अबकी बार सूखे के आसार, 20% तक कम होगी बारिश:बिहार में इस सीजन 30 दिन चलेगी हीटवेव, 45 डिग्री के पार जाएगा पारा

बिहार में भीषण गर्मी पड़ रही है। पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। आने वाले 8 दिनों तक चिलचिलाती गर्मी से राहत की उम्मीद कम है। इस सीजन 30 दिन हीटवेव चलेगी। चिंता की बात है कि बिहार में इस साल सूखा पड़ने की आशंका है। साथ ही भीषण गर्मी भी झेलनी पड़ सकती है। प्रशांत महासागर में विषुवत रेखा के आसपास पानी का तापमान बढ़ रहा है। इसके चलते मिड मई-जुलाई से सर्दियों तक सुपर अल-नीनो की स्थिति बने रहने की संभावना है। ऐसा होने पर प्रशांत महासागर से आ रही गर्म हवाएं हिंद महासागर और अरब सागर से भारत की ओर बहने वाली नम व ठंडी हवा को रोक देगी। इसी ठंडी हवा के चलते मानसून के दौरान बारिश होती है। हवा रुकने का मतलब है कि बारिश कम होगी। बिहार में कब आएगा मानसून? मौसम वैज्ञानिकों ने बताया है कि बिहार में मानसून के 8-10 जून को आने की संभावना है। आमतौर पर यह 15 जून के आसपास आता है। 26 मई को दक्षिण-पश्चिम मानसून केरल में दस्तक दे सकता है। मौसम वैज्ञानिक आशीष कुमार के मुताबिक, इस साल भी बिहार में मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश की संभावना है। बिहार में मानसून की सामान्य बारिश 992.2mm है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस साल बिहार में सामान्य से करीब 20% कम बारिश होने की संभावना है। अल-नीनो और सुपर अल-नीनो ने मानसून पर असर डाला तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। पूरे मई सता सकती है भीषण गर्मी Accuweather के अनुसार बिहार में पूरे मई भीषण गर्मी सता सकती है। पटना में 29 मई तक अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार रहने की संभावना है। 27 मई को तो यह 45 डिग्री सेल्सियस तक जा सकता है। गया और रोहतास जैसे जिलों में पारा 45 के पार जा सकता है। अब जानिए क्या है अल-नीनो और सुपर अल-नीनो? अल नीनो मौसम का प्राकृतिक रूप से दोहराया जाने वाला पैटर्न है। यह करोड़ों वर्षों से पृथ्वी की जलवायु को बदलता आ रहा है। यह आमतौर पर 9-12 महीनों तक बना रहता है। अल नीनो की शुरुआत प्रशांत महासागर के उष्ण कटिबंध वाले क्षेत्र में होती है। यह समुद्री क्षेत्र भूमध्य रेखा (Equator) के दोनों ओर लगभग 23.5 डिग्री उत्तरी अक्षांश (कर्क रेखा) से 23.5 डिग्री दक्षिणी अक्षांश (मकर रेखा) के बीच स्थित है। यह दुनिया का सबसे गर्म समुद्री क्षेत्र है। यहां हवाएं आमतौर पर पूरब से पश्चिम की ओर चलती हैं। ये हवाएं गर्म पानी और तूफानी मौसम को इक्वाडोर और पेरू से दूर, इंडोनेशिया की ओर धकेल देती हैं। जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं तो गर्म पानी पूरब की ओर बढ़ने लगता है। इसके साथ ही तूफानी मौसम भी पूरब की ओर बढ़ता है। इससे महासागर के उस हिस्से में पानी के सतह का तापमान बढ़ जाता है। पृथ्वी के वायुमंडलीय परिसंचरण (atmospheric circulation) में बदलाव आ जाता है। समुद्र के पानी के तापमान में जितनी ज्यादा वृद्धि होगी अल नीनो उतना ही ज्यादा मजबूत हो सकता है। सुपर अल नीनो कोई वैज्ञानिक शब्द नहीं है। अल नीनो बहुत मजबूत हो तो उसे सुपर अल नीनो कहते हैं। ऐसा तब होता है जब प्रशांत महासागर का तापमान औसत से कम-से-कम 2 डिग्री सेल्सियस ज्यादा हो जाता है। ऐसा बहुत कम होता है। पिछली बार ऐसा लगभग 10 साल पहले हुआ था। कैसे आता है