व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जैसे पुलिस या जांच एजेंसी किसी व्यक्ति की आवाजाही पर रोक लगा देती है, उसी क्षण से उसे गिरफ्तार माना जाएगा। जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि मजिस्ट्रेट के समक्ष 24 घंटे में पेश करने की संवैधानिक समय सीमा भी उसी समय से लागू होगी। कागजों में दर्ज गिरफ्तारी के समय से उसे न आंका जाए। अमृतसर में ट्रामाडोल टैबलेट की बरामदगी से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की हिरासत में रखे गए याची की रिहाई के आदेश दिए। कोर्ट ने साफ कहा कि गिरफ्तारी एक वास्तविक स्थिति है, जिसे शब्दों के सहारे बदला नहीं जा सकता। यदि व्यक्ति अपनी इच्छा से कहीं जा नहीं सकता, तो वह गिरफ्तारी ही मानी जाएगी। याची को 31 अक्टूबर, 2025 की रात देहरादून में 11 बजे एजेंसी ने अपने साथ रखा और अगले दिन भी वह उनके नियंत्रण में रहा। हालांकि उसकी औपचारिक गिरफ्तारी 1 नवंबर की रात 9 बजे दर्शाई गई और 2 नवंबर को दोपहर 2 बजे उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। कोर्ट ने पाया कि व्यक्ति को न्यायिक अनुमति के बिना 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया, जो संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन है। अदालत ने उस प्रचलित तरीके को भी खारिज कर दिया, जिसमें एजेंसियां पूछताछ के लिए रोकना या जांच के लिए साथ रखना जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर गिरफ्तारी को औपचारिक रूप से टालती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी मेमो या पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज समय अंतिम सत्य नहीं होता।