चंडीगढ़ नगर निगम के 118 करोड़ रुपए के आईडीएफसी फर्स्ट बैंक घोटाले में आरोपी पूर्व अकाउंटेंट अनुभव मिश्रा ने कोर्ट में लगाई गई अपनी अग्रिम जमानत याचिका वापस ले ली है। बताया जा रहा है कि यह याचिका उन्होंने केस सीबीआई को ट्रांसफर होने से पहले लगाई थी। जैसे ही मामला सीबीआई को ट्रांसफर हुआ, आरोपी अनुभव मिश्रा ने अपनी याचिका कोर्ट से वापस ले ली। घोटाला सामने आने के बाद से वह फरार हैं। वहीं, चंडीगढ़ नगर निगम ने उन्हें नौकरी से हटा दिया है। पुलिस के अनुसार, उन्होंने आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के अधिकारियों के साथ मिलकर 11 फर्जी एफडीआर तैयार किए, जिनकी कीमत 116.84 करोड़ रुपए से अधिक थी। उन पर सरकारी पैसे को फर्जी कंपनियों में भेजने का आरोप है। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने नकली एफडी के बदले अन्य आरोपियों से करोड़ों रुपए लिए थे। जांच में सामने आया कि उनके पास बैंक से जुड़े मोबाइल नंबर की पहुंच थी और संदिग्ध लेनदेन करवाने में उनकी अहम भूमिका रही। अब सीबीआई कर रही जांच चंडीगढ़ में भ्रष्टाचार के मामलों में अब अफसरों का बचकर निकलना आसान नहीं होगा। चंडीगढ़ प्रशासन ने सख्त कदम उठाते हुए स्मार्ट सिटी लिमिटेड और क्रेस्ट में फंड गड़बड़ी से जुड़े मामलों की जांच CBI को सौंप दी गई है और सीबीआई ने मामले की जांच शुरू कर दी है। अब तक कई मामलों में देखा गया कि भ्रष्टाचार या रिश्वत के आरोपों में गिरफ्तारी के बावजूद अधिकारी बच जाते थे। इसकी वजह थी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A, जिसके तहत केस चलाने के लिए संबंधित राज्य सरकार से अनुमति जरूरी होती है। कई बार हरियाणा या पंजाब सरकार से यह मंजूरी नहीं मिलती थी या जवाब ही नहीं दिया जाता था, जिसके चलते अदालत में केस कमजोर पड़ जाता था और आरोपी बरी हो जाते थे। स्मार्ट सिटी फंड में गड़बड़ी चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड में आईडीएफसी बैंक में जमा करीब 116 करोड़ रुपए बिना अनुमति निकाले जाने का मामला सामने आया था। जांच में सामने आया कि यह रकम शेल कंपनियों में ट्रांसफर की गई। इसी तरह क्रेस्ट में भी फंड गड़बड़ी के आरोप लगे। इस मामले में पुलिस को प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत कार्रवाई के लिए आरोपियों पर केस चलाने की अनुमति चाहिए थी। स्मार्ट सिटी की CFO नलिनी मलिक और आउटसोर्स कर्मचारी अनुभव मिश्रा के खिलाफ तो प्रशासन ने मंजूरी दे दी, लेकिन एनपी शर्मा (जो पंजाब कैडर के अधिकारी हैं और चंडीगढ़ में डेपुटेशन पर थे) के खिलाफ पंजाब सरकार से मांगी गई अनुमति का कोई जवाब नहीं मिला। हरियाणा से भी नहीं मिले सबूत इस मामले में हरियाणा पुलिस ने आईडीएफसी बैंक के पूर्व मैनेजर रिभव ऋषि को पहले ही गिरफ्तार कर लिया था। जांच के दौरान उसके पास से कई अहम दस्तावेज और डिजिटल सबूत मिले थे, जो पूरे फंड ट्रांजैक्शन और पैसों के ट्रेल को समझने में महत्वपूर्ण थे। माना जा रहा था कि इन सबूतों से यह स्पष्ट हो सकता है कि रकम कहां से निकाली गई, किन खातों में ट्रांसफर हुई और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका रही। चंडीगढ़ पुलिस ने जांच आगे बढ़ाने के लिए हरियाणा पुलिस से कई बार सबूत मांगे, ताकि दोनों राज्यों की जांच में तालमेल बैठ सके। इसके लिए आधिकारिक पत्र भी भेजे गए, लेकिन जरूरी दस्तावेज समय पर नहीं मिले। सबूतों की कमी के कारण चंडीगढ़ पुलिस की जांच प्रभावित हो रही थी और केस की कड़ियां जोड़ने में दिक्कत आ रही थी। यही वजह रही कि मामले को निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने के लिए अंततः इसे CBI को सौंपने का फैसला लिया गया। CBI जांच से खुलेंगे बड़े राज इन सभी अड़चनों को देखते हुए चंडीगढ़ प्रशासन ने पूरे मामले की जांच CBI को सौंपने का फैसला लिया। प्रशासन का मानना है कि जब अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी, जरूरी अनुमति न मिलना और अहम सबूतों की उपलब्धता में दिक्कतें आ रही हों, तो एक केंद्रीय एजेंसी के जरिए जांच ज्यादा प्रभावी और निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ाई जा सकती है। कई नामों का हो सकता है खुलासा सूत्रों के अनुसार, इस जांच में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं और ऐसे कई नाम सामने आ सकते हैं, जो अब तक जांच के दायरे से बाहर थे। साथ ही, यह भी संभावना है कि जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है, जिससे भ्रष्टाचार के इस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो सके। इससे पहले मामले की जांच के लिए एसपी सिटी मंजीत श्योराण की अगुवाई में SIT बनाई गई थी, जिसमें डीएसपी वेंकटेश सहित अन्य अधिकारी शामिल थे। जांच के दौरान CFO नलिनी मलिक और ब्रोकर विक्रम वाधवा समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था। पूछताछ में कई अहम जानकारियां सामने आई थीं।