ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच चल रही जंग के कारण LPG गैस की सप्लाई को लेकर कई जगह संकट बना हुआ है। लेकिन लुधियाना की कपड़ा इंडस्ट्री पर इसका खास असर नहीं पड़ा है। यहां के उद्यमी LPG की जगह एग्रो वेस्ट को फ्यूल के रूप में उपयोग कर रहे हैं। कुछ साल पहले सरकार ने इंडस्ट्री को एलपीजी पर शिफ्ट करने का दबाव बनाया था, लेकिन लुधियाना के उद्यमियों ने इसके बजाय पराली और राइस हस्क जैसे एग्रो वेस्ट को फ्यूल के तौर पर अपनाया। अब यह फैसला उनके लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। शहर में 400 अधिक यूनिट्स हैं। जिसमें से करीब 100 से ज्यादा यूनिट्स एग्रो वेस्ट का उपयोग कर रही हैं। जिसके चलते गैस न मिलने पर भी यहां पर काम चलता रहा। खेतों में पराली जलाने की समस्या भी कम हुई है। उद्यमियों का कहना है कि अगर सरकार गोबर को भी इसी तरह इंडस्ट्रियल फ्यूल के रूप में बढ़ावा दे, तो LPG पर निर्भरता और कम हो सकती है। डाइंग उद्यमी राहुल वर्मा के अनुसार, एग्रो वेस्ट, म्युनिसिपल वेस्ट और गोबर को वैकल्पिक ईंधन के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उद्यमी अब चीन और ताइवान का क्लस्टर मॉडल अपना रहे हैं। सवाल-जवाब में जानिए, एग्रो वेस्ट से कैसे चल रही इंडस्ट्री फ्यूल के तौर पर पहले कैसे उपयोग होता था? पहले इंडस्ट्री कोयला और रबड़ को फ्यूल के तौर पर इस्तेमाल करती थी। भट्टी में कोयला जलाकर ही स्टीम और ऊर्जा तैयार की जाती थी। लेकिन अब उसी भट्टी में कोयले की जगह पराली जलाई जा रही है। एग्रो वेस्ट से फ्यूल क्यों अपनाया गया? कोयला और रबड़ से ज्यादा वायु प्रदूषण होता था, जिससे बीमारियां भी फैलती थीं। इसी वजह से सरकार ने इंडस्ट्री को LPG इस्तेमाल करने के लिए कहा। लेकिन उद्यमियों ने LPG के बजाय पराली और राइस हस्क जैसे एग्रो वेस्ट को फ्यूल के रूप में अपनाया। एग्रो वेस्ट से फ्यूल कैसे बनता है, यह LPG से सस्ता कैसे है? एग्रो वेस्ट जैसे पराली और धान के भूसा को सीधे बॉयलर में जलाया जाता है या पहले मशीन से दबाकर ब्रिकेट/पैलेट बनाया जाता है। इससे स्टीम और ऊर्जा तैयार होती है। यह लोकल स्तर पर आसानी से मिल जाता है, इसलिए इसका खर्च LPG से काफी कम होता है। इंडस्ट्री करीब 4 रुपए प्रति किलो के हिसाब से पराली खरीद रही है, जिससे किसानों को भी फायदा हो रहा है। इससे फ्यूल की लागत लगभग आधी रह जाती है। कितनी यूनिट्स पूरी तरह एग्रो वेस्ट पर चल रही हैं? लुधियाना में करीब 400 डाइंग यूनिट्स हैं, जिनमें से लगभग 100 यूनिट्स एग्रो वेस्ट से चल रही हैं। कुछ यूनिट्स पूरी तरह इसी पर निर्भर हैं, जबकि कुछ जरूरत के हिसाब से गैस या अन्य फ्यूल के साथ इसका इस्तेमाल करती हैं। कितना खर्च आता है, क्या सरकार मदद करती है? एग्रो वेस्ट इस्तेमाल करने के लिए पूरे बॉयलर को बदलने की जरूरत नहीं होती, सिर्फ भट्टी को अपग्रेड करना पड़ता है। इसमें कम खर्च आता है, जो सस्ते फ्यूल की वजह से जल्दी निकल जाता है।
