UP में 3 या 4 मार्च, होली कब मनाई जाएगी?:भद्रा और चंद्रगहण का साया; ज्योतिषाचार्य बोले- इस संयोग में रंग नहीं खेले जाएंगे

इस साल होली पर्व पर भद्रा और खग्रास चंद्र ग्रहण का दुर्लभ संयोग बन रहा है। 2 मार्च को होलिका दहन पर भद्रा का साया पड़ रहा है, जबकि अगले दिन 3 मार्च को धुलेंडी के दिन खग्रास चंद्र ग्रहण रहेगा। इससे लोगों में असमंजस की स्थिति है। ज्योतिष शास्त्रियों का कहना है कि 3 मार्च को होली मनाना शास्त्रों के अनुसार ठीक नहीं है। ग्रहण से 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाएगा, जिसमें शुभ कार्य और मंदिर दर्शन वर्जित माने जाते हैं। सूतक काल के दौरान आमतौर पर शुभ कार्यों पर रोक मानी जाती है। इसलिए होली एक दिन आगे खिसककर 4 मार्च को मनाई जाएगी। आइए जानते हैं—भद्रा कौन थी? होलिका दहन कब होगा? उसके लिए कितना समय मिल रहा है? तीन मार्च को होली मनाने में क्या परेशानी है? ब्रज में होली का शेड्यूल क्या है? होलिका दहन के लिए 1 घंटा 12 मिनट का शुभ समय
गोरखपुर के एस्ट्रोलॉजर पंडित नरेंद्र उपाध्याय बताते हैं- इस साल 2 मार्च सोमवार को सूर्योदय सुबह 6 बजकर 16 मिनट पर होगा। इस दिन चतुर्दशी तिथि शाम 5:18 बजे तक रहेगी, इसके बाद पूर्णिमा तिथि शुरू होगी। इस दिन सुबह 7:24 बजे तक आश्लेषा नक्षत्र रहेगा, फिर मघा नक्षत्र होगा। वहीं अतिगण्ड योग (ज्योतिष शास्त्र में एक अशुभ योग है) दोपहर 12:06 बजे तक रहेगा, इसके बाद सुकर्मा योग (अत्यंत शुभ और मंगलकारी योग) बनेगा। फिर पूर्णिमा तिथि अगले दिन यानी 3 मार्च को शाम 4:33 बजे तक रहेगी। पंडित नरेन्द्र उपाध्याय कहते हैं कि- शास्त्रों के अनुसार होलिका पूजन और दहन हमेशा रात में, पूर्णिमा तिथि में और भद्रा रहित समय में ही किया जाता है। लेकिन इस साल पूर्णिमा के पूर्वार्द्ध में भद्रा का साया है। भद्रा की स्थिति 2 मार्च शाम 5:18 बजे से लेकर 3 मार्च सुबह 4:56 बजे तक रहेगी। यानी 2 मार्च की पूरी रात भद्रा और पूर्णिमा दोनों साथ-साथ रहेंगी। ऐसी स्थिति में शास्त्र बताते हैं कि भद्रा के पुच्छ भाग यानी की शुभ काल में होलिका दहन किया जा सकता है, क्योंकि यह समय शुभ माना गया है। इस वर्ष भद्रा का शुभ काल रात 12:50 से रात के 02:02 बजे तक का है। यही 1 घंटा 12 मिनट का समय होलिका दहन के लिए शुभ मुहूर्त रहेगा। हालांकि सूर्यास्त के बाद कभी भी होलिका दहन किया जा सकता है। लेकिन इस एक घंटे के दौरान शुभ समय होगा। होलिका दहन के पूरे 24 घंटे बाद ही होली खेली जाएगी, जो कि बहुत ही दुर्लभ स्थिति मानी जाती है। नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, दो मार्च को जो होलिका दहन न कर पाएं, वे भद्रा साया खत्म होने के बाद और सूर्योदय से पहले यानी 3 मार्च सुबह 5:24 से 6:30 के बीच होलिका दहन कर सकते हैं। अगर इन दोनों में ना कर पाएं तो ग्रहण खत्म होने के बाद कर सकते हैं। हालांकि शास्त्रों के अनुसार ये ठीक नहीं होगा। लेकिन होली का त्योहार है तो दोष कम लगेगा। भद्रा को अशुभ क्यों माना जाता है? काशी में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के एस्ट्रोलॉजर प्रो. विनय पांडे के अनुसार, भद्रा को अशुभ इसलिए माना जाता है क्योंकि शास्त्रों में इसे शुभ कार्यों में बाधा डालने वाला समय बताया गया है। मान्यता है कि भद्रा के दौरान किए गए काम फल नहीं देते या उनमें अड़चनें आती हैं। धार्मिक कथाओं के अनुसार भद्रा शनिदेव की बहन हैं और उनका स्वभाव उग्र माना गया है। इसी कारण भद्रा काल को क्रोध और विघ्न का समय माना जाता है, जिसमें विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्य वर्जित होते हैं। तीन मार्च को चन्द्रग्रहण
