सुप्रीम कोर्ट से प्रोफेसर अली खान को राहत:ऑपरेशन सिंदूर पोस्ट विवाद, सरकार ने अभियोजन से किया इनकार; केस खत्म

अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को लेकर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम घटनाक्रम हुआ। हरियाणा सरकार ने शीर्ष कोर्ट को बताया कि उसने “ऑपरेशन सिंदूर” से जुड़े सोशल मीडिया पोस्ट के मामले में प्रोफेसर के खिलाफ अभियोजन चलाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के इस रुख को रिकॉर्ड में लेते हुए आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया। साथ ही कोर्ट ने यह भी उम्मीद जताई कि प्रोफेसर भविष्य में अधिक जिम्मेदारी और सावधानी के साथ अपनी बात रखेंगे। मुकदमा चलाने की नहीं दी अनुमति सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल S. V. राजू ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार ने सोनीपत अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। सरकार का कहना था कि यह निर्णय मामले को यहीं समाप्त करने के उद्देश्य से लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने समाप्त की आपराधिक कार्यवाही मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोमाल्या बागची की पीठ ने राज्य सरकार की जानकारी को रिकॉर्ड में लेते हुए प्रोफेसर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा अभियोजन की मंजूरी न दिए जाने के बाद मामले को आगे बढ़ाने का कोई आधार नहीं रह जाता। प्रोफेसर को चेतावनी देने की बात भी कही सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कोर्ट में कहा कि प्रोफेसर को भविष्य में ऐसे कार्यों से बचने के लिए चेतावनी दी जा सकती है, ताकि वह आगे इस प्रकार के विवादित पोस्ट न करें। कोर्ट ने भी उम्मीद जताई कि वह भविष्य में अधिक विवेकपूर्ण व्यवहार करेंगे। बचाव पक्ष ने जताया आभार प्रोफेसर की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा और एडवोकेट निज़ाम पाशा कोर्ट में पेश हुए। राज्य सरकार के फैसले के बाद उन्होंने कोर्ट और सरकार का आभार व्यक्त किया। मामले में प्रोफेसर ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। पिछले साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अंतरिम जमानत दे दी थी, हालांकि कोर्ट ने उनके सोशल मीडिया पोस्ट पर मौखिक रूप से नाराजगी भी जताई थी। जांच के लिए एसआईटी भी बनाई गई थी सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन भी किया था। इस टीम को यह जांच करने का निर्देश दिया गया था कि प्रोफेसर के सोशल मीडिया पोस्ट का वास्तविक अर्थ क्या था और क्या उनमें किसी प्रकार की आपराधिक मंशा या कानून का उल्लंघन शामिल था। ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े पोस्ट पर विवाद यह मामला प्रोफेसर महमूदाबाद के सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने ऑपरेशन सिन्दूर से जुड़े घटनाक्रम और भारत में अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर टिप्पणी की थी। यह पोस्ट उस समय चर्चा में आई जब सेना अधिकारी सोफिया कुरैशी द्वारा ऑपरेशन सिंदूर को लेकर प्रेस ब्रीफिंग की जा रही थी। कई धाराओं के तहत दर्ज हुआ था मामला प्रोफेसर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। इनमें साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने, समाज में वैमनस्य फैलाने और राष्ट्रीय संप्रभुता को प्रभावित करने जैसे आरोप शामिल थे। गिरफ्तारी के बाद वह तीन दिन तक हिरासत में भी रहे थे, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट से उन्हें अंतरिम जमानत मिली थी। संवेदनशील मामलों में सावधानी जरूरी मामले का निपटारा करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि कई बार पंक्तियों के बीच लिखी गई बातें भी ज्यादा विवाद पैदा कर देती हैं। उन्होंने कहा कि कुछ परिस्थितियां इतनी संवेदनशील होती हैं कि सभी को अपनी अभिव्यक्ति में बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि एक शिक्षित प्रोफेसर होने के नाते उनसे जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा की जाती है।

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