अनोखा बैंक:यहां रुपया-पैसा नहीं, जमा होता है ‘श्रीराम’ का नाम, 60 करोड़ का आंकड़ा पार

सतीश कपूर | अमृतसर दुनिया में लाखों बैंक हैं जहां लोग पैसा जमा करते हैं ताकि बुरे वक्त में काम आए। मगर अमृतसर के दुर्ग्याणा तीर्थ परिसर में एक ऐसा अनोखा बैंक है जहां श्रद्धालु धन नहीं बल्कि श्री राम के नाम की लिखी कॉपियां जमा करवाते हैं। ताकि वे दुनिया के इस भव सागर में फंसे बिना प्रभु की भक्ति के पात्र बन सकें। मंजूषा नामक यह बैंक गोस्वामी तुलसीदास मंदिर में बना है। यहां देशभर से आने वाले श्रद्धालु राम नाम लिखकर मंदिर के सेवादारों को सौंप देते हैं। वर्तमान में इस बैंक में 60 करोड़ राम नाम शब्द जमा हो चुके हैं और जल्द ही इसे 100 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य है। यह बैंक आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आध्यात्मिक विरासत है। जब कोई श्रद्धालु अपनी पूरी भरी हुई कॉपी सेवादार को सौंपता है, तो उसके चेहरे का संतोष किसी बड़ी लॉटरी जीतने से कम नहीं होता। मंदिर के चेयरमैन रवि अरोड़ा ने बताया कि इसका निर्माण साल 1959 में पंडित चमन लाल जी ने करवाया था। रामाणुज संप्रदाय से जुड़े चमन लाल जी को इस इकलौते तुलसीदास मंदिर की प्रेरणा अपने दादा गुरु रघुनाथ दास जी से मिली थी। यह मंदिर 35 बाई 80 फुट के एरिया में बना है। बैंक मंजूषा में फिलहाल 60 करोड़ राम नाम शब्द सुरक्षित हैं जबकि बाकी 40 करोड़ शब्द मंदिर के अन्य कमरों में रखे हैं। इसी साल इन सभी प्रतियों को मंजूषा में शामिल कर कुल संख्या 100 करोड़ कर दी जाएगी। चेयरमैन रवि अरोड़ा के मुताबिक राम नाम लिखने के लिए खास कॉपियां गोरखपुर से मंगवाई जाती हैं। देशभर के श्रद्धालु इन कॉपियों में राम नाम लिखकर मंदिर भेजते हैं जिन्हें मंजूषा में सुरक्षित रखा जाता है। मंजूषा संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ बॉक्स या पिटारा है। संगमरमर के मंदिर के नीचे एक विशेष स्थान पर इस बैंक को बनाया गया है। इस बैंक की शुरुआत साल 1974 में 10 करोड़ शब्दों के साथ हुई थी। साल 2009 में मंदिर की गोल्डन जुबली पर यह संख्या 50 करोड़ पहुंची और अब 60 करोड़ हो चुकी है। चेयरमैन रवि अरोड़ा के अनुसार राम भक्तों को जो कॉपी दी जाती है, उसमें कुल 28,400 राम नाम शब्द आते हैं। इसी आधार पर गणना की जाती है। गीता प्रेस गोरखपुर से आने वाली ये कॉपियां भक्तों को ‘लाल पे न’ के साथ निःशुल्क दी जाती हैं। चेयरमैन ने बताया कि मंदिर के गर्भगृह में अभी कुछ विकास कार्य शेष हैं, जो संगत के सहयोग से पूरे किए जाएंगे।

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