नाबालिग के साथ लिव इन को संरक्षण नहीं, इससे बाल संरक्षण कानून कमजोर हो जाएंगे : हाईकोर्ट

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालों को अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार जरूर है, लेकिन यह संरक्षण उस स्थिति में नहीं दिया जा सकता जब एक पक्ष नाबालिग हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा करने से बाल संरक्षण कानूनों के उद्देश्य पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। जस्टिस सुभाष मेहला की एकल पीठ ने हिसार निवासी 18 वर्षीय युवक और 17 वर्षीय नाबालिग लड़की की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें लिव इन रिलेशनशिप के लिए कानूनी संरक्षण देने से इनकार कर दिया। याचिका में दोनों ने परिजनों से खतरे का हवाला देते हुए पुलिस सुरक्षा की मांग की थी। कोर्ट ने नाबालिग लड़की को एक सप्ताह के भीतर चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) के समक्ष पेश करने का आदेश दिया। कमेटी को निर्देश दिया गया कि वह मामले की जांच कर बच्ची की देखभाल, सुरक्षा और भविष्य को लेकर उचित निर्णय ले। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में भी बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है और ऐसे मामलों में राज्य की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में लिव-इन रिलेशनशिप को कुछ शर्तों के साथ मान्यता दी गई है लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों का विवाह योग्य आयु का होना जरूरी है। नाबालिग के मामले में यह मान्यता लागू नहीं हो सकती। एसपी को दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश हाई कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में संरक्षण दिया जाता है, तो यह एक तरह से गैरकानूनी संबंध को वैधता देने जैसा होगा, जो कानून के उद्देश्य के खिलाफ है। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा जताए गए खतरे को नजरअंदाज नहीं किया। अदालत ने हिसार के एसपी को निर्देश दिए कि दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि यह संरक्षण किसी भी अवैध गतिविधि को ढाल नहीं देगा और कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

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