लखनऊ में कसमंडी कला मंदिर या मस्जिद?:हिंदुओं का दावा- यह शिव मंदिर; मुस्लिमों का जवाब- कई साल से नमाज पढ़ रहे

लखनऊ के मलिहाबाद में कसमंडी कला कस्बा है। यहीं के एक मकबरे और मस्जिद को लेकर इन दिनों माहौल गर्माया हुआ है। हिंदू पक्ष का दावा है कि ये महाराजा कंसा पासी का किला है। इसके एक हिस्से में शिव मंदिर था, जिसे मजार में बदल दिया गया। इस दावे का आधार दीवारों पर बने नाग, फूल और कलश की आकृतियां हैं। वहीं, मुस्लिमों का दावा है- यहां 850 सालों से मजार और 250 साल से मस्जिद है। हम कई सालों से नमाज पढ़ते आ रहे हैं। इन दावों के बीच स्थानीय लोग कहते हैं- 2 साल पहले तक यहां कोई विवाद नहीं था। कोई नमाज पढ़ने नहीं आता था। इसके बाद लोग नमाज अदा करने आने लगे। अब विवाद बढ़ गया है। लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने के लिए पुलिस ने विवादित स्थल को सील कर दिया है। न मुस्लिम पक्ष के लोग नमाज नहीं पढ़ सकते हैं, न ही हिंदू हनुमान चालीसा का पाठ कर सकते हैं। PAC की एक कंपनी तैनात कर दी गई है। विवादित ढांचे की तरफ जाने वाले रास्तों को सील कर दिया गया है। विवाद कहां से शुरू हुआ पूर्व डिप्टी सीएम के बयान के बाद मुद्दा बना
बात 8 महीने पहले की है। 28 सितंबर, 2025 को यूपी के पूर्व डिप्टी सीएम और मौजूदा राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा महाराजा कंसा पासी महोत्सव में शामिल हुए। यह आयोजन मलिहाबाद के कसमंडी में हुआ था। उस वक्त उन्होंने कहा था- मुगलों और अंग्रेजों ने पासी समुदाय को बदनाम करने की हरसंभव कोशिश की। उन्हें डर था कि पासी समाज उनके शासन को खत्म कर सकता है। लखनऊ और आसपास का इलाका तो पासी राजाओं का हुआ करता था। इतिहास में महाराजा कंसा पासी की 4 पीढ़ियों का उल्लेख मिलता है। सभा में इस बात की भी चर्चा हुई कि 4 पीढ़ियों तक जिसका शासन रहा हो, उससे जुड़ी कोई ऐतिहासिक धरोहर क्यों नहीं है? उनका किला कहां है? उनसे जुड़ी चीजें कहां हैं? इसके बाद कई संगठन एक्टिव हो गए। सबसे आगे रही ‘लाखन आर्मी’। सूरज पासी इसके मुखिया हैं। लखनऊ के ही भोलापुर के सूरज पासी ने 27 फरवरी, 2023 को लाखन एकता मिशन बनाया। बाद में इसका नाम लाखन आर्मी कर दिया। दावा- किला, इसके एक हिस्से में शिव मंदिर ताजा विवाद 20 मई के आसपास शुरू हुआ। लाखन आर्मी, हिंदू महासभा समेत कई संगठनों ने ऐलान किया कि यह महाराजा कंसा पासी का किला था। इसके एक हिस्से में प्राचीन शिव मंदिर है, हम यहां पूजा करेंगे। इसके बाद प्रशासन हरकत में आ गया। मुस्लिम पक्ष में भी चर्चा शुरू हो गई। इसका असर यह हुआ कि 22 मई को जुमे के दिन बड़ी संख्या में मुस्लिम लोग नमाज पढ़ने इस जगह पर पहुंच गए, जबकि पहले 10-15 लोग ही नमाज पढ़ते थे। लाखन आर्मी