जेल कनेक्शन से फैला स्मैक का काला कारोबार:सिपाही निकला स्मैक डीलर… 8 महीने पहले गयाजी से फरार

25 करोड़ की स्मैक बरामदगी ने ड्रग नेटवर्क का खतरनाक चेहरा उजागर किया है। समस्तीपुर के जितेंद्र कुमार और जहानाबाद के नीतीश कुमार को जेल भेजा गया। जांच में बड़ा खुलासा हुआ। नालंदा का सिपाही ऋषिकेश कांतिकर इस सिंडिकेट का अहम कड़ी निकला। वह गया में पदस्थापित था। 2025 के जुलाई में भागलपुर ट्रांसफर हो गया। पर ज्वाइन नहीं किया। फरार हो गया। पटना के आलमगंज और रामकृष्ण नगर से उसके बैंक दस्तावेज, चेक और सर्विस रिकॉर्ड मिले। इससे अंदरूनी मिलीभगत का शक गहरा हुआ। पुलिस उसे फरार मान रही है। पटना में स्मैक की प्रोसेसिंग और सप्लाई का पूरा सेटअप था। रॉ मटेरियल यूपी के मुगलसराय और गाजीपुर से आता था। ट्रेन, कुरियर और सड़क मार्ग का इस्तेमाल होता था। सड़क मार्ग में सिपाही ऋषिकेश वर्दी में साथ रहता था, जिससे चेकिंग से बचाव होता था। सूत्र बताते हैं कि कुछ और पुलिसकर्मियों की भूमिका भी जांच में है। नेटवर्क का लिंक बेउर जेल तक जुड़ा है, जहां से एक ‘दादा’ इस पूरे रैकेट को ऑपरेट कर रहा था। आलमगंज और रामकृष्ण नगर थाने में जितेंद्र कुमार, नीतीश कुमार और पटनदेवी के पास के राहुल यादव पर केस दर्ज किया गया है। स्मैक गिरोह से जुड़े सिपाही की तलाश तेज, कई दस्तावेज व चेक बरामद नार्को रूट… मणिपुर से यूपी, फिर पटना आता था कच्चा माल स्मैक का रॉ फॉर्म ‘गोल्ड’ क्यों? ड्रग तस्करी में स्मैक के कच्चे रूप को ‘कट पत्थर’ या ‘गोल्ड’ कहा जाता है। यह हाई वैल्यू इंटरमीडिएट प्रोडक्ट होता है। इसे ग्राइंड कर पाउडर मिलाकर तैयार स्मैक बनाई जाती है। रॉ फॉर्म में पकड़े जाने पर मात्रा कम दिखती है, लेकिन इससे कई गुना तैयार माल बन सकता है। 16-20 किलो रॉ मटेरियल से 35-40 किलो तक स्मैक बन जाती है। वर्दी ‘सेफ पास’, जेल कंट्रोल रूम इस केस में सबसे बड़ा एंगल सिस्टम के भीतर सेंध का है। वर्दी का इस्तेमाल ड्रग ट्रांसपोर्ट को सुरक्षित बनाने में हुआ। इससे नेटवर्क बिना डर के सड़क मार्ग चुनता था। दूसरी ओर, बेउर जेल से ‘दादा’ का ऑपरेशन बताता है कि जेलें भी क्राइम नेटवर्क का कंट्रोल सेंटर बन रही हैं। की-पैड मोबाइल, अलग नंबर और लेयर बेस्ड नेटवर्क से ट्रेसिंग मुश्किल होती है। ‘दादा’ चला रहा है पूरा सिंडीकेट बेउर जेल में बंद माफिया ‘दादा’ पूरे रैकेट का मास्टरमाइंड है। मोबाइल के जरिए सप्लाई, फाइनेंस और नेटवर्क कंट्रोल होता था। बाहर ऑपरेटर्स को अलग जिम्मेदारी देकर लेयर सिस्टम बनाया गया। यूपी से पटना तक मजबूत सप्लाई चेन खड़ी की, लोकल पैडलरों से नेटवर्क फैलाया। ट्रांसफर के बाद ज्वाइन नहीं किया गया में पोस्टेड सिपाही ट्रांसफर के बाद भी नेटवर्क में सक्रिय रहा। वर्दी का इस्तेमाल कर सड़क मार्ग से खेप सुरक्षित पास कराई जाती थी। जांच से बचने में पहचान मददगार बनी। बैंक दस्तावेजों से भूमिका स्पष्ट हुई। फरार सिपाही की तलाश जारी है, अन्य पुलिसकर्मियों पर भी शक है।

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