजनल रंग नहीं बनाता है। सभी घरों में नकली रंग ही बनाए जाते हैं। अलग-अलग ब्रांड का यहां नकली रंग बनाया जाता है। पूरे बिहार और आस-पास के राज्यों में यहां से ही माल जाता है। बिहार के साथ बाहर से आने वाले कारोबारी भी यहीं से रंग ले जाते हैं। रंग को बनाने में 5 महीने का समय लग जाता है। अरारोट और गुलाबी रंग रोरा माईन (असली रंग) के साथ खाद मिलाकर लाल रंग बनाया जाता है। जिसमें ज्यादा खाद पड़ता है वह ज्यादा हार्ड होता है, जिसमें कम खाद पड़ती है वह बढ़िया क्वालीटी की होती है। इसी तरह हरा रंग भी बनाया जाता है। ज्यादा लाल होने के लिए ज्यादा मात्रा में रोरा माइन और अरारोट होता है। यहां जो बनता है उसमें खाद ज्यादा होती है। यह खराब क्वालीटी का रंग होता है। यहां तो सब नकली ही होता है। खाद बनाने का काफी लंबा प्रॉसेस होता है। उसमें बहुत तरह का खतरनाक केमिकल पड़ता है। यह काफी नुकसानदायक होता है। टॉयलेट का तेजाब आंखों में पड़ जाए तो समझिए कि आंख चली गई। केमिकल ऐसे-ऐसे पड़ते हैं जो सेहत के लिए काफी खतरनाक होता हैं, लेकिन मामला होली पर एक दिन का होता है। इसके बाद कहां कोई इस रंग का इस्तेमाल करेगा जो कैंसर या और कोई बीमारी होगी। हम लोग स्प्रीट, थीनर, अलग-अलग केमिकल डालते हैं, इसके बाद तीन-चार आदमी मिलकर रगड़ते हैं, उसको फिर धूप में सुखाया जाता है। यह प्रोसेस 5 महीने का होता है। जहां एक मिनट रुकना मुश्किल, वहां 12 घंटे बच्चे बना रहे रंग टॉयलेट क्लीनर और कांच के पाउडर में खतरनाक केमिकल मिलाकर रंग बनाने वाली फैक्ट्रियों में जहां रिपोर्टर की 5 मिनट में हालत खराब हो गई वहां मासूम 12 घंटे तक रंग बना रहे और पैकिंग कर रहे हैं। भास्कर के अंडर कवर रिपोर्टर वैशाली के बिदुपुर गांव में 6 से अधिक अवैध फैक्ट्रियों में पहुंचे। किसी भी फैक्ट्री में 5 मिनट रुकना मुश्किल था, वहां काम करने वाले अधिकतर मासूम ही थे। इनमें 10 साल की बच्ची और बच्चे अधिक दिखाई दिए। जब रिपोर्टर फैक्ट्रियों में पहुंचा तो बच्चे डर गए, इधर-उधर भागने लगे। यहां रंग बन रहा था, बच्चे रंग को रैपर में पैक कर रहे थे। जब फैक्ट्री चलाने वालों से पूछ गया तो बोले बच्चे लालच में आ जाते हैं, बड़े तो यहां टिक ही नहीं पाएंगे। बच्चों को किसी तरह से बहला फुसलाकर काम लिया जाता है। वैशाली के बिदुपुर गांप में कुटीर उद्योग का रुप ले चुके नकली रंगों की फैक्ट्रियों में बच्चों की जान से खिलवाड़ किया जा रहा है। यहां से बनकर बाजार में जाने वाला रंग लोगों की सेहत के लिए खतरा बन रहा है। हाइली सेंसिटिव इंसान की हो सकती है मौत टॉयलेट क्लीनर और कांच के पाउडर से बनने वाले रंग मौत के मुंह तक पहुंचा सकते हैं। हमने पटना के डॉक्टर्स का पैनल बनाकर उनसे पूरा मामला समझा। इसमें डॉक्टर एसपी राणा सिंह के साथ नेत्र रोग विशेषज्ञ और चर्म रोग विशेषज्ञ को शामिल किया गया। केमिकल वाले रंग बनाने की पूरी प्रॉसेस को जब डॉक्टरों के पैनल को बताया गया तो उन्होंने इसके खतरनाक साइड इफेक्ट बताए, जिसमें इंसान की मौत भी शामिल है।