BHU के एस्ट्रोलॉजर प्रो. विनय पांडे के अनुसार, 3 मार्च की शाम चंद्रग्रहण लग रहा है। चंद्रग्रहण से 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाता है। शाम करीब 5:59 बजे ग्रहण होने के कारण सुबह लगभग 6:30 बजे से सूतक काल लागू हो जाएगा। ग्रहण लगभग शाम को 6:48 पर खत्म होगा। हालांकि चंद्र ग्रहण का खगोलीय आरंभ दिन में 3:20 बजे से हो रहा है, लेकिन शास्त्रों के अनुसार चंद्र ग्रहण तभी माना जाता है, जब चंद्रमा दिखाई दे, यानी सूर्यास्त के बाद। इसलिए इस दिन सूर्यास्त से लेकर शाम 6:48 बजे तक ही ग्रहण काल माना जाएगा। सूतक काल के दौरान खान-पान वर्जित माना जाता है और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुभ व मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। चूंकि होली एक सामाजिक और सामूहिक पर्व है, जिसमें लोगों का आपस में मिलना-जुलना, भोजन और उत्सव शामिल होता है, ऐसे में सूतक काल के दौरान होली मनाना संभव नहीं होगा। इसी वजह से शास्त्रीय नियमों और परंपराओं को ध्यान में रखते हुए 3 मार्च को होली नहीं मनाई जाएगी। मथुरा-वृंदावन में बसंत पंचमी से होली का उत्सव शुरू देश में होली का त्योहार सिर्फ दो दिन मनाया जाता है, लेकिन मथुरा-वृंदावन में 40 दिनों तक इस पर्व की रौनक रहती है। यहां होली की शुरुआत बसंत पंचमी से हो चुकी है। बसंत पंचमी पर बांके बिहार मंदिर में ठाकुर जी को गुलाल लगाया गया। यहां होली के कई अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। लड्डू होली, लठमार होली, छड़ीमार होली, फूलों वाली होली, हुरंगा होली तो विश्वभर में प्रसिद्ध है। तभी तो इस होली में सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि विदेशी भी खूब शामिल होते हैं। ब्रज की होली भक्तों को एक अलग ही लोक में ले जाती है। 2025 में कब थी होली ? साल 2025 में होली 14 मार्च, 2025 शुक्रवार को थी। वहीं होलिका दहन 13 मार्च गुरुवार को था। हालांकि 14 मार्च 2025 को चंद्र ग्रहण था और इसी दिन होली थी, लेकिन संयोवश यह चंद्र ग्रहण भारत में नहीं दिखाई दिया था। क्यों मनाते है होली ? हिरण्यकश्यप नाम का एक राक्षस था जिसका प्रह्राद नाम का एक पुत्र था। प्रह्राद भगवान विष्णु का बड़ा भक्त था लेकिन हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु का घोर विरोधी था। वह नहीं चाहता था कोई उसके राज्य में भगवान विष्णु की पूजा करें। वह अपने पुत्र को मारने का कई बार प्रयास कर चुका था, लेकिन बार-बार असफल हो जाता था। तब हिरण्यकश्यप ने भक्त प्रह्राद को मारने के लिए लिए अपनी बहन होलिका को भेजा। …………. ये खबर भी पढ़ें… गाजियाबाद-मोबाइल गेम की लत, 3 बहनें 9वीं मंजिल से कूदीं:उम्र 12-14-16 साल; सुसाइड नोट में लिखा- सॉरी मम्मी-पापा, गेम नहीं छोड़ पाएंगे गाजियाबाद में तीन सगी बहनों ने नौवीं मंजिल की बालकनी से कूदकर आत्महत्या कर ली। पुलिस के मुताबिक, मंगलवार रात 2 बजे तीनों ने कमरे को अंदर से बंद किया, फिर स्टूल रखकर एक-एक करके बालकनी से छलांग लगा दी। पढ़िए पूरी खबर…

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