टैगोर थिएटर में कई कलाकार बोलियों की प्रस्तुति देने आए थे। उनमें सुरजीत बिंदरखिया भी था। मैं वहां अखबार की तरफ से कवरेज के लिए गया था। हमारी मुलाकात ग्रीन रूम में हुई। मैंने बिंदरखिए को कहा कि बहुत अच्छी आवाज़ है तो उन्होंने कहा कि सब तारीफ तो करते हैं, लेकिन मैं भंगड़े की बोलियां ही गा रहा हूं बस, आगे बात बढ़ नहीं रही। उन दिनों हमारा दोस्त इकबाल ढिल्लों फिल्म बना रहा था – अणख जट्टां दी। उस फिल्म में बिंदरखिए से बानिए ने जट्ट… गीत गवाया गया। उसकी कैसेट तो बाद में आई, लेकिन गायकी की शुरुआत फिल्म से हुई। उसके बाद तो लोग बिंदरखिए को ढूंढ़ने लगे। फिर तो दुपट्टा सतरंग दा, यार बोलदा, ऐथे मेरी नथ डिग गई, मुखड़ा देखके मर गया नी आदि 32 कैसेट्स आई। ऐसे कई किस्से गीतकार व वरिष्ठ पत्रकार शमशेर सिंह संधू ने पंजाबी लेखक सभा की आेर से आयोजित यार बोलदा कार्यक्रम में साझा किए। यह चंडीगढ़ सेक्टर-16 के पंजाब कला भवन में आयोजित किया गया। सवालों का सिलसिला लेखक नवदीप सिंह गिल ने जारी रखा। कार्यक्रम में पंजाबी लेखक सभा के जनरल सचिव भूपिंदर सिंह मलिक, प्रधान दीपक शर्मा, सचिव सुखविंदर सिंह सिद्धू आदि शामिल हुए। शमशेर सिंह संधु ने हज़ार गीत लिखे, रिकॉर्ड 500 हुए। इन्हें 72 गायकों ने गाया। इनमें स्व. आशा भोसले, अनुराधा पौडवाल आदि शामिल हैं। पंजाबी संस्कृति के बाबा बोह्ड़ कहे जाने वाले जगदेव सिंह जस्सोवाल को याद करते हुए बोले- एक बार प्रो. मोहन सिंह मेला के बाद हम जगदेव सिंह जस्सोवाल के घर बैठे थे। उनकी खासियत थी कि वह बैठे बैठे सब मैनेज कर देते थे। उनके घर ट्रॉफिज़ आैर लोई के 23000 रूपए लेने एक आदमी आया। तब उन्होंने अपने किसी रिश्तेदार को आैर बैठे-बैठे डीसी लखनपाल को फोन कर तुरंत सब मैनेज कर दिया। किस्सा किताब की भूमिका लिखने का शमशेर सिंह संधू बोले – डॉ. एमएस रंधावा को एक नए लेखक ने कहा कि यह मेरा नॉवेल है। आप इसकी भूमिका लिख दो। उन्होंने टाल दिया तो लेखक तीसरी बार आया और रंधावा को कहा कि मैं आपके दफ्तर में भूख हड़ताल कर दूंगा। रंधावा साहब नर्म दिल के थे। उन्होंने स्क्रिप्ट लेकर प्रो. मोहन सिंह को दिया और कहा कि तुम इसे पढ़कर मेरी तरफ से भूमिका लिख दो। प्रो. सिंह सीधे डॉ. सुरजीत पातर के पास पहुंचे और कहने लगे कि इसे एमएस रंधावा ने मेरी ड्यूटी लगा दी। मेरे पास टाइम नहीं है, तुम इसकी भूमिका लिख दो। पातर ने स्क्रिप्ट ली और कमरे में गए। कमरे में दो दोस्त दर्शन जैक और बिट्टु रहते थे। दर्शन जैक को सभी बेरोज़गार एमए कहते थे। पातर ने जैक को कहा तू ऐसे ही वेहला मंजे पर लेटा रहता है, तू इसे पढ़ ले और भूमिका लिख दे और पैसे मिलेंगे। अब दर्शन जैक ने भूमिका खुद लिखी या किसी से लिखवाई, किसी को नहीं पता। लेकिन, लिखकर जैक ने पातर को दी, पातर ने प्रो. मोहन को दी, प्रो. मोहन ने एमएस रंधावा को और बाद में बाकायदा वही भूमिका नॉवेल में छपी भी।