मानसून? लगभग 5 करोड़ वर्ष पहले भारतीय उपमहाद्वीप और एशिया के भू-भागों के अंदर की प्लेट्स के टकराने के कारण तिब्बती के पठार का निर्माण हुआ था। इसी से मानसूनी हवाओं के बहने की शुरुआत हुई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून 80 लाख साल पहले अपने मौजूदा स्वरूप में आया था। गर्मी के मौसम में थार मरुस्थल और इनके आसपास के इलाके काफी गर्म हो जाते हैं। इससे भारतीय उपमहाद्वीप में तापमान बहुत बढ़ जाता है। इस क्षेत्र में लो-प्रेशर जोन बन जाता है। जमीन के ऊपर की हवा तेजी से गर्म हो जाती है, जबकि हिंद महासागर के ऊपर की हवा अपेक्षाकृत ठंडी रहती है। ऐसे में जमीन की गर्म हवा ऊपर उठने लगती है। इससे निम्न दबाव का क्षेत्र बनता है। दबाव सामान्य करने के लिए समुद्र से ठंडी नम हवाएं जमीन की ओर चलने लगती हैं। हिंद महासागर और अरब सागर से भारत की ओर बहने वाली ये ठंडी हवा हिमालय पर्वत के चलते ऊपर उठती और मानसून की बारिश कराती हैं। अल नीनो कैसे मानसून की बारिश को प्रभावित करता है? अल-नीनो एक्टिव होने पर प्रशांत महासागर से भारत की तरफ गर्म हवाएं चलती हैं। यह हिंद महासागर और अरब सागर से आ रही ठंडी व नम हवा को रोकती हैं। इससे भारत में मानसून की बारिश कम होती है। सुपर अल-नीनो होने की स्थिति में बारिश में ज्यादा कमी आती है। बिहार में मानसून की बारिश की शुरुआत बंगाल की खाड़ी की तरफ से ठंडी हवाएं आने से होती है। अल-नीनो की स्थिति में ठंडी हवाएं जमीन की ओर नहीं बढ़ पाती, जिससे बिहार में भी मानसून की बारिश कम होगी। 82% है सुपर अल नीनो डेवलप होने की संभावना अमेरिकी मौसम एजेंसी ‘नेशनल ओशेनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन’ (नोआ) के मुताबिक इस साल मई से जुलाई के दौरान सुपर अल नीनो डेवलप होने की 82% संभावना है। 96 फीसदी आशंका है कि यह दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक जारी रहे। इसके ‘स्ट्रॉन्ग’ या ‘वेरी स्ट्रॉन्ग’ रहने की आशंका करीब 67% है। इससे, कमजोर मानसून, सूखे और हीटवेव की आशंका ज्यादा हो गई है। क्या बिहार में पड़ सकता है 1966-1967 जैसा अकाल? बिहार में खेती बहुत हद तक मानसून की बारिश पर निर्भर है। सर्दी में बारिश बहुत कम हुई। इसके चलते गेहूं की फसल कमजोर हुई। फसल तैयार हुई तो बेमौसम बारिश ने तबाही ला दी। अब किसानों की उम्मीद मानसून की बारिश से लगी है। धान की फसल और इसके बाद सर्दी के मौसम में उगाए जाने वाले फसल की पैदावार इस बात से तय होती है कि मानसून की बारिश कितनी हुई। मानसून की बारिश कम होती है तो राज्य में सूखा पड़ने की आशंका होगी। किसानों को पहले ही सर्दी में कम बारिश होने और फरवरी से अप्रैल तक हुई बेमौसम बारिश से काफी नुकसान हो चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि सुपर अल नीनो के चलते क्या बिहार में 1966-1967 जैसा अकाल पड़ेगा? बिहार में 1965-1966 में 7.5 मिलियन टन अनाज का उत्पादन हुआ था। सूखे के चलते 1966-1967 में यह गिरकर 4.3 मिलियन टन रह गया। उत्पादन में आई कमी से बिहार में अनाज संकट पैदा हो गया था। आज बिहार 1967 जैसी स्थिति में नहीं है। बिहार गेहूं और धान के उत्पादन में देश के टॉप 10 राज्यों में शामिल है। मक्का उत्पादन में तो राज्य देश में तीसरे स्थान पर रहता है। बिहार और देश में अनाज का पर्याप्त भंडार है। इसलिए बड़े पैमाने पर भुखमरी जैसी स्थिति नहीं होगी।

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