कुछ सरकारी योजनाओं में ग्रीन एनर्जी के लिए सब्सिडी भी मिलती है, लेकिन यह हर जगह समान नहीं होती। क्या एग्रो वेस्ट से इंडस्ट्री की जरूरत पूरी हो सकती है? हां, सही मशीन और सेटअप होने पर एग्रो वेस्ट से इतनी स्टीम और ऊर्जा बन जाती है कि फैक्ट्री का काम बिना रुकावट चलता रहता है। लुधियाना की कई यूनिट्स पूरी तरह इसी पर निर्भर हैं। इस मॉडल से लागत और मुनाफे पर क्या असर पड़ा? फ्यूल सस्ता होने से खर्च कम हुआ और उत्पादन लगातार चलता रहा। इससे इंडस्ट्री को नुकसान नहीं हुआ और लंबे समय में मुनाफा बढ़ा। जो शुरुआत में मजबूरी थी, वही अब इंडस्ट्री की ताकत बन गई है। काउ डंग और म्युनिसिपल वेस्ट को फ्यूल बनाने पर क्या काम हो रहा है? काउ डंग (गोबर) से बायोगैस और ब्रिकेट बनाकर पहले से इस्तेमाल हो रहा है। शहर के कचरे (म्युनिसिपल वेस्ट) से भी बिजली और फ्यूल बनाने के प्रोजेक्ट चल रहे हैं। लेकिन अभी इंडस्ट्री में इनका इस्तेमाल बड़े स्तर पर शुरू नहीं हुआ है।
डाइंग क्लस्टर क्या है, कब बन सकता है? डाइंग क्लस्टर का मतलब है कि एक ही जगह कई फैक्ट्रियां मिलकर काम करें और एक ही सिस्टम से स्टीम और ऊर्जा लें। इसमें सरकार और प्राइवेट कंपनियां मिलकर निवेश करती हैं (PPP मॉडल)। इससे लागत कम होती है और काम आसान हो जाता है। चीन और ताइवान के मॉडल में क्या खास है? चीन और ताइवान में इंडस्ट्री क्लस्टर के रूप में काम करती है, जहां कॉमन बॉयलर और बिजली सिस्टम होता है। इससे खर्च कम होता है और उत्पादन ज्यादा होता है। अब लुधियाना में भी इसी मॉडल को अपनाने की तैयारी हो रही है। हाल ही में पंजाब इन्वेस्ट समिट में उद्योग से जुड़े लोगों ने चीन और ताइवान की तर्ज पर डाइंग क्लस्टर बनाने का सुझाव दिया। इन क्लस्टर्स में कॉमन बॉयलर के जरिए म्युनिसिपल वेस्ट और एग्रो-वेस्ट से बिजली और स्टीम तैयार की जा सकती है। अब जानिए उद्यमियों ने क्या कहा… पंजाब डाइंग एसोसिएशन (PDA) के सदस्य विशाल जैन ने कहा- अगर हमने समय रहते ईंधन के विकल्प नहीं अपनाए होते, तो कई यूनिट बंद हो जाती। एग्रो वेस्ट ने हमें लागत और उत्पादन दोनों में स्थिरता दी है। कारोबारी कमल चौहान ने कहा कि हम सिर्फ अपनी फैक्ट्रियां नहीं चला रहे, बल्कि पराली जलाने की समस्या को भी कम कर रहे हैं। यह इंडस्ट्री और पर्यावरण दोनों के लिए फायदे का सौदा है। वहीं एक अन्य कारोबारी सुभाष सैनी ने इसे दीर्घकालिक समाधान बताया। उन्होंने कहा कि यह मॉडल साबित करता है कि स्थानीय स्तर पर किया गया नवाचार बड़े संकटों का हल बन सकता है। जो शुरुआत में एक मजबूरी थी, वही अब इंडस्ट्री की ताकत बन चुकी है। इस बदलाव से न सिर्फ उत्पादन लगातार जारी रहा, बल्कि पर्यावरण को भी बड़ा फायदा मिला है। पराली, जिसे हर साल प्रदूषण का कारण माना जाता है, अब उपयोगी ईंधन बनकर किसानों को भी नया विकल्प दे रही है।