प्रमुख सूरज पासी कहते हैं- इन्होंने ढांचे के ऊपर जो प्लेट लगाई है, वह सीमेंट से हाल में लगाई गई है। जबकि, दीवार तो लखौरी ईंट और चूने की बनी हैं। इसी तरह अंदर जो मजार है, वह सीमेंट से बनी है। आपने ऐसा कहीं नहीं देखा होगा, क्योंकि यह सिर्फ आकृति है। इसके अलावा अंदर की डिजाइन देखिए, नाग सभ्यता के चिह्न नजर आते हैं। नाग, फूल, कलश और हिंदू परंपरागत आकृतियां बनी हैं। जो कहीं से भी इस्लामी वास्तुकला से मेल नहीं खातीं। सूरज कहते हैं- इन्होंने यहां कब्जा किया है। इसके अलावा 300 मीटर दूर 12 फीट की एक मजार और बनी है। वह हमारे राजा पासी कंसा की है, लेकिन उस जगह को भी ये लोग अपनी बताते हैं। यहां हिंदू स्मारक ही नहीं हैं। यहां मुस्लिमों ने 1 हजार साल पुरानी सभ्यता को मिटाने की कोशिश की है। हम तो सीएम योगी से कहते हैं कि बुलडोजर इधर भी लेकर आइए। 2 साल पहले तक कोई नमाज नहीं होती थी कसमंडी कला हिंदू बाहुल्य इलाका है। जिस जगह पर यह विवादित ढांचा है, वहां करीब 30% मुस्लिम हैं, बाकी आबादी हिन्दुओं की है। यहीं की एक महिला कहती हैं- हम लोग यहां 10 साल से हैं। पहले नहा-धोकर हम लोग अगरबत्ती लगा देते थे। लेकिन, पिछले 2 साल से यहां नमाज शुरू हो गई। नमाज पढ़ने वाले शिया लोग हैं, लखनऊ से आते हैं। हमारी जगह तो है नहीं, इसलिए हम लोग कभी पूछने नहीं गए। 70 साल की एक अन्य हिंदू महिला कहती हैं- हम यहां 50 साल से रह रहे हैं। 2 साल से लोग बाहर से आकर नमाज पढ़ने लगे हैं। हम लोग अब उधर नहीं जाते। हिंदू लोग भी कभी यहां पूजा-पाठ नहीं करते थे, बस ये जगह ऐसे ही रहती थी। यहां के जो मुस्लिम लोग हैं, वो पास की मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ते हैं। अब इसका विवाद क्या है, इसके बारे में तो हमको कोई जानकारी नहीं है। मकबरे के ऊपर लगी तख्ती से विवाद बढ़ा मकबरे के ऊपर एक तख्ती लगी है। पूरा ढांचा चूना-पत्थर से बना है, लेकिन संगमरमर की यह तख्ती सीमेंट से अलग से लगाई गई है। देखकर ऐसा लगता है कि ये 1 या 2 साल पहले लगाई गई होगी। इस पर फारसी भाषा में साल 1246 की एक घटना का जिक्र है। इसमें एक पिता ने अपनी 11 साल की बेटी की मौत पर संदेश लिखवाया है। इसका हिंदी अनुवाद है- मेरी नन्ही बेटी कम उम्र में ही दुनिया छोड़ गई, उसके जाने के गम से मेरा दिल व्याकुल है। आंदोलन कर रहे पासी समाज के लोग कहते हैं- केवल एक फारसी तख्ती लग जाने से किसी स्थान का मूल इतिहास नहीं बदल जाता। यह 11वीं सदी के महाराजा कंसा पासी का किला है। एसडीएम और डीएम को इसीलिए ज्ञापन दिया है कि पुरातत्व विभाग से इस स्थान की जांच करवाएं। महिला की लाश कब्रिस्तान में जाने से रोकी 26 मई को हिंदू महासभा के तमाम कार्यकर्ता विवादित स्थल पर पूजा करने की जिद के साथ पहुंच गए। पुलिस ने उन्हें रोका। इसके बाद उनका ज्ञापन लिया। हिंदू महासभा के लोगों ने ऐलान किया कि वह बकरीद के दिन विवादित स्थल पर पूजा-पाठ करेंगे और हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। एक दिन बाद ही प्रशासन ने आदेश दिया कि बकरीद पर विवादित स्थल के आसपास कोई नहीं जाएगा। न तो नमाज होगी और न ही किसी तरह की पूजा होगी। बकरीद के मौके पर यह सख्ती दिखी भी, कोई विवादित स्थल तक नहीं पहुंच सका। ये विवाद बढ़ता जा रहा है। जहां विवादित स्थल है, वह सरकार के रिकॉर्ड में कब्रिस्तान के रूप में दर्ज है। 27 मई की रात गांव की ही एक महिला की मौत हो गई। लोग शव को दफनाने कब्रिस्तान की तरफ लेकर जाने लगे। इस पर लाखन आर्मी के एक कार्यकर्ता ने विरोध शुरू कर दिया। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने उसे हिरासत में लिया। फिर महिला का अंतिम संस्कार उसी कब्रिस्तान में करवाया। स्थानीय स्तर पर इस घटना के बाद विवाद और गहरा गया है। मुस्लिम पक्ष का दावा- सरकारी रिकॉर्ड में मकबरा और मस्जिद ही दर्ज मुस्लिम पक्ष के लोग कैमरे पर बात करने से पीछे हट जाते हैं। गांव के ही रिटायर्ड शिक्षक जमाल कहते हैं- पहले यहां सुन्नी वर्ग के लोग नमाज पढ़ते थे। बाद में शिया ने नमाज पढ़ना शुरू कर दिया। यहां सिर्फ शुक्रवार को ही नमाज होती है। राजस्व के अभिलेख देखेंगे, तो यह भूमि जामा परिवार के नाम पर दर्ज है। इनके वंशज उन्नाव के असोहा इलाके से पलायन करने के बाद विदेश में बस गए थे। यहां कभी कोई विवाद नहीं रहा। हिंदू-मुस्लिम हमेशा से मिलकर रहते हैं। एक अन्य व्यक्ति कहते हैं कि 1933 फसली बंदोबस्त और 1359 फसली भूमि रजिस्टर के अभिलेख में मस्जिद और कब्रिस्तान दोनों का उल्लेख है। अगर भारतीय पुरातत्व विभाग इसकी जांच करता है तो सच्चाई पता चल जाएगी। इसके बाद जिस भी समुदाय का स्वामित्व हो, उसे जमीन दे देनी चाहिए। गांव के ही कुछ लोग इन सबसे अलग विचार रखते हैं। वो कहते हैं- हम यहां न तो मंदिर बनाए जाने और न ही मस्जिद के निर्माण का समर्थन करते हैं। हम चाहते हैं कि यहां बालिका विद्यालय, हॉस्पिटल या फिर सामूहिक विवाह भवन बना दिया जाए। इससे हर वर्ग के व्यक्ति का लाभ होगा। —————————- यह खबर भी पढ़ें – लखनऊ के कसमंडी किले पर विवाद, पुलिस बल तैनात, हिंदूवादी नेता बोले- मौलाना क्यों भागा लखनऊ के मलिहाबाद स्थित कसमंडी कलां इलाके में पुराने किले को लेकर शुरू हुआ विवाद बढ़ गया है। मंगलवार को कुछ हिंदूवादी नेता यहां पूजा की थाली लेकर पहुंच गए। स्थल के पास तैनात पुलिस बल के जवानों ने उन्हें रोक दिया, तो जमीन पर बैठ गए। वहीं से किले की तरफ मुंह करके आरती उतारी। पढ़िए पूरी खबर…

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